Urdu 's Great Poet
Mirza Asadullah Khan Ghalib
Mirza Ghalib 's
Diwan E Ghalib
in Devnagari Script
By:- Hunain
अलफ़
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नक़्शा फ़रयादी हे िकस की शोख़ी तहरीर का
काग़ज़ी है पीरहन हर पीकर तसवीर का
कओकओ सख्त जानी हाे तनहाई न पोछ
सुबह करना शाम का लाना है जवे शीर का
जज़ब बे अख़तयार शौक़ दीखा चाहये
सीन शमशीर से बाहर है दम शमशीर का
आगही दाम शनीदन जस क़दर चाहे बछाे
मदाा अनक़ा है अपने अालम तक़रीर का
बस कि हों ग़ालब असीरी में भी आतश ज़ीर पा
मवे आतश दीदह है हलक़ह मरी ज़नजीर का
।
जराहत तहफ़ह अलमास अरमग़ां दाग़ जिगर हदीह
मबारक बाद असद ग़मख़वार जान दरदमनद आया
।
जज़ क़ीस और कोई न आया बरवे कार
सहरा मगर बह तनग चशम हुसोद था
आशफ़तगी ने नक़श सवीदा कया दरसत
ज़ाहर हवा कि दाग का सरमएह दोद था
था ख़वाब में ख़याल को तझ से माामलह
जब आनख खल गी न ज़यां था न सोद था
लीता हों मकतब ग़म दिल में सबक़ हनोज़
ढानपा कफ़न ने दाग़ अयोब बरहनगी
मीं वरनह हर लिबास में ननग वजोद था
तीशे बग़ीर मर न सका कोहकन असद
सरगशत ख़मार रसोम व क़योद था
।
कहते हो न दीं गे हम दिल अगर पड़ा पएा
दिल कहां कि गुम कीजये हम ने मदाा पएा
अशक़ से तबयात ने ज़ीसत का मज़ा पएा
दर्द की दवा पाई दर्द बे दवा पएा
दोस्त दार दुश्मन हे अातमाद दिल मालूम
आह बे असर दीखी नालह नारसा पएा
सादगी व परकारी बे ख़ोदी व हशयारी
हसन को तग़ाफ़ल में जरत आज़मा पएा
ग़नचह फर लगा खलने आज हम ने अपना दिल
ख़ों कया हवा दीखा गुम कया हवा पएा
हाल दिल नहीं मालोम लीकन इस क़दर यानी
हम ने बार हा ढोनढा तुम ने बारहा पएा
शोर पनद नासह ने ज़ख़म पर नमक छड़का
आप से कोई पोछे तुम ने कया मज़ा पएा
।
है कहां तमना का दूसरा क़दम या रब
हम ने दशत अमकां को एक नक़श पा पएा
।
दिल मेरा सोज़ नहां से बे महाबा जाल गया
आतश ख़ामोश की माननद गोया जाल गया
दिल में ज़ोक़ वसल व याद यार तक बाक़ी नहीं
आग इस घर में लगी एसी कि जो था जाल गया
में अदम से भी परे हों वरनह ग़ाफ़ल बारहा
मीरी आह आतशीं से बाल अनक़ा जाल गया
अरज कीजे जोहर अनदीशह की गरमी कहां
कुछ ख़याल आया था वहशत का कि सहरा जाल गया
दिल नहीं तझ को दखाता वरनह दाग़ों की बहार
अस चराग़ां का करों कया कारफ़रमा जाल गया
में हों और अफ़सरदगी की आरज़ो ग़ालब कि दल
दीख कर तरज़ तपाक अहल दनया जाल गया
।
शोक़ हर रनग रक़ीब सरोसामां नकला
क़ीस तसवीर के परदे में भी अरयां नकला
ज़ख़म ने दाद न दी तनग दिल की यारब
तीर भी सीन बसमल से पौराफ़शां नकला
बवे गल नाल दल दोद चराग़ महफ़ल
जो तरी बज़म से नकला सौ परीशां नकला
दल हसरत ज़दह था माद लज़त दरद
काम यारों का बह क़दर लब व दनदां नकला
अे नौ आमोज़ फ़ना हमत दशवार पसनद
सख्त मुश्किल है कि यह काम भी आसां नकला
दिल में फर गरये ने खाक शोर अठएा ग़ालब
आह जो क़तरह न नकला था सुो तोफ़ां नकला
।।।।।
नसख़ हमीदीह में मज़ीद शार
शोख़ रनग हना ख़ोन वफ़ा से कब तक
आख़र अे अहद शकन तो भी पशीमां नकला
।
धमकी में मर गया जो न बाब नबरद था
अशक़ नबरद पीशह तलबगार मर्द था
था ज़नदगी में मरग का खटका लगा हवा
अड़ने से पीशतर भी मरा रनग ज़रद था
तालीफ़ नसख़ह हाे वफ़ा कर रहा था में
मजमवा ख़याल अभी फ़र्द फ़र्द था
दिल ताजगर कि साहल दरयाे ख़ों है अब
इस रह गज़र में जलो गल आगे गरद था
जाती है कोई कशमकश अनदोह अशक़ की !
दिल भी अगर गया तो वुही दिल का दर्द था
अहबाब चारह साज़ वहशत न कर सके
ज़नदां में भी ख़याल बयाबां नोरद था
यह लाश बे कफ़न असद ख़सतह जां की है
हक़ मग़फ़रत करे अजब आज़ाद मर्द था
।
शमार सबहह मरग़ोब बत मशकल पसन्द आया
तमाशाे बह यक कफ़ बुरदन सद दल पसन्द आया
बह फ़ीज बे दली नोमीद जओीद आसां है
कशाश को हमारा अक़द मुश्किल पसन्द आया
हवाे सीरगल आीन बे महर क़ातिल
कि अनदाज़ बख़ों ग़लतीदनबसमल पसन्द आया
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* असल नसख़ नज़ामी में ग़लतीदन है जो सहो कताबत हे
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दहर में नक़श वफ़ा वजह तसली न हवा
है यह वह लफ़्ज़ कि शरमनद मानी न हवा
सबज़ खत से तरा काकल सरकश न दबा
यह ज़मरद भी हरीफ़ दम अफ़ाई न हवा
में ने चाहा था कि अनदोह वफ़ा से छोटों
वह सतमगर मरे मरने पह भी राजी न हवा
दिल गज़र गाह ख़याल मे व साग़र ही सही
गर नफ़ौस जाद सरमनज़ल तक़वी न हवा
हों तरे वादह न करने पर भी राजी कि कभी
गोश मनत कश गलबानग तसली न हवा
किस से महरोम क़िस्मत की शकएत कीजये
हम ने चाहा था कि मर जाईं सौ वह भी न हवा
मर गया सदम यक जनबश लब से ग़ालब
नातवानी से हरीफ़ दम अीसी न हवा
नसख़ हमीदीह में मज़ीद
वसात रहमत हक़ दीख कि बख़शा जा
मझ सा काफ़रकह जो ममनोन माासी न हवा
।
सतएश गर है ज़ाहद ، इस क़दर जस बाग़ रजवां का
वह खाक गलदसतह है हम बीख़ोदों के ताक़ नसयां का
बयां कया कीजे बीदादकओश हाे मख़गां का
कि हर यक क़तरह ख़ों दानह है तसबीह मरजां का
न आी सतोत क़ातिल भी माना ، मीरे नालों को
लिया दानतों में जो तनका ، हवा रीशह नौीौसतां का
दखां गा तमाशह ، दी अगर फ़रसत ज़माने ने
मरा हर दाग़ दिल ، अक तख़म है सरो चराग़ां का
कया आीनह ख़ाने का वह नक़शह तीरे जलवे ने
करे जो परतो ख़ुोरशीद अालम शबनमसतां का
मरी तामीर में मुजमर है खाक सूरत ख़राबी की
हयोली बरक़ ख़रमन का ، है ख़ोन गरम दहक़ां का
उगा है घर में हर सुो सबज़ह ، वीरानी तमाशह कर
मदार अब खोदने पर घास के हे मीरे दरबां का
ख़मोशी में नहां ، ख़ों गशतह लाखों आरज़वीं हैं
चराग़ मुरदह हों ، में बे ज़बां ، गोर ग़रीबां का
हनोज़ खाक परतो नक़श ख़याल यार बाक़ी है
दल अफ़सरदह ، गोया हजरह है योसफ़ के ज़नदां का
नहीं मालूम ، किस किस का लहो पानी हवा होगा
क़यामत है सरशक आलोदह होना तीरी मख़गां का
नज़र में है हमारी जाद राह फ़ना ग़ालब
कि यह शीराज़ह है अालौम के अजज़ाे परीशां का
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* नसख़ हसरत मोहानी में सरगशतह
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न होगा यक बयाबां मानदगी से ज़ोक़ कम मीरा
हबाब मोज रफ़्तार है नक़श क़दम मीरा
महबत थी चमन से लीकन अब यह बे दमाग़ी हे
कि मोज बवे ग़ुल से नाक में आता है दम मीरा
।
सरापा रहन अशक़ व नागज़ीर अलफ़त हसती
अबादत बरक़ की करता हों और अफ़सोस हाशिल का
बक़दर ज़रफ़ है साक़ी ख़मार तशनह कामी भी
जोतो दरयाे मे हे तो में ख़मयाज़ह हों साहल का
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महरम नहीं है तो ही नवा हाे राज़ का
यां वरनह जो हजाब हे परदह है साज़ का
रनग शकसतह सबह बहार नज़ारह हे
यह वक़्त है शगफ़तन ग़ुल हाे नाज़ का
तो और सवे ग़ीर नज़रहाे तीज़ तीज़
में और दुख तरी मख़ह हाे दराज़ का
सरफ़ह है जबत आह में मीरा वगरनह मीं
तुामह हों एक ही नफ़ौस जां गदाज़ का
हैं बसकह जोश बादह से शीशे अछल रहे
हर गोश बसात है सर शीशह बाज़ का
कओश का दिल करे है तक़ाजा कि है हनोज़
नाख़न पह क़र्ज़ इस गरह नीम बाज़ का
ताराज कओश ग़म हजरां हवा असद
सीनह कि था दफ़ीनह गहर हाे राज़ का
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बज़म शाहनशाह में अशाार का दफ़तर खला
रखयो यारब यह दर गनजीन गोहर खला
शब हवी फर अनजम रख़शनदह का मन्ज़र खला
अस तकलफ़ से कि गोया बतकदे का डर खला
गरचह हों दयवानह पर कयों दोस्त का खां फ़रीब
आसतीं में दशनह पनहां हाथ में नशतर खला
गो न समझों इस की बातीं गोनह पां इस का भीद
पर यह कया कम हे कि मझ से वह परी पीकर खला
है ख़याल हुसन में हुसन अमल का सा ख़याल
ख़लद का खाक डर है मीरी गोर के अन्दर खला
मनह न खलने परहे वह अालम कि दीखा ही नहीं
ज़लफ़ से बड़ कर नक़ाब उस शोख़ के मनह पर खला
डर पह रहने को कहा और कहह के कीसा फर गया
जतने अरसे में मरा लपटा हवा बसतर खला
कयों अनधीरी है शब ग़म है बलां का नज़ोल
आज उधर ही को रहे गा दीद अख़तर खला
कया रहों ग़रबत में ख़ोश जब हो हवादस का यह हाल
नामह लाता है वतन से नामह बर अकसर खला
इस की अमत में हों मौीं मीरे रहीं कयों काम बनद
वासते जस शह के ग़ालब गनबद बे डर खला
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शब कि बरक़ सोज़ दिल से ज़हर अबर आब था
शाल जवालह हर खाक हलक़ गरदाब था
वां करम को अज़र बारिश था अनां गीर ख़राम
गरये से यां पनब बालश कफ़ सीलाब था
वां ख़ोद आराई को था मोती परोने का ख़याल
यां हजोम अशक में तार नगह नएाब था
जलो ग़ुल ने कया था वां चराग़ां आब जो
यां रवां मख़गान चशम तर से ख़ोन नाब था
यां सर परशोर बे ख़वाबी से था दयवार जो
वां वह फ़रक़ नाज़ महो बालश कमख़वाब था
यां नफ़ौस करता था रोशन शमा बज़म बेख़ोदी
जलो ग़ुल वां बसात सहबत अहबाब था
फ़र्श से ता अरश वां तोफ़ां था मोज रनग का
यां ज़मीं से आसमां तक सोख़तन का बाब था
नागहां इस रनग से ख़ों नाबह टपकाने लगा
दिल कि ज़ोक़ कओश नाख़न से लज़त याब था
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नाल दिल में शब अनदाज़ असर नएाब था
था सपनदबज़म वसल ग़ीर ، गो बीताब था
मौक़दम सीलाब से दिल कया नशात आहनग है !
ख़ान अाशक़ मगर साज़ सदाे आब था
नाज़श एाम ख़ाकसतर नशीनी ، कया कहों
पहलवे अनदीशह ، वक़फ़ बसतर सनजाब था
कुछ न की अपने जुनोन नारसा ने ، वरनह यां
ज़रह ज़रह रोकश ख़ुरशीद अालम ताब था
क़
आज कयों परवा नहीं अपने असीरों की तझे ؟
कुल तलक तीरा भी दिल महरोोफ़ा का बाब था
याद कर वह दिन कि हर यक हलक़ह तीरे दाम का
अनतज़ार सीद में अक दीद बीख़वाब था
में ने रोका रात ग़ालब को ، वगरनह दीखते
उस के सील गरीह में ، गरदुों कफ़ सीलाब था
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एक एक क़तरे का मझे दीना पड़ा हसाब
ख़ोन जिगर वदयात मख़गान यार था
अब में हों और मातम यक शहर आरज़ो
तोड़ा जो तो ने आीनह तमसाल दार था
गलयों में मीरी नाश को खीनचे फरो कि मीं
जां दाद हवाे सर रहगज़ार था
मोज सराब दशत वफ़ा का न पोछ हाल
हर ज़रह मसल जोहर तीग़ आब दार था
कम जानते थे हम भी ग़म अशक़ को पर अब
दीखा तो कम हवे पह ग़म रोज़गार था
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बसकह दशवार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मीसर नहीं अनसां होना
गरीह चाहे है ख़राबी मरे काशाने की
डर व दयवार से टपके है बयाबां होना
वा दयवानग शौक़ कि हर दम मझ को
आप जाना उधर और आप ही हीरां होना
जलोह अज़ बसकह तक़ाजाे नगह करता हे
जोहर आीनह भी चाहे है मख़गां होना
अशरत क़त्ल गह अहल तमना मत पोछ
अीद नज़ारह है शमशीर का अरयां होना
ले गे ख़ाक में हम दाग़ तमनाे नशात
तो हो और आप बह सद रनग गलसतां होना
अशरत पार दल ज़ख़म तमना खाना
लज़त रीश जगर ग़रक़ नमकदां होना
की मरे क़त्ल के बाद इस ने जफ़ा से तोबह
हाे इस ज़ोद पशीमां का पशीमां होना
हीफ़ उस चार गरह कपड़े की क़िस्मत ग़ालब
जस की क़िस्मत में हो अाशक़ का गरीबां होना
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ ताहर में " परीशां
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शब ख़मार शोक़ साक़ी रसतख़ीज़ अनदाज़ह था
ता महीत बादह सूरत ख़ान ख़मयाज़ह था
यक क़दम वहशत से दरस दफ़तर अमकां खला
जादह अजज़ाे दो अालम दशत का शीराज़ह था
माना वहशत ख़रामी हाे लीले कौन हे
ख़ान मजनोन सहरा गरद बे दरवाज़ह था
पोछ मत रसवाई अनदाज़ असतग़नाे हसन
दोस्त मरहोन हना रख़सार रहन ग़ाज़ह था
नाल दिल ने दये ओराक़ लख़त दिल बह बाद
यादगार नालह खाक दयवान बे शीराज़ह था
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दोस्त ग़मख़वारी में मीरी साई फ़रमाईं गे कया
ज़ख़म के भरने तलक नाख़न न बड़ जाईं गे कया
बे नयाज़ी हद्द से गज़री बनदह परोर कब तलक
हम कहीं गे हाल दल और आप फ़रमाईं गे कया
हजरत नासह गर आीं दीदह व दिल फ़रश राह
कोई मझ को यह तो समझा दो कि समझाईं गे कया
आज वां तीग़ व कफ़न बानधे हवे जाता हों मीं
अज़र मीरे क़त्ल करने में वह अब लाईं गे कया
गर कया नासह ने हम को क़ीद अच्चा यों सही
यह जनोन अशक़ के अनदाज़ छट जाईं गे कया
ख़ानह ज़ाद ज़लफ़ हीं ज़नजीर से भागीं गे कयों
हैं गरफ़तार वफ़ा ज़नदां से घबराईं गे कया
है अब इस मामोरे में क़हत ग़म अलफ़त असद
हम ने यह माना कि दली में रहीं खाईं गे कया
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यह न थी हमारी क़िस्मत कि वसाल यार होताा
अगर और जीते रहते ، यही इन्तज़ार होता
तरे वादे पर जे हम तो यह जान झोट जाना
कि खुशी से मर न जाते अगर अातबार होता
तरी नाज़की से जाना कि बनधा था अहद बोदा
कभी तो न तोड़ सकता अगर असतवार होता
कोई मीरे दिल से पोछे तरे तीर नीम कश को
यह ख़लश कहां से होती जो जिगर के पार होता
यह कहां की दोसती है कि बने हैं दोस्त ना सह
कोई चारह साज़ होता कोई घाम गसार होता
रग सनग से टपकता वह लहो कि फर न थमता
जसे घाम समझ रहे हो यह अगर शरार होता
घाम अगर चह जां गसल है पह कहां बचीं कि दिल है
ग़म अशक़ गर न होता घाम रोज़गार होता
कहों किस से में कि कया हेशब घाम बरी बला है
मझे कया बुरा था मरना अगर एक बार होता
हवे मर के हम जो रसवा हवे कयों न ग़रक़ दरया
न कभी जनाज़ह अठता न कहीं मज़ार होता
असे कौन दीख सकता कि यगानह है वह यकता
जो दवी की बो भी होती तो कहीं दो चार होता
यह मसाल तसोफ़ यह तरा बयान ग़ालब
तझे हम वली समझते जो न बादह ख़वार होता
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होस को है नशात कार कया कया
न हो मरना तो जीने का मज़ा कया
तजाहल पीशगी से मदाा कया
कहां तक अे सरापा नाज़ कया कया
नवाज़श हाे बे जा दीखता हों
शकएत हाे रनगीं का गला कया
नगाह बे महाबा चाहता हों
तग़ाफ़ल हाे तमकीं आज़मा कया
फ़रोग़ शाल ख़स यक नफ़ौस हे
होस को पास नामोस वफ़ा कया
नफ़स मोज महीत बीख़ोदी हे
तग़ाफ़ल हाे साक़ी का गला कया
दमाग़ अतर पीराहन नहीं हे
ग़म आवारगी हाे सबा कया
दल हर क़तरह है साज़ अना अलबहर
हम इस के हीं हमारा पोछना कया
महाबा कया हे मौीं जामन अधर दीख
शहीदान नगह का ख़ों बहा कया
सुन अे ग़ारत गर जनस वफ़ा सन
शकसत क़ीमत दिल की सदा कया
कया किस ने जगरदारी का दावी
शकीब ख़ातर अाशक़ भला कया
यह क़ातिल वाद सबर आज़मा कयों
यह काफ़िर फ़तन ताक़त रबा कया
बलाे जां है ग़ालब इस की हर बात
अबारत कया अशारत कया अदा कया
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दरख़ोर क़हर व ग़जब जब कोई हम सा न हवा
फर ग़लत कया है कि हम सा कोई पीदा न हवा
बनदगी में भी वह आज़ादह व ख़ोदबीं हीं कि हम
अलटे फर आे दर काबह अगर वा न हवा
सब को मक़बोल है दावी तरी यकताई का
रोबरो कोई बत आीनह सीमा न हवा
कम नहीं नाज़श हमनाम चशम ख़ोबां
तीरा बीमार बुरा कया हे गर अच्चा न हवा
सीने का दाग है वह नालह कि लब तक न गया
ख़ाक का रज़क़ है वह क़तरह कि दरया न हवा
नाम का मीरे है जो दख कि किसी को न मला
काम में मीरे है जो फ़तनह कि बरपा न हवा
हर बुन मो से दम ज़कर न टपके ख़ोननाब
हमज़ह का क़सह हवा अशक़ का चरचा न हवा
क़तरे में दजलह दखाई न दे और जज़ो में कुल
खील लड़कों का हवा दीद बीना न हवा
थी ख़बर गरम कि ग़ालब के उड़ीं गे परज़े
दीखने हम भी गे थे पह तमाशा न हवा
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
काम का है मरे वह फ़तनह कि बरपा न हवा नसख़ हसरत नसख़ महर
।
असद हम वह जनों जोलां गदाे बे सर व पा हीं
कि है सर पनज मख़गान आहो पशत ख़ार अपना
।
प नज़र करम तहफ़ह है शरम ना रसाई का
बह ख़ों ग़लतीद सद रनग दावी पारसाई का
न हो हसन तमाशा दोसत रसवा बे वफ़ाई का
बह महर सद नज़र साबत है दावी पारसाई का
ज़कात हसन दे अे जलो बीनश कि महर आसा
चराग़ ख़ान दरवीश हो कासह गदाई का
न मारा जान कर बे जरम ग़ाफ़ल तीरी गर्दन पर
रहा माननद ख़ोन बे गनह हक़ आशनाई का
तमनाे ज़बां महो सपास बे ज़बानी हे
मटा जस से तक़ाजा शको बे दोस्त व पाई का
वही खाक बात है जो यां नफ़ौस वां नकहत ग़ुल हे
चमन का जलोह बाास है मरी रनगीं नवाई का
दहान हर बत पीग़ारह जुो ज़नजीर रसवाई
अदम तक बे वफ़ा चरचा है तीरी बे वफ़ाई का
न दे नामे को अतना तोल ग़ालब मख़तसर लिख दे
कि हसरत सनज हों अरज सितम हाे जदाई का
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ हमीदीह नज़ामी हसरत और महर के नसख़ों में लफ़्ज़ क़ातल हे
।
गर न अनदोह शब फ़रक़त बयां हो जाे गा
बे तकलफ़ दाग़ मह मुहर दहां होजाे गा
ज़हरह गर एसा ही शाम हजर में होता है आब
पर तो महताब सील ख़ानमां होजाे गा
ले तो लों सोते में इस के पां का बोसह मगर
एसी बातों से वह काफ़िर बदगमां होजाे गा
दिल को हम सरफ़ वफ़ा समझे थे कया मालूम था
यानी यह पहले ही नज़र अमतहां होजाे गा
सब के दिल में है जगह तीरी जो तो राजी हवा
मझ पह गोया खाक ज़मानह महरबां होजाे गा
गर नगाह गरम फ़रमाती रही तालीम जबत
शालह ख़स मीं जीसे ख़ों रग मीं नहां होजाे गा
बाघ में मझ को न ले जा वरनह मीरे हाल पर
हर गल तर एक चशम ख़ों फ़शां होजाे गा
वा गर मेरा तरा अनसाफ़ महशर में न हो
अब तलक तो यह तोक़ा है कि वां होजाे गा
फ़ादह कया सोच आख़र तो भी दाना है असद
दोसती नादां की हे जी का ज़यां होजाे गा
।
दर्द मनत कश दवा न हवा
में न अच्चा हवा बुरा न हवा
जमा करते हो कयों रक़ीबों को
खाक तमाशा हवा गला न हवा
हम कहां क़िस्मत आज़माने जाईं
तो ही जब ख़नजर आज़मा न हवा
कतने शीरीं हैं तीरे लब कह रक़ीब
गालयां ख के बे मज़ा न हवा
है ख़बर गरम उन के आने की
आज ही घर में बोरया न हवा
कया वह नमरोद की ख़दाई थी
बनदगी में मरा भला न हवा
जान दी दी हवी असी की थी
हक़ तो यों है कि हक़ अदा न हवा
ज़ख़म गर दब गया लहो न थमा
काम गर रुक गया रवा न हवा
रहज़नी है कि दिल सतानी हे
ले के दल दलसतां रवानह हवा
कुछ तो पड़े कि लूग कहते हीं
आज ग़ालब गज़ल सरा न हवा
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर नसख़ अलामह असी में यों के बजा ए यह अया हे
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गलह है शौक़ को दिल में भी तनग जा का
गहर में महो हवा अजतराब दरया का
यह जानता हों कि तो और पासख़ मकतोब
मगर सितम ज़दह हों ज़ोक़ ख़ामह फ़रसा का
हनाे पाे ख़ज़ां है बहार अगर है यही
दवाम कलफ़त ख़ातर है अीश दनया का
ग़म फ़िराक़ में तकलीफ़ सीर बाघ न दो
मझे दमाग़ नहीं ख़नदह हाे बे जा का
हनोज़ महरम हसन को तरसता हों
करे है हर बुन मो काम चशम बीना का
दिल इस को पहले ही नाज़ व अदा से दे बीठे
हमें दमाग़ कहां हसन के तक़ाजा का
न कहह कि गरीह बह मक़दार हसरत दिल हे
मरी नगाह में है जमा व ख़रच दरया का
फ़लक को दीख के करता हों उस को याद असद
जफ़ा में इस की है अनदाज़ कारफ़रमा का
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ नज़ामी की अमला है ख़नद हा
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क़तर मे बस कि हीरत से नफ़ौस परोर हवा
ख़त जाम मे सरासर रशत गोहर हवा
अातबार अशक़ की ख़ानह ख़राबी दीखना
ग़ीर ने की आह लीकन वह ख़फ़ा मझ पर हवा
।
जब बह तक़रीब सफ़र यार ने महमल बानधा
तपश शौक़ ने हर ज़रे पह खाक दिल बानधा
अहल बीनश ने बह हीरत कद शोख़ नाज़
जोहर आीनह को तोत बसमल बानधा
यास व अमीद ने खाक अरौबदह मीदां मानगा
अजज़ हमत ने तलसम दल साल बानधा
न बनधे तशनग ज़ोक़ के मजमों ग़ालब
गरचह दिल खोल के दरया को भी साहल बानधा
।
में और बज़म मे से यों तशनह काम आं
गर में ने की थी तोबह साक़ी को कया हवा था
है एक तीर जस में दोनों छदे पड़ी हीं
वह दिन गे कि अपना दिल से जिगर जुदा था
दरमानदगी में ग़ालब कुछ बन पड़ी तो जानों
जब रशतह बे गरह था नाख़न गरह कशा था
।
घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता
तनग दिल का गलह कया यह वह काफ़िर दिल हे
कि अगर तनग न होता तो परीशां होता
बाद यक अमर वौरा बार तो दीता बारे
काश रजवां ही दर यार का दरबां होता
।
न था कुछ तो खुद था कुछ न होता तो खुद होता
डुबोया मझ को होने ने न होता में तो कया होता
हुवा जब घाम से यों बे हस तो घाम कया सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानो पर धरा होता
हवी मदत कि ग़ालब मरगया पर याद आता हे
वह हर खाक बात पर कहना कि यों होता तो कया होता
।
यक ज़र ज़मीं नहीं बे कार बाघ का
यां जादह भी फ़तीलह है लाले के दाग का
बे मे कसे है ताक़त आशोब आगही
खीनचा है अजज़ होसलह ने खत एाग़ का
बुलबल के कारोबार पह हैं ख़नदह हाे गल
कहते हैं जस को अशक़ ख़लल है दमाग़ का
ताज़ह नहीं है नश फ़कर सख़न मझे
तरयाक क़दीम हों दुोद चराग़ का
सौ बार बनद अशक़ से आज़ाद हम हवे
पर कया करीं कि दिल ही अदो है फ़राग़ का
बे ख़ोन दिल है चशम में मोज नगह ग़बार
यह मे कदह ख़राब है मे के सराग़ का
बाग़ शगफ़तह तीरा बसात नशात दल
अबर बहार ख़मकदह कस के दमाग़ का
।
वह मीरी चीन जबीं से ग़म पनहां समझा
राज़ मकतोब बह बे रबत अनवां समझा
यक अलफ़ बीश नहीं सक़ील आीनह हनोज़
चाक करता हों में जब से कि गरीबां समझा
शरह असबाब गरफ़तार ख़ातर मत पोछ
इस क़दर तनग हवा दिल कि में ज़नदां समझा
बदगमानी ने न चाहा असे सरगरम ख़राम
रख़ पह हर क़तरह अरक़ दीद हीरां समझा
अजज़से अपने यह जाना कि वह बुद ख़ो होगा
नबज ख़स से तपश शाल सोज़ां समझा
सफ़र अशक़ में की जाफ़ ने राहत तलबी
हर क़दम साे को में अपने शबसतान समझा
था गरीज़ां मख़ यार से दिल ता दम मरग
दफ़ा पीकान क़जा अस क़दर आसां समझा
दिल दिया जान के कयों इस को वफ़ादार असद
ग़लती की कि जो काफ़िर को मसलमां समझा
।
फर मझे दीद तर याद आया
दल जिगर तशन फ़रयाद आया
दम लिया था न क़यामत ने हनोज़
फर तरा वक़त सफ़र याद आया
सादगी हाे तमना यानी
फर वह नीरनग नज़र याद आया
अज़र वामानदगी अे हसरत दल
नालह करता था जिगर याद आया
ज़नदगी यों भी गज़र ही जाती
कयों तरा राह गज़र याद आया
कया ही रजवां से लड़ाई होगी
घर तरा ख़लद में गर याद आया
आह वह जरत फ़रयाद कहां
दिल से तनग आके जिगर याद आया
फर तीरे कोचे को जाता है ख़याल
दल गुम गशतह मगर याद आया
कोई वीरानी सी वीरानी हे
दशत को दीख के घर याद आया
में ने मजनों पह लड़कपन में असद
सनग अठएा था कि सर याद आया
।
हवी ताख़ीर तो कुछ बाास ताख़ीर भी था
आप आते थे मगर कोई अनां गीर भी था
तुम से बे जा है मझे अपनी तबाही का गलह
इस में कुछ शाब ख़ोबी तक़दीर भी था
तो मझे भूल गया हो तो पता बतला दों
कभी फ़तराक में तीरे कोई नख़चीर भी था
क़ीद में है तरे वहशी को वही ज़लफ़ की याद
हां कुछ खाक रनज गरानबारी ज़नजीर भी था
बजली खाक कोनद गी आँखों के आगे तो कया
बात करते कि में लब तशन तक़रीर भी था
योसफ़ इस को कहों और कुछ न कहे ख़ीर हवी
गर बगड़ बीठे तो में लाक़ ताज़ीर भी था
दीख कर ग़ीर को हो कयों न कलीजा ठनडा
नालह करता था वले तालब तासीर भी था
पीशे में अीब नहीं रखये न फ़रहाद को नाम
हम ही आशफ़तह सरों में वह जवां मीर भी था
हम थे मरने को खड़े पास न आया न सही
आख़र उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था
पकड़े जाते हैं फ़रशतों के लखे पर नाहक़
आदमी कोई हमारा ौदम तहरीर भी था
रीख़ते के तमहीं असताद नहीं हो ग़ालब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
।
लब ख़शक डर तशनगी मरदगां का
ज़यारत कदह हों दिल आज़रदगां का
हमह ना अमीदी हमह बुद गमानी
में दिल हों फ़रीब वफ़ा ख़ोरदगां का
।
तो दोस्त किसी का भी सतमगर न हवा था
ओरों पह है वह ज़लम कि मझ पर न हवा था
छोड़ा मह नख़शब की तरह दसत क़जा ने
ख़ोरशीद हनोज़ इस के बराबर न हवा था
तोफ़ीक़ बह अनदाज़ हमत है अज़ल से
आँखों में है वह क़तरह कि गोहर न हवा था
जब तक कि न दीखा था क़द यार का अालम
में मातक़द फ़तन महशर न हवा था
में सादह दल आज़रदगी यार से ख़ोश हों
यानी सबक़ शोक़ मकरर न हवा था
दरयाे माासी ुतनक आबी से हवा ख़शक
मेरा सर दामन भी अभी तर न हवा था
जारी थी असद दाग़ जिगर से मरी तहसील
आ तशकदह जागीर सौमौनदर न हवा था
।
शब कि वह मजलस फ़रोज़ ख़लोत नामोस था
रशत हर शमा ख़ार कसोत फ़ानोस था
मशहद अाशक़ से कोसों तक जो उगती है हना
किस क़दर या रब हलाक हसरत पाबोस था
हासल अलफ़त न दीखा जज़ शकसत आरज़ो
दिल बह दिल पयोसतह गोया यक लब अफ़सोस था
कया करों बीमार घाम की फ़राग़त का बयां
जो कि खएा ख़ोन दल बे मनत कीमोस था
।
आीनह दीख अपना सा मनह ले के रह गे
साहब को दिल न दीने पह कितना ग़रोर था
क़ासद को अपने हाथ से गर्दन न मारये
इस की ख़ता नहीं है यह मेरा क़सूर था
।
जाफ़ जनों को वक़त तपश डर भी दूर था
खाक घर में मख़तसर सा बयाबां जरोर था
।
फ़ना को अशक़ है बे मक़सदां हीरत परसतारां
नहीं रफ़तार अमर तीज़ रो पाबनद मतलब हा
।
अरज नयाज़ अशक़ के क़ाबल नहीं रहा
जस दिल पह नाज़ था मझे वह दिल नहीं रहा
जाता हों दाग़ हसरत हसती लिये हवे
हों शमा कशतह दरख़ोर महफ़िल नहीं रहा
मरने की अे दिल और ही तदबीर कर कि में
शएान दोस्त व ख़नजर क़ातिल नहीं रहा
बर रो शश जहत दर आीनह बाज़ है
यां अमतयाज़ नाक़स व कामल नहीं रहा
वा कर दये हैं शौक़ ने बनद नक़ाब हसन
ग़ीर अज़ नगाह अब कोई हाल नहीं रहा
गो में रहा रहीन सितम हाे रोज़गार
लीकन तरे ख़याल से ग़ाफ़ल नहीं रहा
दिल से हवाे कशत वफ़ा मट गी कि वां
हाशिल सवाे हसरत हाशिल नहीं रहा
बीदाद अशक़ से नहीं डरता मगर असद
जस दिल पह नाज़ था मझे वह दिल नहीं रहा
।
रशक कहता है कि इस का ग़ीर से अख़लास हीफ़
अक़्ल कहती है कि वह बे महर किस का आशना
ज़रह ज़रह साग़र मे ख़ान नीरनग है
गरदश मजनों बह चशमकहाे लीली आशना
शौक़ है सामां तराज़ नाज़श अरबाब अजज़
ज़रह सहरा दोस्त गाह व क़तरह दरया आशना
में और एक आफ़त का टकड़ा वह दल वहशी कह है
अाफ़ीत का दुश्मन और आवारगी का आशना
शकोह सनज रशक हम दीगर न रहना चाहये
मेरा ज़ानो मोनस और आीनह तीरा आशना
कोहकन नक़ाश यक तमसाल शीरीं था असद
सनग से सर मर कर होवे न पीदा आशना
।
ज़कर इस परी वश का और फर बयां अपना
बन गया रक़ीब आख़र। था जो राज़दां अपना
मे वह कयों बहत पीते बज़ म ग़ीर में या रब
आज ही हवा मनज़ोर उन को अमतहां अपना
मन्ज़र खाक बलनदी पर और हम बन सकते
अरश से उधर होता काशके मकां अपना
दे वह जस क़द र ज़लत हम हनसी में टालीं गे
बारे आशना नकला उन का पासबां अपना
डर द दिल लखों कब तक जां उन को दखलादों
अनगलयां फ़गार अपनी ख़ामह ख़ोनचकां अपना
घसते घसते मट जाता आप ने अबस बदला
ननग सजदह से मीरे सनग आसतां अपना
ता करे न ग़माज़ी करलया है दुश्मन को
दोस्त की शकएत में हम ने हमज़बां अपना
हम कहां के दाना थे किस हनर में यकता थे
बे सबब हवा ग़ालब दुश्मन आसमां अपना
।
सरम मफ़त नज़र हों मरी क़ीमत यह हे
कि रहे चशम ख़रीदार पह अहसां मीरा
रख़सत नालह मझे दे कि मबादा ज़ालम
तीरे चहरे से हो ज़ाहर ग़म पनहां मीरा
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ आगरह मनशी शयो नारान 1863ء मींमरी क़समत
।
ग़ाफ़ल बह वहम नाज़ ख़ोद आरा है वरनह यां
बे शान सबा नहीं तुरह गयाह का
बज़म क़दह से अीश तमना न रख कि रनग
सीद ज़ दाम जसतह है इस दाम गाह का
रहमत अगर क़ुबूल करे कया बाईद हे
शरमनदगी से अज़र न करना गनाह का
मक़तल को किस नशात से जा ता हो जूता मीं कि हे
पुरगल ख़याल ज़ख़म से दामन नगाह का
जां दर हवा यक नगह गरम है असद
परवानह है वकील तरे दाद ख़वाह का
।
जोर से बाज़ आे पर बाज़ आीं कया
कहते हैं हम तझ को मनह दखलाईं कया
रात दिन गरदश में हैं सात आसमां
हो रहे गा कुछ न कुछ घबराईं कया
लाग हो तो इस को हम समझीं लगा
जब न हो कुछ भी तो धोखा खाईं कया
हो लिये कयों नामह बर के साथ साथ
या रब अपने खत को हम पहनचाईं कया
मोज ख़ों सर से गज़र ही कयों न जाे
आसतान यार से आथ जाईं कया
उमर भर दीखा कये मरने की राह
मर गये पर दीखये दखलाईं कया
पूछते हैं वह कि ग़ालब कौन है
कोई बतला कि हम बतलाईं कया
।
लताफ़त बेकसाफ़त जलोह पीदा कर नहीं सकती
चमन ज़नगार है आीन बाद बहारी का
हरीफ़ जोशश दरया नहीं ख़ोददार साहल
जहां साक़ी हो तो बातल है दावी होशयारी का
।
अशरत क़तरह है दरया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद्द से गज़रना है दवा हो जाना
तझ से क़िस्मत में मरी सोरत क़फ़ल अबजद
था लखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
दिल हवा कशमकश चार ज़हमत में तमाम
मट गया घसने में उस अुक़दे का वा हो जाना
अब जफ़ा से भी हैं महरोम हम अललह अललह
इस क़दर दशमन अरबाब वफ़ा हो जाना
जाफ़ से गरीह मबदल बह दम सरद हवा
बओर आया हमें पानी का हवा हो जाना
दल से मटना तरी अनगशत हनाई का ख़याल
हो गया गोशत से नाख़न का जुदा हो जाना
है मझे अबर बहारी का बरस कर खुलना
रोते रोते ग़म फ़ुरक़त में फ़ना हो जाना
गर नहीं नकहत ग़ुल को तरे कोचे की होस
कयों है गरद रह जौोलान सबा हो जाना
ताकह तझ पर खुले अाजाज़ हवा सौीक़ल
दीख बरसात में सबज़ आने का हो जाना
बख़शे है जलो गुल ज़ोक़ तमाशा ग़ालब
चशम को चाह हर रनग में वा हो जाना
।
शको यारां ग़बार दिल में पनहां कर दया
ग़ालब एसे गनज को अयां यही वीरानह था
।
फर वह सो चमन आता है खुद ख़ीर करे
रनग अड़ता है गुलसतां के हवादारों का
।
असद यह अजज़ व बे सामान फ़राोन तोौाम हे
जसे तो बनदगी कहता है दावी है ख़दाई का
।
1857ء
बस कि फ़ााल मा यरीद है आज
हर सलहशोर अनगलसतां का
घर से बाज़ार में नकलते हो
ज़हरह होता है आब अनसां का
चोक जस को कहीं वह मक़तल हे
घर बन है नमोनह ज़नदां का
शहर दहली का ज़रह ज़रह ख़ाक
तशन ख़ों है हर मसलमां का
कोई वां से न आ सके यां तक
आदमी वां न जा सके यां का
में ने माना कि मल ग फर कया
वही रोना तन व दिल व जां का
गाह जाल कर कया की शकोह
सोज़श दाग हा पनहां का
गाह रो कर कहा की बाहम
माजरा दीदह हा गरयां का
इस तरह के वसाल से या रब
कया मटे दाग दिल से हजरां का
।
बह रहन शरम है बा वसफ़ शोख़ी अहतमाम इस का
नगीं में जों शरार सनग ना पीदा है नाम इस का
मसी आलोद है मुहरनवाज़श नामह ज़ाहर हे
कि दाग़ आरज़ो बोसह दीता है पयाम इस का
बामीद नगाह खास हों महमल कश हसरत
मबादा हो अनां गीर तग़ाफ़ल लतफ़ आम इस का
।
अीब का दरयाफ़त करना है हनरमनदी असद
नक़स पर अपने हवा जो मतला कामल हवा
।
शब कि ज़ोक़ गफ़तगो से तीरे दिल बे ताब था
शोख़ वहशत से अफ़सानह फ़सोन ख़वाब था
वां हजोम नग़मह हा साज़ अशरत था असद
नाख़न घाम यां सर तार नफ़स मजराब था
।
दोद को आज इस के मातम में सीह पोशी हवी
वह दल सोज़ां कि कुल तक शमा मातम ख़ानह था
शको यारां ग़बार दिल में पनहां कर दया
ग़ालब एसे कनज को शएां यही वीरानह था
ब
।
फर हवा वक़्त कि हो बाल कुशा मोज शराब
दे बत मे को दिल व दसत शना मोज शराब
पोछ मत वजह सीह मसत अरबाब चमन
सए ताक में होती है हौवा मोज शराब
जो हवा ग़रक़ मे बख़त रसा रखता हे
सर पह गज़रे पह भी है बाल हमा मोज शराब
है यह बरसात वह मोसम कि अजब कया है अगर
मोज हसती को करे फ़ीज हवा मोज शराब
चार मोज अठती है तोफ़ान तरब से हर सो
मोज गल मोज शफ़क़ मोज सबा मोज शराब
जस क़दर रोह नबाती है जिगर तशन नाज़
दे है तसकीं बौदौम आब बक़ा मोज शराब
बस कि दोड़े है रग ताक में ख़ों होहोकर
शहपर रनग से है बाल कशा मोज शराब
मोज ग़ुल से चराग़ां है गज़रगाह ख़याल
है तसोर में ज़ बस जलोह नमा मोज शराब
नशे के परदे में है महो तमाशा दमाग़
बस कि रखती है सर नशो व नमा मोज शराब
एक अालम पह हैं तोफ़ान कीफ़ीत फ़सल
मोज सबज़ नोख़ीज़ से ता मोज शराब
शरह हनगाम मसती हे ज़हे मोसम गल
रहबर क़तरह बह दरया हे ख़ोशा मोज शराब
होश अड़ते हैं मरे जलो ग़ुल दीख असद
फर हवा वक़त कि हो बाल कुशा मोज शराब
त
।
अफ़सोस कि दनदां का कया रज़क़ फ़लक ने
जिन लोगों की थी दरख़ोर अक़द गहर अनगशत
काफ़ी है नशानी तरी छले का न दीना
ख़ाली मझे दखला के बोक़त सफ़र अनगशत
लखता हों असद सोज़श दिल से सख़न गरम
ता रख न सके कोई मरे हरफ़ पर अनगशत
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ नज़ामी में अगरचह दीदां है लीकन माानी के लहाज़ से दनदां मनासब हे दीदां सहो कताबत ममकन हे।
दीदां दोदह का जमा है इस से मराद कीड़े हैं तब इस का मतलब बनता है कि अनगलयों को क़बर की कीड़ों का ख़ोराक बन दया। नसख़ महर और नसख़ह अलामह असी में लफ़्ज़ दीदां ही अया है हां अलबतह नसख़ह हमीदीह शएा करदह मजलस तरक़ी अदब लाहोर 1983 ) में लफ़्ज़ दनदान अया हे
।
रहा गर कोई ता क़यामत सलामत
फर खाक रोज मरना है हजरत सलामत
जिगर को मरे अशक़ ख़ों नाबह मशरब
लखे है ख़दओनद नामत सलामत
अली अललरग़म दशमन शहीद वफ़ा हों
मबारक मबारक सलामत सलामत
नहीं गर सर व बरग अदराक मानी
तमाशा नीरनग सूरत सलामत
।
आमद खत से हवा है सरद जो बाज़ार दोसत
दोद शमा कशतह था शएद ख़त रख़सार दोसत
अे दल नाााक़बत अनदीश जबत शौक़ कर
कौन ला सकता है ताब जलो दीदार दोसत
ख़ानह वीरां साज़ हीरत तमाशा कीजी
सोरत नक़श क़दम हों रफ़त रफ़तार दोसत
अशक़ में बीदाद रशक ग़ीर ने मारा मझे
कुशत दुश्मन हों आख़र गरचह था बीमार दोसत
चशम मा रोशन कि इस बे दर्द का दिल शाद हे
दीद पर ख़ों हमारा साग़र सरशार दोसत
क़
ग़ीर यों करता है मीरी परसश इस के हजर मीं
बे तकलफ़ दोस्त हो जीसे कोई घाम ख़वार दोसत
ताकह में जानों कि है इस की रसाई वां तलक
मझ को दीता है पयाम वाद दीदार दोसत
जब कि में करता हों अपना शको जाफ़ दमाग़
सौर करे है वह हदीस ज़लफ़ अनबर बार दोसत
चपके चपके मझ को रोते दीख पाता है अगर
हनस के करता है बयान शोख़ गफ़तार दोसत
महरबानी हा दुश्मन की शकएत कीजी
या बयां कीजे सपास लज़त आज़ार दोसत
यह गज़ल अपनी मझे जी से पसन्द अती हेाप
है रदीफ़ शार में ग़ालब ज़ बस तकरार दोसत
।
मनद गीं खोलते ही खोलते आनखीं ग़ालब
यार ला मरी बालीं पह असे पर किस वक़त
ज
।
गलशन में बनद वबसत बह रनग दगर है आज
क़मरी का तोक़ हलक़ बीरोन डर है आज
आता है एक पार दिल हर फ़ग़ां के साथ
तार नफ़स कमनद शकार असर है आज
अे अाफ़ीत कनारह कर अे अनतज़ाम चल
सीलाब गरीह डर पे दयवार व डर है आज
।
माज़ोल तपश हवी अफ़राज़ अनतज़ार
चशम कशोदह हलक़ बीरोन डर है आज
।
लो हम मरीज अशक़ के बीमारदार हीं
अछा अगर न हो तो मसीहा का कया अलाज
च
।
नफ़ौस न अनजमन आरज़ो से बाहर खीनच
अगर शराब नहीं अनतज़ार साग़र खीनच
कमाल गरम सा तलाश दीद न पोछ
बह रनग ख़ार मरे आीनह से जोहर खीनच
तझे बहान राहत है इन्तज़ार अे दल
कया है किस ने अशारह कि नाज़ बसतरखीनच
तरी तरफ़ है बह हसरत नज़ार नरगस
बह कोर दिल व चशम रक़ीब साग़र खीनच
बह नीम ग़मज़ह अदा कर हक़ वदयात नाज़
नयाम परद ज़ख़म जिगर से ख़नजर खीनच
मरे क़दह में है सहबा आतश पनहां
बरो सफ़रह कबाब दल समन्दर खीनच
द
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हसन ग़मज़े की कशाकश से छटा मीरे बाद
बारे आराम से हैं अहल जफ़ा मीरे बाद
मनसब शीफ़तगी के कोई क़ाबल न रहा
हवी माज़ोल अनदाज़ व अदा मीरे बाद
शमा बझती है तो इस में से धवां अठता हे
शाल अशक़ सीह पोश हवा मीरे बाद
ख़ों है दिल ख़ाक में अहवाल बतां पर यानी
उन के नाख़न हो महताज हना मीरे बाद
दरख़ोर अरज नहीं जोहर बीदाद को जा
नगह नाज़ है सरमे से ख़फ़ा मीरे बाद
है जनों अहल जनों के ल आग़ोश वदाा
चाक होता है गरीबां से जुदा मीरे बाद
कौन होता है हरीफ़ म मर्द अफ़गन अशक़
है मकरर लब साक़ी में सला मीरे बाद
घाम से मरता हों कि अतना नहीं दनया में कवी
कि करे ताज़ीत महर व वफ़ा मीरे बाद
आ है बे कस अशक़ पह रोना ग़ालब
किस के घर जा गा सीलाब बला मीरे बाद
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ हमीदीह में है लब साक़ी पह। अकसर नसख़ों में बाद में यही अमला हे।
* नसख़ महर असी और बाक़ी नसख़ों में लफ़्ज़ पह हे।
।
हलाक बे ख़बरी नग़म वजोद व अदम
जहान व अहल जहां से जहां जहां आबाद
।
तझ से मक़ाबले की कसे ताब है वले
मेरा लहो भी खूब है तीरी हना के बाद
र
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बला से हैं जो यह पीश नज़र डर व दयवार
नगाह शौक़ को हैं बाल व पर डर व दयवार
वफ़ोर अशक़ ने काशानह का कया यह रनग
कि हो ग मरे दयवार व डर डर व दयवार
नहीं है सएह कि सुन कर नवीद मौक़दम यार
ग हैं चनद क़दम पीशतर डर व दयवार
हवी है किस क़दर अरज़ान म जलोह
कि मसत है तरे कोचे में हर डर व दयवार
जो है तझे सर सोदा अनतज़ार तो आ
कि हैं दकान मताा नज़र डर व दयवार
हजोम गरीह का सामान कब कया में ने
कि गर पड़ी न मरे पां पर डर व दयवार
वह आ रहा मरे हम सएह मीं तो सा से
हो फ़दा डर व दयवार पर डर व दयवार
नज़र में खटके है बन तीरे घर की आबादी
हमीशह रोते हैं हम दीख कर डर व दयवार
न पोछ बे ख़ोद अीश मौक़दम सीलाब
कि नाचते हैं पड़ी सर बसर डर व दयवार
न कहह किसी से कि ग़ालब नहीं ज़माने मीं
हरीफ़ राज़ महबत मगर डर व दयवार
।
घर जब बन लिया तरे डर पर कहे बग़ीर
जाने गा अब भी तो न मरा घर कहे बग़ीर
कहते हैं जब रही न मझे ताक़त सख़न
जानों किसी के दिल की में कयोनकर कहे बग़ीर
काम इस से आ पड़ा है कि जस का जहान मीं
लयवे न कोई नाम सितम गर कहे बग़ीर
जी में ही कुछ नहीं है हमारे वगरनह हम
सर जा या रहे न रहीं पर कहे बग़ीर
छोड़ों गा में न इस बत काफ़िर का पोजना
छोड़े न ख़लक़ गो मझे काफ़ौर कहे बग़ीर
मक़्सद है नाज़ व ग़मज़ह वले गफ़तगो में काम
चलता नहीं है दुशनह व ख़नजर कहे बग़ीर
हर चनद हो मशाहद हक़ की गफ़तगो
बनती नहीं है बादह व साग़र कहे बग़ीर
बहरा हों मीं। तो चाही दोना हों अलतफ़ात
सनता नहीं हों बात मकरर कहे बग़ीर
ग़ालब न कर हजोर में तो बार बार अरज
ज़ाहर है तीरा हाल सब उन पर कहे बग़ीर
।
कयों जाल गया नह ताब रख़ यार दीख कर
जलता हों अपनी ताक़त दीदार दीख कर
आतश परसत कहते हैं अहलौ जहां मझे
सरगरम नालह हा शररबार दीख कर
कया आबरो अशक़ जहां आम हो जफ़ा
रकता हों तुम को बे सबब आज़ार दीख कर
आता है मीरे क़त्ल को पौर जोश रशक से
मरता हों इस के हाथ में तलवार दीख कर
साबत हवा है गरदन मीना पह ख़ोन ख़लक़
लरज़े है मोज मे तरी रफ़्तार दीख कर
वा हसरता कि यार ने खीनचा सितम से हाथ
हम को हरीस लज़त आज़ार दीख कर
बक जाते हैं हम आप मताा सख़न के साथ
लीकन अयार तबा ख़रीदार दीख कर
ज़ुनार बानध सबह सद दानह तोड़ डाल
रहरो चले है राह को हमवार दीख कर
उन आबलों से पां के घबरा गया था मीं
जी ख़ोश हवा है राह को पुर ख़ार दीख कर
कया बुद गमां है मझ से कि आीने में मरे
तोती का अकस समझे है ज़नगार दीख कर
गरनी थी हम पह बरक़ तजली न तो र पर
दीते हैं बादह ज़रफ़ क़दह ख़वार दीख कर
सर फोड़ना वह ग़ालब शोरीदह हाल का
याद आगया मझे तरी दयवार दीख कर
।
लरज़ता है मरा दिल ज़हमत महर दरख़शां पर
में हों वह क़तर शबनम कि हो ख़ार बयाबां पर
न छोड़ी हजरत योसफ़ ने यां भी ख़ानह आराई
सफ़ीदी दीद याक़ोब की फरती है ज़नदां पर
फ़ना तालीम दरस बे ख़ोदी हों उस ज़माने से
कि मजनों लाम अलफ़ लखता था दयवार दबसतां पर
फ़राग़त किस क़दर रहती मझे तशवीश मरहम से
बहम गर साल करते पारह हा दिल नमक दां पर
नहीं अक़लीम अलफ़त में कोई तोमार नाज़ एसा
कि पशत चशम से जस की न होवे मुहर अनवां पर
मझे अब दीख कर अबर शफ़क़ आलोदह याद आया
कि फ़रक़त में तरी आतश बरसती थी गलसतां पर
बजुज़ परवाज़ शोक़ नाज़ कया बाक़ी रहा होगा
क़यामत अक हवा तनद है ख़ाक शहीदां पर
न लड़ नासह से ग़ालब कया हवा गर इस ने शदत की
हमारा भी तो आख़र ज़ोर चलता है गरीबां पर
।
है बस कि हर खाक उन के अशारे में नशां ओर
करते हैं मौहबत तो गज़रता है गमां ओर
यारब वह न समझे हैं न समझीं गे मरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मझ को ज़बां ओर
अबरो से है कया इस नगह नाज़ को पयोनद
है तीर मक़रर मगर इस की है कमां ओर
तुम शहर में हो तो हमें कया ग़म जब अठीं गे
ले आीं गे बाज़ार से जा कर दिल व जां ओर
हर चनद सुबुक दोस्त हो बत शकनी मीं
हम हीं तो अभी राह में हैं सनग गरां ओर
है ख़ों जिगर जोश में दिल खोल के रोता
होते जो की दीद ख़ो नबानह फ़शां ओर
मरता हों इस आवाज़ पह हर चनद सर अड़ जा
जलाद को लीकन वह कहे जाईं कि हां ओर
लोगों को है ख़ोरशीद जहां ताब का धोका
हर रोज दखाता हों में खाक दाग़ नहां ओर
लीता। न अगर दिल तमीं दीता कोई दम चीन
करता।जो न मरता कोई दिन आह व फ़ग़ां ओर
पाते नहीं जब राह तो चड़ जाते हैं नाले
रुकती है मरी तबा। तो होती है रवां ओर
हैं और भी दनया में सख़नोर बहत अछे
कहते हैं कि ग़ालब का है अनदाज़ बयां ओर
।
सफ़ा हीरत आीनह है सामान ज़नग आख़र
तग़ीर " आब बरजा मानदह का पाता है रनग आख़र
न की सामान अीश व जाह ने तदबीर वहशत की
हवा जाम ज़ुमरद भी मझे दाग पलनग आख़र
।
जनों की दोस्त गीरी किस से हो गर हो न अरयानी
गरीबां चाक का हक़ हो गया है मीरी गर्दन पर
बह रनग काग़ज़ आतश ज़दह नीरनग बे ताबी
हज़ार आीनह दिल बानधे है बाल यक तपीदन पर
फ़लक से हम को अीश रफ़तह का कया कया तक़ाजा हे
मताा बुरदह को समझे हो हैं क़र्ज़ रहज़न पर
हम और वह बे सबब रनज आशना दशमन कि रखता हे
शााा महर से तुहमत नगह की चशम रोज़न पर
फ़ना को सोनप गर मशताक़ है अपनी हक़ीक़त का
फ़रोग़ ताला ख़ाशाक है मोक़ोफ़ गलख़न पर
असद बसमल है किस अनदाज़ का क़ातिल से कहता हे
तो मशक़ नाज़ कर ख़ोन दो अालम मीरी गर्दन पर
।
सितम कश मसलहत से हों कि ख़ोबां तझ पह अाशक़ हीं
तकलफ़ बर तरफ़ मल जाे गा तज सा रक़ीब आख़र
।
लाज़म था कि दीखो मरा रसतह कोई दन ओर
तनहा गे कयों अब रहो तनहा कोई दिन ओर
मट जाेगा सौर गर तरा पत्थर न घसे गा
हों डर पह तरे नासीह फ़रसा कोई दिन ओर
आे हो कुल और आज ही कहते हो कि जां
माना कि मीशह नहीं अच्चा कोई दिन ओर
जाते हवे कहते हो क़यामत को मलीं गे
कया ख़ोब क़यामत का है गोया कोई दिन ओर
हां अे फ़लक पीर जवां था अभी अारफ़
कया तीरा बगड़ ता जो न मरता कोई दिन ओर
तुम माह शब चार दहम थे मरे घर के
फर कयों न रहा घर का वह नक़शा कोई दिन ओर
तुम कौन से एसे थे खरे दाद व सतद के
करता मलकु अलमोत तक़ाजा कोई दिन ओर
मझ से तमहीं नफरत सही नीर से लड़ाई
बच्चों का भी दीखा न तमाशा कोई दिन ओर
गज़री न बहरहाल यह मदत ख़ोश व नाख़ोश
करना था जवां मरग गज़ारा कोई दिन ओर
नादां हो जो कहते हो कि कयों जीते हैं ग़ालब
क़िस्मत में है मरने की तमना कोई दिन ओर
ज़
।
हरीफ़ मतलब मुश्किल नहीं फ़सोन नयाज़
दाा क़ुबूल हो या रब कि अमर ख़जर दराज़
न हो बह हरज़ह बयाबां नोरद वहम वजोद
हनोज़ तीरे तसोर में हेनशीब व फ़राज़
वसाल जलोह तमाशा है पर दमाग़ कहां
कि दीजे आीन इन्तज़ार को परवाज़
हर एक ज़र अाशक़ है आफ़ताब परसत
गी न ख़ाक हो पर हवा जलो नाज़
न पोछ वसात मे ख़ान जनों ग़ालब
जहां यह कास गरदों है एक ख़ाक अनदाज़
।
फ़ारग़ मझे न जान कि माननद सुबह व महर
है दाग़ अशक़ ज़ीनत जीब कफ़न हनोज़
है नाज़ मफ़लसां ज़र अ ज़ दोस्त रफ़तह पर
हों गल फ़रोश शोख़ दाग़ कहन हनोज़
मे ख़ान जिगर में यहां ख़ाक भी नहीं
ख़मयाज़ह खीनचे है बत बीदाद फ़न हनोज़
।
कयों कर इस बत से रखों जान अज़ीज़
कया नहीं है मझे एमान अज़ीज़
दिल से नकला। पह न नकला दिल से
है तरे तीर का पीकान अज़ीज़
ताब लाते ही बने गी ग़ालब
वाक़ाई सख्त है और जान अज़ीज़
।
वसात साई करम दीख कि सर ता सर ख़ाक
गज़रे है आबलह पा अबर गहरबार हनोज़
यक क़लम काग़ज़ आतश ज़दह है सफ़ह दशत
नक़श पा में है तप गरम रफ़्तार हनोज़
।
ग़ुल खले ग़नचे चटकने लगे और सुबह हवी
सरख़ोश ख़वाब है वह नरगस मख़मोर हनोज़
।
न ग़ुल नग़मह हों न परद साज़
में हों अपनी शकसत की आवाज़
तो और आराश ख़म काकल
में और अनदीशह हा दूर दराज़
लाफ़ तमकीं फ़रीब सादह दली
हम हीं और राज़ हा सीनह गदाज़
हों गरफ़तार अलफ़त सयाद
वरनह बाक़ी है ताक़त परवाज़
वह भी दिन हो कि इस सितम गर से
नाज़ खीनचों बजा हसरत नाज़
नहीं दिल में मरे वह क़तर ख़ोन
जस से मज़गां हवी न हो गलबाज़
अे तरा ग़मज़ह यक क़लम अनगीज़
अे तरा ज़लम सर बसर अनदाज़
तो हवा जलोह गर मबारक हो
रीज़श सजद जबीन नयाज़
मझ को पोछा तो कुछ ग़जब न हवा
में ग़रीब और तो ग़रीब नवाज़
असद अललह ख़ां तमाम हवा
अे दरीग़ा वह रनद शाहद बाज़
स
।
मुख़दह ، अे ज़ौोक़ असीरी ! कि नज़र आता है
दाम ख़ाली ، क़फ़ौस मुरग़ गरफ़तार के पास
जगर तशन आज़ार ، तसली न हवा
जुवे ख़ुों हम ने बहाई बुन हर ख़ार के पास
मुनद गीं खोलते ही खोलते आनखीं हौे हौे
ख़ुोब वक़्त आे तुम अस अाशक़ बीमार के पास
मौीं भी रुक रुक के न मरता ، जो ज़बां के बदले
दशनह अक तीज़ सा होता मरे ग़मख़वार के पास
दौहौन शीर में जा बीठये ، लीकन अे दिल
न खड़े होजये ख़ुोबान दिल आज़ार के पास
दीख कर तझ को ، चमन बसकह नुमो करता है
ख़ुोद बख़ोद पहनचे है गुल गोश दसतार के पास
मर गया फोड़ के सर ग़ालब वहशी ، हौे हौे !
बीठना उस का वह ، आ कर ، तरी दयवार के पास
।
अे असद हम ख़ोद असीर रनग व बो बाघ हीं
ज़ाहरा सयाद नादां है गरफ़तार होस
श
।
न लयवे गर ख़स जौोहर तरओत सबज़ खत से
लगादे ख़ान आीनह में रुवे नगार आतश
फ़रोग़ हुसन से होती है हल मुशकल अाशक़
न नकले शमा के पासे ، नकाले गरनह ख़ार आतश
अ
।
जाद रह ख़ुोर को वक़त शाम है तार शााा
चरख़ वा करता है माह नौ से आग़ोश वदाा
।
रुख़ नगार से है सोज़ जओदानी शमा
हवी है आतश गुल आब ज़नदगानी शमा
ज़बान अहल ज़बां में है मरग ख़ामोशी
यह बात बज़म में रोशन हवी ज़बानी शमा
करे है सरफ़ बह एमाे शालह क़सह तमाम
बह तरज़ अहल फ़ना है फ़सानह ख़वानी शमा
घाम उस को हसरत परवानह का है अे शालह
तरे लरज़ने से ज़ाहर है नातवानी शमा
तरे ख़याल से रुोह अहतज़ाज़ करती है
बह जलोह रीज़ बाद व बह परफ़शानी शमा
नशात दाग़ ग़म अशक़ की बहार न पुोछ
शगफ़तगी है शहीद गुल ख़ज़ानी शमा
जले है ، दीख के बालीन यार पर मझ को
न कयों हो दिल पह मरे दाग़ बदगमानी शमा
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर मीं शालह ، नसख़ह असी में शाले। शालह ज़यादह सहीह हे
फ़
।
बीम रक़ीब से नहीं करते वदाा होश
मजबोर यां तलक हवे अे अख़तयार ، हीफ़ !
जलता है दिल कि कयों न हम अक बार जाल गे
अे नातमामी नौफ़ौस शालह बार हीफ़ !
क
।
ज़ख़म पर छड़कीं कहां तफ़लान बे परवा नमक
कया मज़ा होता ، अगर पत्थर में भी होता नमक
गरद राह यार है सामान नाज़ ज़ख़म दिल
वरनह होता है जहां में किस क़दर पीदा नमक
मझ को अरज़ानी रहे ، तझ को मबारक हो जयो
नाल बुलबुल का दर्द और ख़नद गुल का नमक
शोर जोलां था कनार बहर पर किस का कि आज
गरद साहल है बह ज़ख़म मोज दरया नमक
दाद दीता है मरे ज़ख़म जिगर की ، वाह वाह !
याद करता है मझे ، दीखे है वह जस जा नमक
छोड़ कर जाना तन मजरोह अाशक़ हीफ़ है
दिल तलब करता है ज़ख़म और मानगे हैं अाजा नमक
ग़ीर की मनत न खीनचों गा पौे तोफ़ीर दर्द
ज़ख़म ، मसल ख़नद क़ातिल है सर ता पा नमक
याद हैं ग़ालब ! तुझे वह दिन कि वजद ज़ोक़ में
ज़ख़म से गरता ، तो में पलकों से चुनता था नमक
।
आह को चाहये अक अुमर असर होने तक
कौन जीता है तरी ज़ुलफ़ के सर होने तक
दाम हर मोज में है हलक़ सद काम नहनग
दीखीं कया गुज़रे है क़तरे पह गुहर होने तक
अाशक़ी सबर तलब ، और तमना बीताब
दिल का कया रनग करों ख़ोन जिगर होनेतक
हम ने माना कि तग़ाफ़ल न करो गे ، लीकन
ख़ाक होजाईं गे हम तुम को ख़बर होने तक
परतो ख़ुोर से ، है शबनम को फ़ना की तालीम
में भी हों ، एक अनएत की नज़र होने तक
यक नज़र बीश नहीं फ़ुरसत हसती ग़ाफ़ल !
गरम बज़म है अक रक़स शरर होने तक
ग़म हसती का ، असद ! किस से हो जुज़ मरग ، अलाज
शमा हर रनग में जलती है सहर होने तक
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* अकसर क़दीम नसख़ों में होते तक रदीफ़ है नसख़ नज़ामी में भी लीकन कयों कि नसख़ हमीदीह में मरोज क़रत होने तक ही दी गी है इस ल असी को क़ाबल तरजीह क़रार दिया गया हे।
।
दीखने में हैं गरचह दो पर हैं यह दोनों यार एक
वजा में गो हवी दो सर तीग़ है ज़वालफ़क़ार एक
हम सख़न और हम ज़बां हजरत क़ाससम व तबां
एक तपश का जानशीन दर्द की यादगार एक
नक़द सख़न के वासते एक अयार आगही
शार के फ़न के वासते मए अातबार एक
एक वफ़ा व महर में ताज़ग बसात दहर
लतफ़ व करम के बाब में ज़ीनत रोज़गार एक
गुलकद तलाश को एक है रनग खाक है बो
रीख़तह के क़माश को पोद है एक तार एक
ममलकत कमाल में एक अमीर नामोर
अरस क़ील व क़ाल मीं ख़सरो नामदार एक
गलशन अतफ़ाक़ में एक बहार बे ख़ज़ां
मे कद वफ़ाक़ में बाद बे ख़मार एक
ज़नद शोक़ शार को एक चराग़ अनजमन
कुशत ज़ोक़ शार को शमा सर मज़ार एक
दोनों के दिल हक़ आशना दोनों रसोल स पर फ़दा
एक मुहब चार यार अाशक़ हशत व चार एक
जान वफ़ा परसत को एक शमीम नौ बहार
फ़रक़ सतीज़ह मसत को अबर तगरग बार एक
लएा है कहह के यह ग़ज़ल शाब रया से दोर
कर के दिल व ज़बान को ग़ालब ख़ाकसार एक
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़े में अगरचह तपश है लीकन सहीह तपश ही दरसत होना चाह
ग
।
गर तुझ को है यक़ीन अजाबत ، दुाा न मानग
यानी बग़ीर यक दल बे मुदाा न मानग
आता है दाग़ हसरत दिल का शमार याद
मुझ से मरे गुनह का हसाब ، अे ख़दा न मानग
ल
।
है किस क़दर हलाक फ़रीब वफ़ाे गुल
बुलबुल के कारोबारपह हैं ख़नदह हाे गुल
आज़ाद नसीम मबारक कि हर तरफ़
टोटे पड़ी हैं हलक़ दाम हवाे गुल
जो था ، सौ मोज रनग के धोके में मर गया
अे वाे ، नाल लब ख़ोनीं नवाे गुल !
ख़ोश हाल उस हरीफ़ सीह मसत का कि जो
रखता हो मसल सए गुल ، सर बह पाे गुल
एजाद करती है उसे तीरे लिये बहार
मेरा रक़ीब है नौफ़ौस अतर साे गुल
शरमनदह रखते हैं मझे बाद बहार से
मीना बे शराब व दल बे हवाे गुल
सतोत से तीरे जलो हुसन ग़योर की
ख़ों है मरी नगाह में रनग अदाे गुल
तीरे ही जलवे का है यह धोखा कि आज तक
बे अख़तयार दोड़े है गुल डर क़फ़ाे गुल
ग़ालब ! मझे है उस से हम आग़ोशी आरज़ो
जस का ख़याल है गुल जीब क़बाे गुल
म
।
घाम नहीं होता है आज़ादों को बीश अज़ यक नफ़स
बरक़ से करते हैं रोशन शमा मातम ख़ानह हम
महफ़लीं बरहम करे है गनजफ़ह बाज़ ख़याल
हैं वरक़ गरदान नीरनग यक बत ख़ानह हम
बओजोद यक जहां हनगामह पीरा ही नहीं
हैं चराग़ान शबसतान दल परवानह हम
जाफ़ से हे ने क़नाात से यह तरक जसतजो
हैं वबाल तकीह गाह हमत मरदानह हम
दाम अलहबस इस में हैं लाखों तमनाईं असद
जानते हैं सीन पुर ख़ों को ज़नदां ख़ानह हम
।
बह नालह दिल बसतगी फ़राहम कर
मताा ख़ान ज़नजीर जज़ सदा मालोम
।
मझ को दयार ग़ीर में मारा वतन से दोर
रख ली मरे खुद ने मरी बेकसी की शरम
वह हलक़ हा ज़लफ़ कमीं में हैं अे खुद
रख लीजो मीरे दाो वारसतगी की शरम
।
रसीदन गल बाघ वामानदगी है
अबस महफ़िल आरा रफ़्तार हैं हम
तमाशा गलशन तमाशा चीदन
बहार आफ़रीना गनह गार हैं हम
न ज़ोक़ गरीबां न परवा दामां
नगाह आशना ग़ुल व ख़ार हैं हम
असद शकोह कफ़र दाा नासपासी
हजोम तमना से लाचार हैं हम
न
।
लों वाम बख़त ख़फ़तह से यक ख़वाब ख़ोश वले
ग़ालब यह ख़ोफ़ है कि कहां से अदा करों
।
वह फ़िराक़ और वह वसाल कहां
वह शब व रोज व माह व साल कहां
फ़रसत कारोबार शौक़ कसे
ज़ोक़ नज़ार जमाल कहां
दिल तो दिल वह दमाग़ भी न रहा
शोर सोदाे ख़त व ख़ाल कहां
थी वह खाक शख़स के तसोर से
अब वह रानाई ख़याल कहां
एसा आसां नहीं लहो रोना
दिल मींताक़त जिगर में हाल कहां
हम से छोटा क़मार ख़ान अशक़
वां जो जओीं गरह में माल कहां
फ़िक्र दनया में सर खपाता हों
में कहां और यह वबाल कहां
मजमहल हो गे क़वी ग़ालब
वह अनासर में अातदाल कहां
।
की वफ़ा हम से तो ग़ीर इस को जफ़ा कहते हैं
होती आी है कि अछों को बुरा कहते हैं
आज हम अपनी परीशान ख़ातर उन से
कहने जाते तो हीं पर दीखे कया कहते हैं
अगले वक़तों के हैं यह लोग उन्हें कुछ न कहो
जो मे व नग़मह को अनदोह रुबा कहते हैं
दिल में आ जाे हे होती है जो फ़रसत ग़श से
और फर कौन से नाले को रसा कहते हैं
है परे सरहद अदराक से अपना मसजोद
क़बले को अहल नज़र क़बलह नमा कहते हैं
पाे अफ़गार पह जब से तझे रहम आया है
ख़ार रह को तरे हम महर गया कहते हैं
खाक शरर दिल में है उस से कोई घबराे गा कया
आग मतलोब है हम को जो हौवा कहते हैं
दीखये लाती है उस शोख़ की नख़ोत कया रनग
उस की हर बात पह हम नाम ख़दा कहते हैं
वहशत व शीफ़तह अब मरसीह कहवीं शएद
मर गया ग़ालब आशफ़तह नवा कहते हैं
।
आबरो कया ख़ाक उस गुल की। कि गलशन में नहीं
है गरीबान ननग पीराहन जो दामन में नहीं
जाफ़ से अे गरीह कुछ बाक़ी मरे तन में नहीं
रनग हो कर अड़ गया जो ख़ों कि दामन में नहीं
हो गे हैं जमा अजज़ाे नगाह आफ़ताब
ज़रे उस के घर की दयवारों के रोज़न में नहीं
कया कहों तारीक ज़नदान घाम अनधीर है
पनबह नोर सुबह से कम जस के रोज़न मीं नहीं
रोनक़ हसती है अशक़ ख़ानह वीरां साज़ से
अनजमन बे शमा है गर बरक़ ख़रमन में नहीं
ज़ख़म सलवाने से मझ पर चारह जवी का है तान
ग़ीर समझा है कि लज़त ज़ख़म सोज़न में नहीं
बस कि हैं हम खाक बहार नाज़ के मारे होुे
जलो गुल के सवा गरद अपने मदफ़न में नहीं
क़तरह क़तरह खाक हयोली है ने नासोर का
ख़ुों भी ज़ोक़ दर्द से फ़ारग़ मरे तन में नहीं
ले गी साक़ी की नख़ोत क़लज़म आशामी मरी
मोज मे की आज रग मीना की गर्दन में नहीं
हो फ़शार जाफ़ में कया ना तवानी की नमोद
क़द के झकने की भी गनजाश मरे तन में नहीं
थी वतन में शान कया ग़ालब कि हो ग़रबत में क़दर
बे तकलफ़ हों वह मशत ख़स कि गलख़न में नहीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर और असी में " हम हीं दरज है
।
अहदे से मदहनाज़ के बाहर न आ सका
गराक अदा हो तो उसे अपनी क़जा कहों
हलक़े हैं चशम हाे कशादह बसवे दिल
हर तार ज़लफ़ को नगह सुरमह सा कहों
मीं और सद हज़ार नवाे जिगर ख़राश
तो और एक वह न शनीदन कि कया कहों
ज़ालम मरे गमां से मझे मनफ़ाल न चाह
हौे हौे ख़ुदा न करदह तझे बे वफ़ा कहों
108 ।
महरबां हो के बलालो मझे चाहो जस वक़्त
में गया वक़्त नहीं होंकह फर आ भी न सकों
जाफ़ में तान अग़यार का शकोह कया है
बात कुछ सौर तो नहीं है कि अठा भी न सकों
ज़हर मलता ही नहीं मझ को सतमगर वरनह
कया क़िस्म है तरे मलने की कि ख भी न सकों
।
हम से खल जा बोक़त मे परसती एक दिन
वरनह हम छीड़ीं गे रख कर अुज़र मसती एक दिन
ग़र ओज बनाे अालम अमकां न हो
अस बलनदी के नसीबों में है पसती एक दिन
क़र्ज़ की पीते थे मे लीकन समझते थे कि हां
रनग लाे गी हमारी फ़ाक़ह मसती एक दिन
नग़मह हाे घाम को ही अे दिल ग़नीमत जानये
बे सदा हो जाे गा यह साज़ ज़नदगी एक दिन
दौोल दौपा उस सरापा नाज़ का शयोह नहीं
हम ही कर बीठे थे ग़ालब पीश दसती एक दिन
।
हम पर जफ़ा से तरक वफ़ा का गमां नहीं
अक छीड़ है वगरनह मराद अमतहां नहीं
किस मनह से शकर कीजे इस लतफ़ खास का
परसश है और पाे सख़न दरमयां नहीं
हम को सितम अज़ीज़ सितम गर को हम अज़ीज़
ना महरबां नहीं है अगर महरबां नहीं
बोसह नहीं न दीजये दशनाम ही सही
आख़र ज़बां तो रखते हो तम गर दहां नहीं
हर चनद जां गदाज़ क़हरवाताब है
हर चनद पशत गरम ताब व तवां नहीं
जां मतरब तरानह ौल मन मौज़ीद है
लब पर दह सनज ज़मज़म अलाौमां नहीं
ख़नजर से चीर सीनह अगर दिल न हो दो नीम
दिल में चुरी चभो मख़ह गर ख़ोनचकां नहीं
है ननग सीनह दिल अगर आतश कदह न हो
है अारदल नफ़स अगर आज़र फ़शां नहीं
नक़सां नहीं जनों में बला से हो घर ख़राब
सौ गज़ ज़मीं के बदले बयाबां गरां नहीं
कहते हो “ कया लखा है तरी सरनोशत मीं
गोया जबीं पह सजद बत का नशां नहीं
पाता हों इस से दाद कुछ अपने कलाम की
रुोह अलक़ुदुस अगरचह मरा हम ज़बां नहीं
जां है बहाे बोसह वले कयों कहे अभी
ग़ालब को जानता है कि वह नीम जांनहीं
।
माना दशत नोरदी कोई तदबीर नहीं
एक चकर है मरे पां में ज़नजीर नहीं
शौक़ इस दशत में दोड़ाे है मझ कोकह जहां
जादह ग़ीर अज़ नगह दीद तसवीर नहीं
हसरत लज़त आज़ार रही जाती है
जाद राह वफ़ा जज़ दम शमशीर नहीं
रनज नौ मीदी जओीद गवारा रहयो
ख़ोश हों गर नालह ज़बोनी कश तासीर नहीं
सर खजाता है जहां ज़ख़म सर अच्चा हो जाे
लज़त सनग बह अनदाज़ तक़रीर नहीं
जब करम रख़सत बीबाकी व गसताख़ी दे
कोई तक़सीर बजुज़ ख़जलत तक़सीर नहीं
ग़ालब अपना यह अक़ीदह है बक़ोल नासख़
आप बे बहरह है जो मातक़द मीर नहीं
।
मत मरदुमक दीदह में समझो यह नगाहीं
हैं जमा सुवीदा दल चशम में आहीं
।
बरशकाल गरी अाशक़ हे दीखा चाह
खल गी मानद गलु सोौ जा से दयवार चमन
उलफ़त ग़ुल से ग़लत है दाो वारसतगी
सरो है बओसफ़ आज़ादी गरफ़तार चमन
है नज़ाकत बस कि फ़सल ग़ुल में मामार चमन
क़ालब ग़ुल में ढली है ख़शत दयवार चमन
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* तबातबा में है की जगह भी हे।
।
अशक़ तासीर से नोमीद नहीं
जां सपारी शजर बीद नहीं
सलतनत दोस्त बौदौसत आी है
जाम मे ख़ातम जमशीद नहीं
है तजली तरी सामान वजोद
ज़रह बे पर तो ख़ोरशीद नहीं
राज़ माशोक़ न रसवा हो जाे
वरनह मर जाने में कुछ भीद नहीं
गरदश रनग तरब से डर है
ग़म महरोम जओीद नहीं
कहते हैं जीते हैं उमीद पह लूग
हम को जीने की भी अमीद नहीं
।
जहां तीरा नक़श क़दम दीखते हैं
ख़याबां ख़याबां अरम दीखते हैं
दिल आशफ़तगां ख़ाल कनज दहन के
सवीदा में सीर अदम दीखते हैं
तरे सरो क़ामत से खाक क़द आदम
क़यामत के फ़तने को कम दीखते हैं
तमाशा कर अे महो आीनह दारी
तझे किस तमना से हम दीखते हैं
सराग़ तुफ़ नालह ले दाग़ दिल से
कि शब रौो का नक़श क़दम दीखते हैं
बन कर फ़क़ीरों का हम भीस ग़ालब
तमाशाे अहल करम दीखते हीं
।
मलती है ख़ुवे यार से नार अलतहाब में
काफ़िर हों गर न मलती हो राहत अज़ाब में
कब से हुों। कया बतां जहान ख़राब में
शब हाे हजर को भी रखों गर हसाब में
ता फर न इन्तज़ार में नीनद आे उमर भर
आने का अहद कर गे आे जो ख़वाब में
क़ासद के आते आते खत खाक और लिख रखों
में जानता हों जो वह लखीं गे जवाब में
मझ तक कब उन की बज़म में आता था दोर जाम
साक़ी ने कुछ मला न दिया हो शराब में
जो मनकर वफ़ा हो फ़रीब इस पह कया चले
कयों बदगमां हों दोस्त से दुश्मन के बाब में
में मजतरब हूँ वसल में ख़ोफ़ रक़ीब से
डाला है तुम को वहम ने किस पीच व ताब में
में और हज़ वसल खुद साज़ बात है
जां नज़र दीनी भूल गया अजतराब में
है तयोरी चड़ी हवी अन्दर नक़ाब के
है खाक शकन पड़ी हवी तरफ़ नक़ाब में
लाखों लगा एक चुराना नगाह का
लाखों बना एक बगड़ना अताब में
वह नालह दिल में ख़स के बराबर जगह न पाे
जस नाले से शगाफ़ पड़ी आफ़ताब में
वह सहर मदाा तलबी में काम न आे
जस सहर से सफ़ीनह रवां हो सराब में
ग़ालब चुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हों रोज़ अबर व शब माहताब मीं
।
कुल के ले कर आज न ख़सत शराब में
यह सुो ज़न है साक़ कोसर के बाब में
हैं आज कयों ज़लील कि कुल तक न थी पसन्द
गसताख़ फ़रशतह हमारी जनाब में
जां कयों नकलने लगती है तन से दम समाा
गर वह सदा समाई है चनग व रबाब में
रौो मींहे रख़श अमर कहां दीखये थमे
ने हाथ बाग पर है न पा है रकाब में
अतना ही मझ को अपनी हक़ीक़त से बुाद है
जतना कि वहम ग़ीर से हूँ पीच व ताब में
असल शहोद व शाहद व मशहोद एक है
हीरां हों फर मशाहदह है किस हसाब में
है मशतमल नमुोद सुोौर पर वजोद बहर
यां कया धरा है क़तरह व मोज व हबाब में
शरम खाक अदाे नाज़ है अपने ही से सही
हैं कतने बे हजाब कि हैं युों हजाब मीं
आराश जमाल से फ़ारग़ नहीं हनोज़
पीश नज़र है आीनह दाम नक़ाब में
है ग़ीब ग़ीब जस को समझते हैं हम शहोद
हींख़वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़वाब में
ग़ालब नदीम दोस्त से आती है बवे दोस्त
मशग़ोल हक़ हों बनदग बुो तराब मीं
।
हीरां हों दिल को रों कि पीटों जिगर को मौीं
मक़दोर हो तो साथ रखों नोहह गर को मौीं
छोड़ा न रशक ने कि तरे घर का नाम लों
हर खाक से पुो छता हों कि “ जां कधर को मौीं
जाना पड़ा रक़ीब के डर पर हज़ार बार
अे काश जानता न तरी रह गज़र को मौीं
है कया जो कस के बानधये मीरी बला डरे
कया जानता नहीं हूँ तमारी कमर को मौीं
लो वह भी कहते हैं कि यह बे ननग व नाम हे
यह जानता अगर तो लुटाता न घर को मौीं
चलता हों थोड़ी दुोर हर खाक तीज़ रौो के साथ
पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मौीं
ख़वाहश को अहमक़ों ने परसतश दिया क़रार
कया पुोजता हों इस बुत बीदाद गर को मौीं
फर बे ख़ोदी में भूल गया राह कवे यार
जाता वगरनह एक दिन अपनी ख़बर को मौीं
अपने पह कर रहा हूँ क़यास अहल दहर का
समझा हों दिल पज़ीर मताा हुनर को में
ग़ालब खुद करे कि सवार समनदर नाज़
दीखों अली बहादर अाली गुहर को में
।
ज़कर मेरा बह बदी भी उसे मनज़ोर नहीं
ग़ीर की बात बगड़ जाे तो कुछ दुोर नहीं
वाद सीर गलसतां हे ख़ोशा ताला शौक़
मख़द क़त्ल मक़दर है जो मज़कोर नहीं
शाहद हसत मतलक़ की कमर है अालौम
लूग कहते हैं कि ’ हे पर हमींमनज़ोर नहीं
क़तरह अपना भी हक़ीक़त में है दरया लीकन
हम को तक़लीद तुनक ज़रफ़ मनसोर नहीं
हसरत अे ज़ोक़ ख़राबी कि वह ताक़त न रही
अशक़ पुर अरबौदह की गों तन रनजोर नहीं
ज़लम कर ज़लम अगर लतफ़ दरीग़ आता हो
तुो तग़ाफ़ल मींकसी रनग से माज़ोर नहीं
में जो कहता हों कि हम लीं गे क़यामत में तमीं
किस राोनत से वह कहते हैं कि “ हम होर नहीं
साफ़ दुरदी कश पीमान जम हैं हम लूग
वाे वह बादह कि अफ़शरद अनगोर नहीं
हूँ ज़होरी के मक़ाबल में ख़फ़ाई ग़ालब
मीरे दावे पह यह हजत हेकह मशहोर नहीं
।
नालह जुज़ हसन तलब अे सितम एजाद नहीं
है तक़ाजाे जफ़ा शको बीदाद नहीं
अशक़ व मज़दोरी अशरत गह ख़सरो कया ख़ुोब
हम को तसलीम नको नाम फ़रहाद नहीं
कम नहीं वह भी ख़राबी मीं पह वसात मालूम
दशत में है मझे वह अीश कि घर याद नहीं
अहल बीनश को है तोफ़ान हवादस मकतब
लतम मोज कम अज़ सील असताद नहीं
वाे मज़लोम तसलीम वबदाहाल वफ़ा
जानता है कि हमें ताक़त फ़रयाद नहीं
रनग तमकीन गुल व लालह परीशां कयों हे
गर चराग़ान सर राह गुज़र बाद नहीं
सौबौद गुल के तले बनद करे है गलचीं
मख़दह अे मरग़ कि गलज़ार में सयाद नहीं
नफ़ी से करती है असबात तरओश गोया
दी ही जाे दहन इस को दम एजाद “ नहीं
कम नहीं जलोह गरी में तरे कोचे से बहशत
यही नक़शह है वले इस क़दर आबाद नहीं
करते किस मनह से हो ग़रबत की शकएत ग़ालब
तुम को बे महर यारान वतन याद नहीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में तरओश
।
दोनों जहान दे के वह समझे यह ख़ोश रहा
यां आ पड़ी यह शरम कि तकरार कया करीं
थक थक के हर मक़ाम पह दो चार रह गे
तीरा पतह न पाईं तो नाचार कया करीं
कया शमा के नहीं हैं हवा ख़वाह अहल बज़म
हो घाम ही जां गदाज़ तो घाम ख़वार कया करीं
।
हो गी है ग़ीर की शीरीं बयानी कारगर
अशक़ का इस को गमां हम बे ज़बानों पर नहीं
।
क़यामत है कि सुन लीली का दशत क़ीस में आना
ताजब से वह बोला यों भी होता है ज़माने मीं
दल नाज़क पह इस के रहम आता है मझे ग़ालब
न कर सरगरम इस काफ़िर को उलफ़त आज़माने मीं
।
दिल लगा कर लग गया उन को भी तनहा बीठना
बारे अपनी बे किसी की हम ने पाई दाद यां
हैं ज़वाल आमादह अजज़ा आफ़रीनश के तमाम
महर गरदों है चराग़ रहगज़ार बाद यां
।
यह हम जो हजर में दयवार व डर को दीखते हैं
कभी सबा को कभी नामह बर को दीखते हैं
वह आीं घर में हमारे खुद की क़ुदररत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को दीखते हीं
नज़र लगे न कहीं उस के दोस्त व बाज़ो को
यह लूग कयों मरे ज़ख़म जिगर को दीखते हैं
तरे जवाहर तरफ़ कुलह को कया दीखीं
हम ओज ताला लाल व गहर को दीखते हीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ नज़ामी में आ
।
नहीं कि मझ को क़यामत का अातक़ाद नहीं
शब फ़िराक़ से रोज़ जज़ा ज़याद नहीं
कोई कहे कि शब मौह में कया बुराई हे
बला से आज अगर दिन को अबर व बाद नहीं
जो आं सामने उन के तो मरहबा न कहीं
जो जां वां से कहीं को तो ख़ीर बाद नहीं
कभी जो याद भी आता हों मीं तो कहते हैं
कि ’ आज बज़म में कुछ फ़तन व फ़साद नहीं
अलओह अीद के मलती है और दिन भी शराब
गदाे कुोच मे ख़ानह नामराद नहीं
जहां में हो घाम व शादी बहम हमें कया काम ؟
दिया है हम को खुद ने वह दिल कि शाद नहीं
तुम उन के वादे का ज़कर उन से कयों करो ग़ालब
यह कया कि तुम कहो और वह कहीं कहयाद नहीं
।
तीरे तोसन को सबा बानधते हैं
हम भी मजमों की हौवा बानधते हैं
आह का किस ने असर दीखा है
हम भी खाक अपनी हवा बानधते हैं
तीरी फ़रसत के मक़ाबल अे अुमर
बरक़ को पाबह हना बानधते हैं
क़ीद हसती से रहाई मालोम
अशक को बे सरोपा बानधते हैं
नश रनग से है वाशुद ग़ुल
मसत कब बनद क़बा बानधते हैं
ग़लती हाे मजामीं मत पुोछ
लूग नाले को रसा बानधते हैं
अहल तदबीर की वामानदगयां
आबलों पर भी हना बानधते हैं
सादह पुरकार हैं ख़ोबां ग़ालब
हम से पीमान वफ़ा बानधते हीं
।
ज़मानह सख्त कम आज़ार हे बह जान असद
वगरनह हम तो तोक़ा ज़यादह रखते हीं
।
दाम पड़ा हुवा तरे डर पर नहीं हूँ में
ख़ाक एसी ज़नदगी पह कि पत्थर नहीं हूँ में
कयों गरदश मदाम से गभरा न जाे दिल
इन्सान हों पयालह व साग़र नहीं हूँ में
या रब ज़मानह मझ को मटाता है किस लये
लोह जहां पह हरफ़ मकरर नहीं हूँ में
हद्द चाहये सज़ा में अक़ोबत के वासते
आख़र गनाहगार हूँ काफ़ौर नहीं हूँ मीं
किस वासते अज़ीज़ नहीं जानते मझे
लाल व ज़मरद व ज़र व गोर नहीं हूँ में
रखते हो तुम क़दम मरी आँखों से कयों दरीग़
रतबे में महर व माह से कमतर नहीं हूँ मीं
करते हो मझ को मना क़दम बोस किस लये
कया आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मीं
ग़ालब वज़ीफ़ह ख़वार हो दो शाह को दाा
वह दिन गे कह कहते थे नोकर नहीं हूँ मीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* कुछ नसख़ों में जो
* ’ महर ने पानचवीं। छटे और सातवीं शार को नातीह अशाार में शमार कया हे।
।
सब कहां कुछ लालह व ग़ुल में नमएां हो गीं
ख़ाक में कया सोरतीं हों गी कि पनहां हो गीं
याद थीं हम को भी रनगारनग बज़म आरायां
लीकन अब नक़्शा व नगार ताक़ नसयां हो गीं
थीं बनात अलनाश गरदों दिन को परदे में नहां
शब को उन के जी में कया आी कि अरयां हो गीं
क़ीद में याक़ोब ने ली गो न योसफ़ की ख़बर
लीकन आनखीं रोज़न दयवार ज़नदां हो गीं
सब रक़ीबों से हों नाख़ोश पर ज़नान मसर से
है ज़लीख़ा ख़ोश कि महो माह कनाां हो गीं
जुवे ख़ों आँखों से बहने दो कि है शाम फ़िराक़
में यह समझों गा कि शमाईं दो फ़रोज़ां हो गीं
उन परी ज़ादों से लीं गे ख़लद में हम अनतक़ाम
क़दरत हक़ से यही होरीं अगर वां हो गीं
नीनद उस की हे दमाग़ उस का हे रातीं उस की हैं
तीरी ज़लफ़ीं जस के बाज़ो पर परीशां हो गीं
में चमन में कया गया गोया दबसतां कुल गया
बलबलीं सुन कर मरे नाले गज़ल ख़वां हो गीं
वह नगाहीं कयों हुवी जाती हैं यारब दिल के पार
जो मरी कोताह क़िस्मत से मख़गां हो गीं
बस कि रोका में ने और सीने में उभरीं पौे बह पौे
मीरी आहीं बख़ीह चाक गरीबां हो गीं
वां गया भी में तो उन की गालयों का कयाजवाब
याद थीं जतनी दााईं सरफ़ दरबां हो गीं
जां फ़ज़ा है बादह जस के हाथ में जाम आ गया
सब लकीरीं हाथ की गोया रग जां हो गीं
हम मोहद हैं हमारा कीश है तरक रसुोम
मलतीं जब मट गीं अजज़ाे एमां हो गीं
रनज से ख़ुोगर हुवा अनसां तो मट जाता है रनज
मशकलीं मझ पर पड़ीं अतनी कि आसां हो गीं
यों ही गर रोता रहा ग़ालब तो अे अहल जहां
दीखना उन बसतयों को तुम कि वीरां हो गहीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
हाली यादगार ग़ालब में यों हे जस के बाज़ो पर तरी ज़लफ़ीं परीशां हो गीं
।
दयवानगी से दोश पह ज़नार भी नहीं
यानी हमारे जीब में खाक तार भी नहीं
दिल को नयाज़ हसरत दीदार कर चके
दीखा तो हम में ताक़त दीदार भी नहीं
मलना तरा अगर नहीं आसां तो सहल है
दशवार तो यही है कि दशवार भी नहीं
बे अशक़ अुमर कट नहीं सकती है और यां
ताक़त बह क़दरलज़त आज़ार भी नहीं
शोरीदगी के हाथ से सर है वबाल दोश
सहरा में अे खुद कोई दयवार भी नहीं
गनजाश अदओत अग़यार खाक तरफ़
यां दिल में जाफ़ से होस यार भी नहीं
डर नालह हाे ज़ार से मीरे ख़ुदा को मान
आख़र नवाे मरग़ गरफ़तार भी नहीं
दिल में है यार की सफ़ मख़गां से रोकशी
हालानकह ताक़त ख़लश ख़ार भी नहीं
इस सादगी पह कों न मर जाे अे ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
दीखा असद को ख़लोत व जलोत में बारहा
दयवानह गर नहीं है तो हशयार भी नहीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* जौीब जीम पर फ़तह ज़बर मज़कर हे बमानी गरीबान। उर्दू में जीब जीम पर कसरह ज़ीर के साथ बमानी कीसह (Pocket) इस्तेमाल में ज़यादह हे यह लफ़्ज़ मनस हेास बाास अकसर नसख़ों में हमारी है क़दीम अमला में या मारोफ़ ही या मजहोल बड़ी एकी जगह भी इस्तेमाल की जाती थी इस ल यह ग़लत फ़हमी मज़ीद बड़ गी।
।
नहीं है रख़म कोई बख़ये के दरख़ुोर मरे तन में
हुवा है तार अशक यास रशतह चशम सोज़न में
हुवी है माना ज़ोक़ तमाशा ख़ानह वीरानी
कफ़ सीलाब बाक़ी है बरनग पनबह रोज़न मीं
वदयात ख़ान बे दाद कओश हाे मख़गां हों
नगीन नाम शाहद है मरा हर क़तरह ख़ों तन में
बयां किस से हो ज़लमत गसतरी मीरे शबसतां की
शब मह हो जो रख दीं पनबह दयवारों के रोज़न में
नको हश माना बे रबत शोर जनों आी
हुवा है ख़नदह अहबाब बख़ीह जौीब व दामन में
हवे उस महर वौश के जलो तमसाल के आगे
पौराफ़शां जोहरआीने में मसल ज़रह रोज़न में
न जानों नीक हूँ या बुद हुों पर सहबत मख़ालफ़ है
जो गुल हूँ तो हूँ गलख़न में जो ख़स हूँ तो हूँ गलशन में
हज़ारों दिल दये जोश जनोन अशक़ ने मझ को
सीह हो कर सवीदा हो गया हर क़तरह ख़ों तन में
असद ज़नदान तासीर अलफ़त हाे ख़ोबां हूँ
ख़म दसत नवाज़श हो गया है तोक़ गर्दन में
।
मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
सवाे ख़ोन जगर सौ जिगर में ख़ाक नहीं
मगर ग़बार हुवे पर हौवा उड़ा ले जाे
वगरनह ताब व तवां बाल व पर में ख़ाक नहीं
यह किस बहशत शमाल की आमद आमद हे
कि ग़ीर जलो गुल रह गज़र में ख़ाक नहीं
भला उसे न सही कुछ मझी को रहम आता
असर मरे नफ़स बे असर में ख़ाक नहीं
ख़याल जलो गुल से ख़राब हैं मीकश
शराब ख़ाने के दयवार व डर में ख़ाक नहीं
हुवा हों अशक़ की ग़ारत गरी से शरमनदह
सवाे हसरत तामीर। घर में ख़ाक नहीं
हमारे शार हैं अब सिर्फ़ दिल लगी के असद
कुला कि फ़ादह अरज हुनर में ख़ाक नहीं
।
दिल ही तो है न सनग व ख़शत दर्द से भर न आे कयों
रवीं गे हम हज़ार बार ।कवी हमें सताे कयों
दौीर नहीं हरम नहीं डर नहीं आसतां नहीं
बीठे हैं रह गज़र पह हम ग़ीर
हमें उठाे कयों
जब वह जमाल दिल फ़रोज़ सोरत महर नीम रोज
आप ही हो नज़ारह सोज़ ।परदे में मनह छपाे कयों
दशन ग़मज़ह जां सतां नओक नाज़ बे पनाह
तीरा ही अकस रुख़ सही सामने तीरे आे कयों
क़ीद हयात व बनद घाम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी घाम से नजात पाे कयों
हसन और इस पह हसन ज़न रह गी बवालहोस की शरम
अपने पह अातमाद है ग़ीर को आज़माे कयों
वां वह ग़रोर अज़ व नाज़ यां यह हजाब पास वजा
राह में हम मलीं कहां बज़म में वह बलाे कयों
हां वह नहीं खुद परसत जा वह बे वफ़ा सही
जस को हों दीन व दिल अज़ीज़ इस की गली में जाे कयों
ग़ालब ख़सतह के बग़ीर कौन से काम बनद हैं
रोये ज़ार ज़ार कया कीजे हाे हाे कयों
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* कवी। नसख़ महर
।
ग़नच नाशगफ़तह को दूर से मत दखा कि युों
बोसे को पुोछता हों मौीं मनह सेमझे बता कि युों
पुरसश तरज़ दलबरी कीजे कया कि बन कहे
उस के हर खाक अशारे से नकले है यह अदा कि युों
रात के वक़्त मौे पये साथ रक़ीब को लिये
आे वह यां खुद करे पर न खुद करे कि युों
ग़ीर से रात कया बनी यह जो कहा तो दीखये
सामने आन बीठना और यह दीखना कि युों
बज़म में उस के रोबरो कयों न ख़मोश बीठये
उस की तो ख़ामुशी में भी है यही मदाा कि युों
में ने कहा कि “ बज़म नाज़ चाहये ग़ीर से तही
सुन कर सितम ज़रीफ़ ने मझ को उठा दिया कि युों ؟
मझ से कहा जो यार ने जाते हैं होश किस तरह
दीख के मीरी बीख़ोदी चलने लगी हवा कि युों
कब मझे कवे यार में रहने की वजा याद थी
आीनह दार बन गी हीरत नक़श पा कि युों
गर तरे दिल में हो ख़याल वसल में शौक़ का ज़वाल
मोज महीत आब में मारे है दोस्त व पा कि युों
जो यह कहे कि रीख़तह कयों कर हो रशक फ़ारसी
गफ़त ग़ालब एक बार पहार के उसे सुना कि युों
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में कह
।
हम बे ख़ोद अशक़ में कर लीते हैं सजदे
यह हम से न पोछो कि कहां नासीह सा हैं
।
अपना अहवाल दल ज़ार कहों या न कहों
है हया माना अज़हार। कहों या न कहों
नहीं करने का में तक़रीर अदब से बाहर
में भी हों वाक़फ़ असरार ।कहों या न कहों
शकोह समझो असे या कोई शकएत समझो
अपनी हसती से हों बीज़ार। कहों या न कहों
अपने दिल ही से में अहवाल गरफ़तार दल
जब न पां कोई घाम ख़वार कहों या न कहों
दिल के हाथों से कि है दशमन जानी अपना
हों खाक आफ़त में गरफ़तार ।कहों या न कहों
में तो दयवानह हों और एक जहां है ग़माज़
गोश हैं डर पस दयवार कहों या न कहों
आप से वह मरा अहवाल न पोछे तो असद
हसब हाल अपने फर अशाार कहों या न कहों
।
ममकन नहीं कि भूल के भी आरमीदह हों
में दशत घाम में आहो सयाद दीदह हों
हों दरदमनद जबर हो या अख़तयार हो
गह नाल कशीदह गह अशक चकीदह हों
ने सुबहह से अलाक़ह न साग़र से राबतह
में मारज मिसाल में दसत बरीदह हों
हों ख़ाकसार पर न किसी से हो मझ को लाग
ने दान फ़तादह हों ने दाम चीदह हों
जो चाह नहीं वह मरी क़दर व मनज़लत
में योसफ़ बह क़ीमत ओल ख़रीदह हों
हर गज़ किसी के दिल में नहीं है मरी जगह
हों में कलाम नुग़ज़ वले नाशनीदह हों
अहल वौरौा के हलक़े में हर चनद हों ज़लील
पर अासयों के ज़मरे में मौीं बरगज़ीदह हों
हों गरम नशात तसोर से नग़मह सनज
में अनदलीब गलशन ना आफ़रीदह हों
जां लब पह आी तो भी न शीरीं हवा दहन
अज़ बसकह तलख़ ग़म हजरां चशीदह हों
ज़ाहर हैं मीरी शक्ल से अफ़सोस के नशां
ख़ार अलम से पशत बह दनदां गज़ीदह हों ****
पानी से सग गज़ीदह डरे जस तरह असद
डरता हों आीने से कि मरदम गज़ीदह हों
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* वासतह। नसख़ महर
** कुछ नसख़ों में फ़रक़े
*** मशहोर शार मगर नसख़ महर में दरज नहीं
**** यह शार भी नसख़ महर में दरज नहीं
।
जस दिन से कि हम ख़सतह गरफ़तार बला हीं
कपड़ों में जवीं बख़ के टानकों से सवा हीं
।
मीर के शार का अहवाल कहों कया ग़ालब
जस का दयवान कम अज़ गलशन कशमीर नहीं
।
मे कशी को न समझ बेहासल
बादह ग़ालब अरक़ बीद नहीं
।
धोता हों जब में पीने को इस सीम तन के पां
रखता है जद से खीनच के बाहर लगन के पां
दी सादगी से जान पड़ों कोहकन के पां
हीहात कयों न टोट गये पीर ज़न के पां
भागे थे हम बहत। सो असी की सज़ा है यह
हो कर असीर दाबते हैं राह ज़न के पां
मरहम की जसतजो में फरा हों जो दूर दूर
तन से सवा फ़गार हैं इस ख़सतह तन के पां
अललह रे ज़ोक़ दशत नोरदी कि बाद मरग
हलते हैं ख़ोद बह ख़ोद मरे अन्दर कफ़न के पां
है जोश ग़ुल बहार में यां तक कि हर तरफ़
अड़ते हवे अलझते हैं मरग़ चमन के पां
शब को किसी के ख़वाब में आया न हो कहीं
दखते हैं आज इस बत नाज़क बदन के पां
ग़ालब मरे कलाम में कयों कर मज़ह न हो
पीता हों धो के ख़सरो शीरीं सख़न के पां
व
।
हसद से दिल अगर अफ़सरदह हे गरम तमाशा हो
कि चशम तनग शएद कसरत नज़ारह से वा हो
बह क़दर हसरत दिल चाहये ज़ोक़ माासी भी
भरों यक गोश दामन गर आब हफ़त दरया हो
अगर वह सरो क़द गरम ख़राम नाज़ आ जओे
कफ़ हर ख़ाक गलशन शकल क़मरी नालह फ़रसा हो
।
काबे में जा रहा तो न दो तानह कया कहीं
भोला हों हक़ सहबत अहल कुनशत को
ताात में ता रहे न मे व अनगबीं की लाग
दोज़ख़ में डाल दो कोई ले कर बहशत को
हों मनहरफ़ न कयों रह व रसम सवाब से
टीड़ा लगा है क़त क़लम सरनोशत को
ग़ालब कुछ अपनी साई से लहना नहीं मझे
ख़रमन जले अगर न मौलख़ खाे कशत को
।
वारसतह इस से हैं कि महबत ही कयों न हो
कीजे हमारे साथ अदओत ही कयों न हो
छोड़ा न मझ में जाफ़ ने रनग अख़तलात का
है दिल पह बार नक़श महबत ही कयों न हो
है मझ को तझ से तज़कर ग़ीर का गलह
हर चनद बर सबील शकएत ही कयों न हो
पीदा हवी हे कहते हीं हर दर्द की दवा
यों हो तो चार ग़म अलफ़त ही कयों न हो
डाला न बीकसी ने किसी से माामलह
अपने से खीनचता हों ख़जालत ही कयों न हो
है आदमी बजा ख़ोद खाक महशर ख़याल
हम अनजमन समझते हैं ख़लोत ही कयों न हो
हनगाम ज़बोन हमत हे अनफ़ााल
हाशिल न कीजे दहर से अबरत ही कयों न हो
वारसतगी बहान बीगानगी नहीं
अपने से कर न ग़ीर से वहशत ही कयों न हो
मटता है फ़ोत फ़रसत हसती का घाम कोई ؟
अमर अज़ीज़ सौरफ़ अबादत ही कयों न हो
इस फ़तनह ख़ो के डर से अब अठते नहीं असद
इस में हमारे सर पह क़यामत ही कयों न हो
।
अबर रोता है कि बज़म तरब आमादह करो
बरक़ हनसती है कि फ़रसत कोई दम दे हम को
।
मली न वसात जोलान यक जनोन हम को
अदम को ले ग दिल में ग़बार सहरा को
।
क़फ़स में हों गर अचा भी न जानीं मीरे शयोन को
मरा होना बुरा कया है नवा सनजान गलशन को
नहीं गर हमदमी आसां न हो यह रशक कया कम है
न दी होती खुद या आरज़ो दोसत दुश्मन को
न नकला आनख से तीरी खाक आनसो इस जराहत पर
कया सीने में जस ने ख़ों चकां मख़गान सोज़न को
खुद शरमाे हाथों को कि रखते हैं कशाकश में
कभी मीरे गरीबां को कभी जानां के दामन को
अभी हम क़त्ल गह का दीखना आसां समझते हैं
नहीं दीखा शनओर जो ख़ों में तीरे तोसन को
हवा चरचा जो मीरे पां की ज़नजीर बनने का
कया बीताब कां में जनबश जोहर ने आहन को
खुशी कया खीत पर मीरे अगर सौ बार अबर आवे
समझता हों कि ढोनडे है अभी से बरक़ ख़रमन को
वफ़ादारी बह शरत असतवारी असल एमां है
मौरे बत ख़ाने में तो काबे में गाड़ो बरहमन को
शहादत थी मरी क़िस्मत में जो दी थी यह ख़ो मझ को
जहां तलवार को दीखा झका दीता था गर्दन को
न लटता दिन को तो कब रात को यों बे ख़बर सोता
रहा खटका न चोरी का दाा दीता हों रहज़न को
सख़न कया कहह नहीं सकते कि जोया हों जवाहर के
जिगर कया हम नहीं रखते कि खोदीं जा के मादन को
मरे शाह सलीमां जाह से निस्बत नहीं ग़ालब
फ़रीदोन व जम व कीख़सरो व दाराब व बहमन को
।
वां इस को होल दिल है तो यां में हों शरमसार
यानी यह मीरी आह की तासीर से न हो
अपने को दीखता नहीं ज़ोक़ सितम को दीख
आीनह ताकह दीद नख़चीर से न हो
।
वां पहनच कर जो ग़श आता पे हम है हम को
सद रह आहनग ज़मीं बोस क़दम है हम को
दिल को में और मझे दिल महो वफ़ा रखता है
किस क़दर ज़ोक़ गरफ़तारी हम है हम को
जाफ़ से नक़श पे मोर है तोक़ गर्दन
तरे कोचे से कहां ताक़त रम है हम को
जान कर कीजे तग़ाफ़ल कि कुछ अमीद भी हो
यह नगाह ग़लत अनदाज़ तो सौम है हम को
रशक हम तरही व दरद असर बानग हज़ीं
नाल मरग़ सहर तीग़ दो दम है हम को
सर अड़ाने के जो वादे को मकरर चाहा
हनस के बोले कि तरे सर की क़िस्म है हम को
दिल के ख़ों करने की कया वजह वलीकन नाचार
पास बे रोनक़ी दीदह अहम है हम को
तुम वह नाज़क कि ख़मोशी को फ़ग़ां कहते हो
हम वह अाजज़ कि तग़ाफ़ल भी सितम है हम को
क़
लखन आने का बाास नहीं खलता यानी
होस सीर व तमाशा सौ वह कम है हम को
मक़ता सलसल शौक़ नहीं है यह शहर
अज़म सीर नजफ़ व तोफ़ हरम है हम को
लिये जाती है कहीं एक तोक़ा ग़ालब
जाद रह कशश काफ़ करम है हम को
।
तुम जानो तुम को ग़ीर से जो रसम व राह हो
मझ को भी पूछते रहो तो कया गनाह हो
बचते नहीं मवाख़ज़ रोज़ हशर से
क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो
कया वह भी बे गनह कश व हक़ ना शनास हैं
माना कि तुम बशर नहीं ख़ोरशीद व माह हो
अभरा हवा नक़ाब में है उन के एक तार
मरता हों में कि यह न किसी की नगाह हो
जब मे कदह छटा तो फर अब कया जगह की क़ीद
मसजद हो मदरसह हो कोई ख़ानक़ाह हो
सनते हैं जो बहशत की तारीफ़ सब दरसत
लीकन खुद करे वह तरा जलोह गाह हो
ग़ालब भी गर न हो तो कुछ एसा जरर नहीं
दनया हो या रब और मरा बादशाह हो
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
हक़ नासपास नसख़ नज़ामी में हे हक़ ना शनास। हसरत महरओर अरशी मीं। नासपास कताबत की ग़लती भी ममकन हे।
।
गी वह बात कि हो गफ़तगो तो कयों कर हो
कहे से कुछ न हवा फर कहो तो कयों कर हो
हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम वसाल
कि गर न हो तो कहां जाईं हो तो कयों कर हो
अदब है और यही कशमकश तो कया कीजे
हया है और यही गोमगो तो कयों कर हो
तमहीं कहो कि गज़ारा सनम परसतों का
बतों की हो अगर एसी ही ख़ो तो कयों कर हो
अलझते हो तुम अगर दीखते हो आीनह
जो तुम से शहर में हों एक दो तो कयों कर हो
जसे नसीब हो रोज़ स्याह मेरा सा
वह शख़स दिन न कहे रात को तो कयों कर हो
हमें फर उन से अमीद और उन्हें हमारी क़दर
हमारी बात ही पोछीं न वो तो कयों कर हो
ग़लत न था हमें खत पर गमां तसली का
न माने दीद दीदार जो तो कयों कर हो
बता इस मख़ह को दीख कर कि मझ को क़रार
यह नीश हो रग जां में फ़रो तो कयों कर हो
मझे जनों नहीं ग़ालब वले बह क़ोल हजोर
फ़राक़ यार में तसकीन हो तो कयों कर हो
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
हजोर बहादर शाह ज़फ़र अगला मसराह ज़फ़र का ही है जस की तरह में ग़ालब ने दरबारी मशाारे के ल यह गज़ल कही थी।
।
किसी को दे के दिल कोई नवा सनज फ़ग़ां कयों हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फर मनह में ज़बां कयों हो
वह अपनी ख़ो न छोड़ीं गे हम अपनी वजा कयों छोड़ीं
सबक सर बन के कया पोछीं कि हम से सर गरां कयों हो
कया घाम ख़वार ने रसवा लगे आग इस महबत को
न लओे ताब जो घाम की वह मेरा राज़ दां कयों हो
वफ़ा कीसी कहां का अशक़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फर अे सनग दिल तीरा ही सनग आसतां कयों हो
क़फ़स में मझ से रोदाद चमन कहते न डर हमदम
गरी है जस पह कुल बजली वह मेरा आशयां कयों हो
यह कहह सकते हो हम दिल में नहीं हीं पर यह बतला
कि जब दिल में तमहीं तुम हो तो आँखों से नहां कयों हो
ग़लत है जज़ब दिल का शकोह दीखो जुर्म किस का है
न खीनचो गर तुम अपने को कशाकश दरमयां कयों हो
यह फ़तनह आदमी की ख़ानह वीरानी को कया कम है
हवे तुम दोस्त जस के दुश्मन इस का आसमां कयों हो
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदो के हो लिये जब तुम तो मेरा अमतहां कयों हो
कहा तुम ने कि कयों हो ग़ीर के मलने में रसवाई
बजा कहते हो सच कहते हो फर कहयो कि हां कयों हो
नकाला चाहता है काम कया तानों से तुो ग़ालब
तरे बे महर कहने से वह तझ पर महरबां कयों हो
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* कुछ नसख़ों में वजा कयों बदलीं हे।
।
रहये अब एसी जगह चाल कर जहां कोई न हो
हम सख़न कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो
बे डर व दयवार सा खाक घर बनएा चाहये
कोई हम सएह न हो और पासबां कोई न हो
पड़ये गर बीमार तो कोई न हो बीमार दार *
और अगर मर जाये तो नोहह ख़वां कोई न हो
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
क़दीम लफ़्ज़ बीमारदार ही था बाद में लफ़्ज़ तीमारदार इस्तेमाल कया जाने लगा तोजदीद नसख़ों में इस लफ़्ज़ को तीमारदार लखा गया।
।
भोले से काश वह अधर आीं तो शाम हो
कया लतफ़ हो जो अबलक़ दोरां भी राम हो
ता गरदश फ़लक से यों ही सुबह व शाम हो
साक़ी की चशम मसत हो और दोर जाम हो
बे ताब हों बला से कन आँखों से दीख लीं
अे ख़ोश नसीब काश क़जा का पयाम हो
कया शरम हे हरीम हे महरम है राज़दार
में सर बकफ़ हों तीग़ अदा बे नयाम हो
में छीड़ने को काश असे घोर लों कहीं
फर शोख़ दीदह बर सर सद अनतक़ाम हो
वह दिन कहां कि हरफ़ तमना हो लब शनास
नाकाम बुद नसीब कभी शाद काम हो
घस पल के चशम शौक़ क़दम बोस ही सही
वह बज़म ग़ीर ही में हों अख़दहाम मीं
अतनी पयों कि हशर में सरशार ही अठों
मझ पर जो चशम साक़ बीत अलहराम हो
पीरानह साल ग़ालब मीकश करे गा कया
भोपाल में मज़ीद जो दो दिन क़याम हो
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* कौ न
** एक अमला अज़दहाम भी हे
नोट ग़लाम रसोल महर को इस पर शक है कि यह गज़ल ग़ालब की नहीं
ह
।
शब वसाल में मोनस गया है बौन तकीह
हवा है मोजब आराम जान व तन तकीह
ख़राज बादशह चीं से कयों न मानगों आज
कि बन गया है ख़म जाद पुरशकन तकीह
बन है तख़त ग़ुल हा यासमीं बसतर
हवा है दसत नसरीन व नसतरन तकीह
फ़रोग़ हसन से रोशन है ख़वाबगाह तमाम
जो रख़त ख़वाब है परवीं तो है परन तकीह
मज़ा मले कहो कया ख़ाक साथ सोने का
रखे जो बीच में वह शोख़ सीम तन तकीह
अगरचह था यह अरादह मगर खुद का शकर
अठा सका न नज़ाकत से गलबदन तकीह
हवा है काट के चादर को नागहां ग़ाब
अगर चह ज़ानो नल पर रखे दमन तकीह
बजरब तीशह वह इस वासते हलाक हवा
कि जरब तीशह पह रखता था कोहकन तकीह
यह रात भर का है हनगामह सुबह होने तक
रखो न शमा पर अे अहल अनजमन तकीह
अगरचह फीनक दिया तुम ने दूर से लीकन
अठा कयों कि यह रनजोर ख़सतह तन तकीह
ग़श आ गया जो पस अज़ क़त्ल मीरे क़ातिल को
हवी है इस को मरी नाश बे कफ़न तकीह
शब फ़िराक़ में यह हाल है अज़ीत का
कि सानप फ़र्श है और सानप का है मन तकीह
रवारखोनह रखो थाजो लफ़्ज़ तकीह कलाम
अब इस को कहते हैं अहल सख़न सख़न तकीह
हम और तुम फ़लक पीर जस को कहते हीं
फ़क़ीर ग़ालब मसकीं का है कहन तकीह
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में दाल पर जज़म हे।
।
अज़ महर ता बह ज़रह दिल व दिल है आीनह
तोती को शश जहत से मक़ाबल है आीनह
।
है सबज़ह ज़ार हर डर व दयवार घाम कदह
जस की बहार यह हो फर इस की ख़ज़ां न पोछ
नाचार बीकसी की भी हसरत अठाये
दशवार रह व सतम हमरहां न पोछ
।
न पोछ हाल इस अनदाज़ इस अताब के साथ
लबों पह जान भी आजा गी जवाब के साथ
।
हिन्दोस्तान सए ग़ुल पा तख़त था
जाह व जलाल अहद वसाल बतां न पोछ
हर दाग़ ताज़ह यक दल दाग इन्तज़ार हे
अरज फ़जा सीन दर्द अमतहां न पोछ
य
।
सद जलोह रो बह रो है जो मख़गां अठाये
ताक़त कहां कि दीद का अहसां अठाये
है सनग पर बरात मााश जनोन अशक़
यानी हनोज़ मनत तफ़लां अठाये
दयवार बार मनत मज़दोर से है ख़म
अे ख़ानमां ख़राब न अहसां अठाये
या मीरे ज़ख़म रशक को रसवा न कीजये
या परद तबसम पनहां अठाये
162-
मसजद के ज़ीर सएह ख़राबात चाहये
भौों पास आनख क़बल हाजात चाहये
अाशक़ हवे हैं आप भी एक और शख़स पर
आख़र सितम की कुछ तो मकाफ़ात चाहये
दे दाद अे फ़लक दल हसरत परसत की
हां कुछ न कुछ तलाफ़ी माफ़ात चाहये
सीखे हैं मह रख़ों के लिये हम मसोरी
तक़रीब कुछ तो बहर मलाक़ात चाहये
मे से ग़रज नशात है किस रो स्याह को
खाक गोनह बीख़ोदी मझे दिन रात चाहये
है रनग लालह व ग़ुल व नसरीं जुदा जुदा
हर रनग में बहार का असबात चाहये
क़
सर पा ख़म पह चाहये हनगाम बे ख़ोदी
रो सो क़बलह वक़त मनाजात चाहये
यानी बह हसब गरदश पीमान सफ़ात
अारफ़ हमीशह मसत मे ज़ात चाहये
नशो व नमा है असल से ग़ालब फ़रवा को
ख़ामोशी ही से नकले है जो बात चाहये
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में को
।
बसात अजज़ में था एक दिल यक क़तरह ख़ों वह भी
सौ रहता है बह अनदाज़ चकीदन सर नगों वह भी
रहे इस शोख़ से आज़रदह हम चनदे तकलफ़ से
तकलफ़ बर तरफ़ था एक अनदाज़ जनों वह भी
ख़याल मरग कब तसकीं दल आज़रदह को बख़शे
मरे दाम तमना में है खाक सीद ज़बों वह भी
न करता काश नालह मझ को कया मालूम था हमदम
कि होगा बाास अफ़ज़ाश दरद दरों वह भी
न अतना बुरश तीग़ जफ़ा पर नाज़ फ़रमा
मरे दरया बीताबी में है खाक मोज ख़ों वह भी
मे अशरत की ख़वाहश साक़ी गरदों से कया कीजे
लिये बीठा है खाक दो चार जाम वाख़गों वह भी
मरे दिल में है ग़ालब शोक़ वसल व शको हजरां
खुद वह दिन करे जो इस से में यह भी कहों वह भी
।
है बज़म बतां में सख़न आज़रदह लबों से
तनग आे हैं हम एसे ख़ोशामद तलबों से
है दोर क़दह वजह परीशानी सहबा
यक बार लगा दो ख़म मे मीरे लबों से
रनदान दर मे कदह गसताख़ हैं ज़ाहद
ज़नहार न होना तरफ़ उन बे अदबों से
बीदाद वफ़ा दीख कि जाती रही आख़र
हर चनद मरी जान को था रबत लबों से
।
ता हम को शकएत की भी बाक़ी न रहे जा
सुन लीते हैं गो ज़कर हमारा नहीं करते
ग़ालब तरा अहवाल सना दीनगे हम उन को
वह सुन के बला लीं यह अजारा नहीं करते
।
घर में था कया कि तरा घाम असे ग़ारत करता
वह जो रखते थे हम खाक हसरत तामीर सौ हे
।
ग़म दनया से गर पाई भी फ़रसत सर अठाने की
फ़लक का दीखना तक़रीब तीरे याद आने की
खलेगा किस तरह मजमों मरे मकतोब का या रब
क़िस्म खाई है इस काफ़िर ने कागज के जलाने की
लपटना परनयां में शाल आतश का आसां है
वले मुश्किल है हिक्मत दिल में सोज़ घाम छपाने की
उन्हें मनज़ोर अपने ज़ख़मयों का दीख आना था
अठे थे सीर ग़ुल को दीखना शोख़ी बहाने की
हमारी सादगी थी अलतफ़ात नाज़ पर मरना
तरा आना न था ज़ालम मगर तमहीद जाने की
लकद कोब हवादस का तहमल कर नहीं सकती
मरी ताक़त कि ज़ामिन थी बतों के नाज़ अठाने की
कहों कया ख़ोबी ओजाा अबनाे ज़मां ग़ालब
बदी की इस ने जस से हम ने की थी बारहा नीकी
।
हाशिल से हाथ धो बीठ अे आरज़ो ख़रामी
दिल जोश गरीह में है डोबी हवी असामी
इस शमा की तरह से जस को कोई बझाे
में भी जले हों में हों दाग़ ना तमामी
।
कया तनग हम सितम ज़दगां का जहान है
जस में कि एक बीज मोर आसमान है
है कानात को हौरौकत तीरे ज़ोक़ से
परतो से आफ़ताब के ज़रे में जान है
हालानकह है यह सीली ख़ारा से लालह रनग
ग़ाफ़ल को मीरे शीशे पह मे का गमान है
की इस ने गरम सीन अहल होस में जा
आवे न कयों पसन्द कि ठनडा मकान है
कया ख़ोब तुम ने ग़ीर को बोसह नहीं दिया
बस चप रहो हमारे भी मनह में ज़बान है
बीठा है जो कि सए दयवार यार में
फ़रमां रवा कशोर हिन्दोस्तान है
हसती का अातबार भी घाम ने मटा दिया
किस से कहों कि दाग जिगर का निशान है
है बारे अातमाद वफ़ादारी इस क़दर
ग़ालब हम इस में ख़ोश हैं कि ना महरबान हे
।
दर्द से मीरे है तझ को बे क़रारी हाे हाे
कया हवी ज़ालम तरी ग़फ़लत शाारी हाे हाे
तीरे दिल में गर न था आशोब घाम का होसलह
तो ने फर कयों की थी मीरी घाम गसारी हाे हाे
कयों मरी घाम ख़वारगी का तझ को आया था ख़याल
दशमनी अपनी थी मीरी दोस्त दारी हाे हाे
उमर भर का तो ने पीमान वफ़ा बानधा तो कया
उमर को भी तो नहीं है पादारी हाे हाे
ज़हर लगती है मझे आब व हवा ज़नदगी
यानी तझ से थी असे ना साज़गारी हाे हाे
ग़ुल फ़शानी हा नाज़ जलोह को कया हो गया
ख़ाक पर होती है तीरी लालह कारी हाे हाे
शरम रसवाई से जा छपना नक़ाब ख़ाक में
खतम है अलफ़त की तझ पर परदह दारी हाे हाे
ख़ाक में नामोस पीमान महबत मल गी
आथ गी दनया से राह व रसम यारी हाे हाे
हाथ ही तीग़ आज़मा का काम से जाता रहा
दिल पह खाक लगने न पएा ज़ख़म कारी हाे हाे
किस तरह काटे कोई शबहा तार बरशकाल
है नज़र ख़ो करद अख़तर शमारी हाे हाे
गोश महजोर पयाम व चशम महरोम जमाल
एक दिल तस पर यह ना अमीदवारी हाे हाे
अशक़ ने पकड़ा न था ग़ालब अभी वहशत का रनग
रह गया था दिल में जो कुछ ज़ोक़ ख़वारी हाे हाे
।
सर गशतगी में अालम हसती से यास है
तसकीं को दे नवीद कि मरने की आस है
लीता नहीं मरे दल आवारह की ख़बर
अब तक वह जानता है कि मीरे ही पास है
कीजे बयां सरोर तब घाम कहां तलक
हर मो मरे बदन पह ज़बान सपास है
है वह ग़रोर हसन से बीगान वफ़ा
हरचनद इस के पास दल हक़ शनास है
पी जस क़दर मले शब महताब में शराब
इस बलग़मी मज़ाज को गरमी ही रास है
हर खाक मकान को है मकीं से शरफ़ असद
मजनों जो मर गया है तो जनगल उदास हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ अरशी में यों हे तसकीन को नवीद। असल नज़ामी और दोसरे नसख़ों में असी तरह हे।
।
गर ख़ामशी से फ़ादह अख़फ़ा हाल है
ख़ोश हों कि मीरी बात समझनी महाल है
किस को सनां हसरत इज़हार का गलह
दिल फ़रद जमा व ख़रच ज़बां हा लाल है
किस परदे में है आीनह परदाज़ अे खुद
रहमत कि अज़र ख़वाह लब बे सवाल है
है है खुद न ख़वासतह वह और दशमनी
अे शोक़ मनफ़ाल यह तझे कया ख़याल है
मशकीं लबास काबह अली के क़दम से जान
नाफ़ ज़मीन है न कि नाफ़ ग़ज़ाल है
वहशत पह मीरी अरस आफ़ाक़ तनग था
दरया ज़मीन को अरक़ अनफ़ााल है
हसती के मत फ़रीब में आ जायो असद
अालम तमाम हलक़ दाम ख़याल हे
।
तुम अपने शकवे की बातीं न खोद खोद के पोछो
हज़र करो मरे दिल से कि इस में आग दबी है
दला यह दर्द व अलम भी तो मग़तनम है कि आख़र
न गरी सहरी है न आह नीम शबी है
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
कर । नसख़ महर
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एक जा हरफ़ वफ़ा लका था सो भी मट गया
ज़ाहरा कागज तरे खत का ग़लत बरदार है
जी जले ज़ोक़ फ़ना की ना तमामी पर न कयों
हम नहीं जलते नफ़स हर चनद आतश बार है
आग से पानी में बझते वक़्त अठती है सदा
हर कोई डर मानदगी में नाले से नाचार है
है वही बुद मसती हर ज़रह का ख़ोद अज़र ख़वाह
जस के जलवे से ज़मीं ता आसमां सरशार है
मझ से मत कहह तो हमें कहता था अपनी ज़नदगी
ज़नदगी से भी मरा जी उन दनों बीज़ार है
आनख की तसवीर सर नामे पह खीनची है कि ता
तझ पह खल जओे कि इस को हसरत दीदार हे
।।।।।।
वह। नसख़ महर
।
पीनस में गज़रते हैं जो कोचे से वह मीरे
कनधा भी कहारों को बदलने नहीं दीते
।
मरी हसती फ़जा हीरत आबाद तमना है
जसे कहते हैं नालह वह असी अालम का अनक़ा है
ख़ज़ां कया फ़सल ग़ुल कहते हैं किस को कोई मोसम हो
वही हम हीं क़फ़स हे और मातम बाल व पर का है
वफ़ा दलबरां है अतफ़ाक़ी वरनह अे हमदम
असर फ़रयाद दिल हाे हज़ीं का किस ने दीखा है
न लाई शोख़ अनदीशह ताब रनज नोमीदी
कफ़ अफ़सोस मलना अहद तजदीद तमना हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* न लाे नसख़ महर
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रहम कर ज़ालम कि कया बोद चराग़ कशतह है
नबज बीमार वफ़ा दोद चराग़ कशतह है
दिल लगी की आरज़ो बे चीन रखती है हमें
वरनह यां बे रोनक़ी सोद चराग़ कशतह है
।
चशम ख़ोबां ख़ामशी में भी नवा परदाज़ है
सरमह तो कहवे कि दोद शालह आवाज़ है
पीकर अशाक़ साज़ ताला ना साज़ है
नालह गोया गरदश सयारह की आवाज़ है
दोस्त गाह दीद ख़ों बार मजनों दीखना
यक बयाबां जलो ग़ुल फ़रश पा अनदाज़ हे
।
अशक़ मझ को नहीं वहशत ही सही
मीरी वहशत तरी शहरत ही सही
क़ता कीजे न तालक़ हम से
कुछ नहीं है तो अदओत ही सही
मीरे होने में है कया रसवाई
अे वह मजलस नहीं ख़लोत ही सही
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
ग़ीर को तझ से महबत ही सही
अपनी हसती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही
उमर हर चनद कि है बरक़ ख़राम
दिल के ख़ों करने की फ़रसत ही सही
हम कोई तरक वफ़ा करते हैं
न सही अशक़ मसीबत ही सही
कुछ तो दे अे फ़लक ना अनसाफ़
आह व फ़रयाद की रख़सत ही सही
हम भी तसलीम की ख़ो डालीं गे
बे नयाज़ी तरी अादत ही सही
यार से छीड़ चली जाे असद
गर नहीं वसल तो हसरत ही सही
।
है आरमीदगी में नकोहश बजा मझे
सबह वतन है ख़नद दनदां नमा मझे
ढोनडे है इस मग़नी आतश नफ़स को जी
जस की सदा हो जलो बरक़ फ़ना मझे
मसतानह ते करों हों रह वादी ख़याल
ता बाज़ गशत से न रहे मदाा मझे
करता है बसकह बाघ में तो बे हजाबयां
आने लगी है नकहत ग़ुल से हया मझे
खलता किसी पह कयों मरे दिल का माामलह
शारों के अनतख़ाब ने रसवा कया मझे
।
ज़नदगी अपनी जब इस शक्ल से गज़री ग़ालब
हम भी कया याद करीं गे कि खुद रखते थे
।
इस बज़म में मझे नहीं बनती हया कये
बीठा रहा अगरचह अशारे हवा कये
दिल ही तो है सयासत दरबां से डर गया
में और जां डर से तरे बन सदा कये
रखता फरों हों ख़रक़ह व सजादह रहन मे
मदत हवी है दाोत आब व हवा कये
बे सरफ़ह ही गज़रती हे हो गरचह अमर ख़जर
हजरत भी कुल कहीं गे कि हम कया कया कये
मक़दोर हो तो ख़ाक से पोछों कि अे लीम
तो ने वह गनजहा गरानमएह कया कये
किस रोज तहमतीं न तराशा कये अदो ؟
किस दिन हमारे सर पह न आरे चला कये ؟
सहबत में ग़ीर की न पड़ी हो कहीं यह ख़ो
दीने लगा है बोसह बग़ीर अलतजा कये
जद की है और बात मगर ख़ो बरी नहीं
भोले से इस ने सीनकड़ों वादे वफ़ा कये
ग़ालब तमहीं कहो कि मले गा जवाब कया
माना कि तुम कहा कये और वह सना कये
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* ओ। नसख़ महर
।
रफ़तार उमर क़ता रह अजतराब है
इस साल के हसाब को बरक़ आफ़ताब है
मीना मे है सरो नशात बहार से
बाल तौदौर व जलो मोज शराब है
ज़ख़मी हवा है पाशनह पा सबात का
ने भागने की गों न अक़ामत की ताब है
जादाद बादह नोशी रनदां है शश जहत
ग़ाफ़ल गमां करे है कि गीती ख़राब है
नज़ारह कया हरीफ़ हो इस बरक़ हसन का
जोश बहार जलवे को जस के नक़ाब है
में नामराद दिल की तसली को कया करों
माना कि तीरी रख़ से नगह कामयाब है
गज़रा असद मसरत पीग़ाम यार से
क़ासद पह मझ को रशक सवाल व जवाब हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* तज़रो और तदरो दोनों तरह लखा जाताहे। नसख़ महर
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दीखना क़िस्मत कि आप अपने पह रशक आ जाे है
में असे दीखों भला कब मझ से दीखा जाे है
हाथ धो दिल से यही गरमी गर अनदीशे में है
आबगीनह तनद सहबा से पघला जाे है
ग़ीर को या रब वह कयों कर मना गसताख़ी करे
गर हया भी इस को आती है तो शरमा जाे है
शौक़ को यह लत कि हर दम नालह खीनचे जाये
दिल की वह हालत कि दम लीने से घबरा जाे है
दूर चशम बुद तरी बज़म तरब से वाह वाह
नग़मह हो जाता है वां गर नालह मेरा जाे है
गरचह है तरज़ तग़ाफ़ल परदह दार राज़ अशक़
पर हम एसे खवे जाते हैं कि वह पा जाे है
इस की बज़म आरायां सुन कर दल रनजोर यां
मसल नक़श मदाा ग़ीर बीठा जाे है
हो के अाशक़ वह परी रख़ और नाज़क बन गया
रनग खुलता जाे है जतना कि अड़ता जाे है
नक़्शा को इस के मसोर पर भी कया कया नाज़ हैं
खीनचता है जस क़दर अतना ही खनचता जाे है
सएह मेरा मझ से मसल दोद भागे है असद
पास मझ आतश बजां के किस से ठहरा जाे हे
।
गरम फ़रयाद रखा शकल नहाली ने मझे
तब अमां हजर में दी बरद लयाली ने मझे
नसीह व नक़द दो अालम की हक़ीक़त मालूम
ले लिया मझ से मरी हमत अाली ने मझे
कसरत आराई वहदत है परसतार वहम
कर दिया काफ़िर उन असनाम ख़याली ने मझे
होस ग़ुल के तसोर में भी खटका न रहा
अजब आराम दिया बे पर व बाली ने मझे
।
कार गाह हसती में लालह दाग सामां है
बरक़ ख़रमन राहत ख़ोन गरम दहक़ां है
ग़नचह ता शगफ़तन हा बरग अाफ़ीत मालूम
बओजोद दिल जमाई ख़वाब ग़ुल परीशां है
हम से रनज बीताबी किस तरह अठएा जाे
दाग पशत दसत अजज़ शालह ख़स बह दनदां है
।
अग रहा है डर व दयवार से सबज़ह ग़ालब
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आी है
।
सादगी पर इस की मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता कि फर ख़नजर कफ़ क़ातिल में है
दीखना तक़रीर की लज़त कि जो इस ने कहा
में ने यह जाना कि गोया यह भी मीरे दिल में है
गरचह है किस किस बराई से वले बा एं हमह
ज़कर मेरा मझ से बहतर है कि इस महफ़िल में है
बस हजोम ना अमीदी ख़ाक में मल जाे गी
यह जो खाक लज़त हमारी सा बे हाशिल में है
रनज रह कयों खीनचये वामानदगी को अशक़ है
आथ नहीं सकता हमारा जो क़दम मनज़ल में है
जलोह ज़ार आतश दोज़ख़ हमारा दिल सही
फ़तन शोर क़यामत किस की आब व गल में है
है दल शोरीद ग़ालब तलसम पीच व ताब
रहम कर अपनी तमना पर कि किस मुश्किल में हे
।
दिल से तरी नगाह जिगर तक अतर गी
दोनों को खाक अदा में रजामनद कर गी
शक़ हो गया है सीनह ख़ोशा लज़त फ़राग़
तकलीफ़ परदह दारी ज़ख़म जिगर गी
वह बाद शबानह की सर मसतयां कहां
अठये बस अब कि लज़त ख़वाब सहर गी
अड़ती फरे है ख़ाक मरी को यार में
बारे अब अे हवा होस बाल व पर गी
दीखो तो दिल फ़रीब अनदाज़ नक़श पा
मोज ख़राम यार भी कया ग़ुल कतर गी
हर बवालहोस ने हसन परसती शाार की
अब आबरो शयोह अहल नज़र गी
नज़ारे ने भी काम कया वां नक़ाब का
मसती से हर नगह तरे रख़ पर बखर गी
फ़रदा व दी का तफ़रक़ह यक बार मट गया
कुल तुम गे कि हम पह क़यामत गज़र गी
मारा ज़माने ने असदाललह ख़ां तमहीं
वह वलोले कहां वह जवानी कधर गी
।
तसकीं को हम न रवीं जो ज़ोक़ नज़र मले
होरान ख़लद में तरी सूरत मगर मले
अपनी गली में मझ को न कर दफ़न बाद क़त्ल
मीरे पते से ख़लक़ को कयों तीरा घर मले
साक़ी गरी की शरम करो आज वरनह हम
हर शब पया ही करते हैं मे जस क़दर मले
तझ से तो कुछ कलाम नहीं लीकन अे नदीम
मेरा सलाम कहयो अगर नामह बर मले
तुम को भी हम दखाईं कि मजनों ने कया कया
फ़रसत कशाकश ग़म पनहां से गर मले
लाज़म नहीं कि ख़जर की हम पीरवी करीं
जाना कि खाक बुज़र्ग हमें हम सफ़र मले
अे साकनान कोच दिल दार दीखना
तुम को कहीं जो ग़ालब आशफ़तह सर मले
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* दयवान ग़ालब ( फ़रहनग के साथ में माना हे।
।
कोई दिन गर ज़नदगानी और है
अपने जी में हम ने ठानी और है
आतश दोज़ख़ में यह गरमी कहां
सोज़ घाम हा नहानी और है
बारहा दीखी हैं उन की रनजशीं
पर कुछ अब के सर गरानी और है
दे के खत मनह दीखता है नामह बर
कुछ तो पीग़ाम ज़बानी और है
क़ाता अामार हैं अकसर नजोम
वह बला आसमानी और है
हो चकीं ग़ालब बलाईं सब तमाम
एक मरग नागहानी और हे
।
कोई अमीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन माईन ए
नीनद कयों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल दिल पह हनसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हों सवाब ताात व ज़हद
पर तबाईत अधर नहीं आती
है कुछ एसी ही बात जो चप हों
वरनह कया बात कर नहीं आती
कयों न चीख़ों कि याद करते हैं
मीरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़ दिल गर नज़र नहीं आता
बो भी अे चारह गर नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ो में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबे किस मनह से जा गे ग़ालब
शरम तुम को मगर नहीं आती
।
दल नादां तझे हवा कया हे
आख़र इस दर्द की दवा कया हे
हम हैं मशताक़ और वह बेज़ार
या अलही यह माजरा कया हे
में भी मनह में ज़बान रखता हों
काश पोछो कि मदाा कया हे
क़
जब कि तझ बन नहीं कोई मोजोद
फर यह हनगामह अे खुद कया हे
यह परी चहरह लूग कैसे हीं
ग़मज़ह व अशोह व अदा कया हे
शकन ज़लफ़ अनबरीं कयों हे
नगह चशम सरमह सा कया हे
सबज़ह व ग़ुल कहां से आे हीं
अबर कया चीज़ हे हवा कया हे
हम को उन से वफ़ा की है अमीद
जो नहीं जानते वफ़ा कया हे
हां भला कर तरा भला होगा
और दरवीश की सदा कया हे
जान तुम पर निसर करता हों
में नहीं जानता दाा कया हे
में ने माना कि कुछ नहीं ग़ालब
मफ़त हाथ आे तो बुरा कया हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* हैं नसख़ महर
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कहते तो हो तुम सब कि बत ग़ालीह मो आे
यक मरतबा घबरा के कहो कोई कह वो आे
हों कशमकश नज़ा में हां जज़ब महबत
कुछ कहह न सकों पर वह मरे पोछने को आे
है सााक़ह व शालह व सीमाब का अालम
आना ही समझ में मरी आता नहीं गो आे
ज़ाहर है कि घबरा के न भागीं गे नकीरीन
हां मनह से मगर बाद दोशीनह की बो आे
जलाद से डरते हैं न वााज़ से झगड़ते
हम समझे हवे हैं असे जस भीस में जो आे
हां अहल तलब कौन सने तान ना याफ़त
दीखा कि वह मलता नहीं अपने ही को खो आे
अपना नहीं वह शयोह कि आराम से बीठीं
इस डर पह नहीं बार तो काबे ही को हो आे
की हम नफ़सों ने असर गरीह में तक़रीर
अचे रहे आप इस से मगर मझ को डबो आे
इस अनजमन नाज़ की कया बात है ग़ालब
हम भी गे वां और तरी तक़दीर को रो आे
।
फर कुछ खाक दिल को बीक़रारी हे
सीनह जोया ज़ख़म कारी हे
फर जिगर खोदने लगा नाख़न
आमद फ़सल लालह कारी हे
क़बल मक़सद नगाह नयाज़
फर वही परद अमारी हे
चशम दलाल जनस रसवाई
दिल ख़रीदार ज़ोक़ ख़वारी हे
वुह ही सद रनग नालह फ़रसाई
वुह ही सद गोनह अशक बारी हे
दिल हवा ख़राम नाज़ से फर
महशरसतान बीक़रारी हे
जलोह फर अरज नाज़ करता हे
रोज़ बाज़ार जां सपारी हे
फर असी बे वफ़ा पह मरते हीं
फर वही ज़नदगी हमारी हे
।क़।
फर खला है दर अदालत नाज़
गरम बाज़ार फ़ोजदारी हे
हो रहा है जहान में अनधीर
ज़लफ़ की फर सरशतह दारी हे
फर दिया पार जिगर ने सवाल
एक फ़रयाद व आह व ज़ारी हे
फर हवे हैं गवाह अशक़ तलब
अशक बारी का हकम जारी हे
दिल व मख़गां का जो मक़दमह था
आज फर इस की रोबकारी हे
बे ख़ोदी बे सबब नहीं ग़ालब
कुछ तो है जस की परदह दारी हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर व आसी में " वुही
।
जनों तहमत कश तसकीं न हो गर शादमानी की
नमक पाश ख़राश दिल है लज़त ज़नदगानी की
कशाकश हा हसती से करे कया साई आज़ादी
हवी ज़नजीर मोज आब को फ़रसत रवानी की
पस अज़ मरदन भी दयवानह ज़यारत गाह तफ़लां हे
शरार सनग ने तरबत पह मीरी ग़ुल फ़शानी की
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ ताहर में " ज़नजीर मोज आब
।
नकोहश है सज़ा फ़रयाद बीदाद दलबर की
मबादा ख़नद दनदां नमा हो सुबह महशर की
रग लीली को ख़ाक दशत मजनों रीशगी बख़शे
अगर बो दे बजा दानह दहक़ां नोक नशतर की
पर परवानह शएद बादबान कशत मे था
हवी मजलस की गरमी से रवानी दौोर साग़र की
करों बीदाद ज़ोक़ पौर फ़शानी अरज कया क़दरत
कि ताक़त उड़ गी अड़ने से पहले मीरे शहपर की
कहां तक रों उस के ख़ीमे के पीछे क़यामत हे
मरी क़िस्मत में या रब कया न थी दयवार पथर की
।
बे अातदालयों से सबुक सब में हम हवे
जतने ज़यादह हो गे अतने ही कम हवे
पनहां था दाम सख्त क़रीब आशयान के
अड़ने न पाे थे कि गरफ़तार हम हवे
हसती हमारी अपनी फ़ना पर दलील हे
यां तक मटे कि आप हम अपनी क़ौसम हवे
सख़ती कशान अशक़ की पोछे है कया ख़बर
वह लूग रफ़तह रफ़तह सरापा अलम हवे
तीरी वफ़ा से कया हो तलाफ़ी कि दहर मीं
तीरे सवा भी हम पह बहत से सितम हवे
लखते रहे जनों की हकएात ख़ों चकां
हर चनद इस में हाथ हमारे क़लम हवे
अललह री तीरी तनद ख़ो जस के बीम से
अजज़ा नालह दिल में मरे रज़क़ हम हवे
अहल होस की फ़तह है तरक नबरद अशक़
जो पां आथ गे वही उन के अलम हवे
नाले अदम में चनद हमारे सपरद थे
जो वां न खनच सके सौ वह यां आ के दम हवे
छोड़ी असद न हम ने गदाई में दिल लगी
साल हवे तो अाशक़ अहल करम हवे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ हमीदीह और मालिक राम में " दाम सख्त क़रीब
।
जो न नक़द दाग़ दिल की करे शालह पासबानी
तो फ़सरदगी नहां है बह कमीन बे ज़बानी
मझे इस से कया तोक़ा बह ज़मान जवानी
कभी कोदकी में जस ने न सनी मरी कहानी
यों ही दख किसी को दीना नहीं खूब वरनह कहता
कि मरे अदो को या रब मले मीरी ज़नदगानी
।
ज़लमत कदे में मीरे शब घाम का जोश हे
खाक शमा है दलील सहर सौ ख़मोश हे
ने मख़द वसाल न नज़ार जमाल
मदत हवी कि आशत चशम व गोश हे
मे ने कया है हसन ख़ोद आरा को बे हजाब
अे शौक़ यां अजाज़त तसलीम होश हे
गोहर को अक़द गरदन ख़ोबां में दीखना
कया ओज पर सतार गोहर फ़रोश हे
दीदार बादह होसलह साक़ी नगाह मसत
बज़म ख़याल मे कद बे ख़रोश हे
।क़।
अे ताज़ह वारदान बसात हवा दल
ज़नहार अगर तमहीं होस ना व नोश हे
दीखो मझे जो दीद अबरत नगाह हो
मीरी सनो जो गोश नसीहत नयोश हे
साक़ी बह जलोह दशमन एमान व आगही
मतरब बह नग़मह रहज़न तमकीन व होश हे
या शब को दीखते थे कि हर गोश बसात
दामान बाग़बान व कफ़ ग़ुल फ़रोश हे
लतफ़ ख़राम साक़ी व ज़ोक़ सदा चनग
यह जनत नगाह वह फ़रदोस गोश हे
या सुबह दम जो दीखये आ कर तो बज़म मीं
ने वह सुरूर व सोज़ न जोश व ख़रोश हे
दाग़ फ़राक़ सहबत शब की जली हवी
खाक शमा रह गी है सौ वह भी ख़मोश हे
आते हैं ग़ीब से यह मजामीं ख़याल मीं
ग़ालब सरीर ख़ामह नवा सरोश हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ आगरह 1863ء और नसख़ महर में सोर
।
आ कि मरी जान को क़रार नहीं हे
ताक़त बीदाद इन्तज़ार नहीं हे
दीते हैं जनत हयात दहर के बदले
नशह बह अनदाज़ ख़मार नहीं हे
गरीह नकाले है तीरी बज़म से मझ को
हाे कि रोने पह अख़तयार नहीं हे
हम से अबस है गमान रनजश ख़ातर
ख़ाक में अशाक़ की ग़बार नहीं हे
दिल से अठा लतफ़ जलोहहा माानी
ग़ीर ग़ुल आीन बहार नहीं हे
क़त्ल का मीरे कया है अहद तो बारे
वाे अगर अहद असतवार नहीं हे
तो ने क़िस्म मे कशी की खाई है ग़ालब
तीरी क़िस्म का कुछ अातबार नहीं हे
।
में उन्हें छीड़ों और कुछ न कहीं
चाल नकलते जो मे पये होते
क़हर हो या बला हो जो कुछ हो
काशके तुम मरे लिये होते
मीरी क़िस्मत में घाम गर अतना था
दिल भी या रब की दये होते
आ ही जाता वह राह पर ग़ालब
कोई दिन और भी जये होते
।
हजोम घाम से यां तक सर नगोनी मझ को हाशिल हे
कि तार दामन व तार नज़र में फ़रक़ मुश्किल हे
रफ़ो ज़ख़म से मतलब है लज़त ज़ख़म सोज़न की
समझयो मत कि पास दर्द से दयवानह ग़ाफ़ल हे
वह ग़ुल जस गलसतां में जलोह फ़रमाई करे ग़ालब
चटकना ग़नच ग़ुल का सदा ख़नद दिल हे
।
पा बह दामन हो रहा हों बसकह में सहरा नोरद
ख़ार पा हैं जोहर आीन ज़ानो मझे
दीखना हालत मरे दिल की हम आग़ोशी के वक़त
है नगाह आशना तीरा सर हर मो मझे
हों सरापा साज़ आहनग शकएत कुछ न पोछ
है यही बहतर कि लोगों में न छीड़े तो मझे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महरमीं " हम आग़ोशी के बाद
।
जस बज़म में तो नाज़ से गफ़तार में आवे
जां कालबद सोरत दयवार में आवे
साे की तरह साथ फरीं सरो व सनोबर
तो इस क़द दलकश से जो गलज़ार में आवे
तब नाज़ गरां मएग अशक बजा हे
जब लख़त जिगर दीद ख़ों बार में आवे
दे मझ को शकएत की अजाज़त कि सतमगर
कुछ तझ को मज़ह भी मरे आज़ार में आवे
इस चशम फ़सों गर का अगर पाे अशारह
तोती की तरह आीनह गफ़तार में आवे
कानटों की ज़बां सोख गी पयास से या रब
खाक आबलह पा वादी पर ख़ार में आवे
मर जां न कयों रशक से जब वह तन नाज़क
आग़ोश ख़म हलक़ ज़ुनार में आवे
ग़ारत गर नामोस न हो गर होस ज़र
कयों शाहद ग़ुल बाघ से बाज़ार में आवे
तब चाक गरीबां का मज़ा है दल नालां
जब खाक नफ़स अलझा हवा हर तार में आवे
आतश कदह है सीनह मरा राज़ नहां से
अे वाे अगर मारज इज़हार में आवे
गनजीन मानी का तलसम इस को समझये
जो लफ़्ज़ कि ग़ालब मरे अशाार में आवे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* मालिक राम और अरशी में है दल नादां लीकन नालां ही ग़ालब के अनदाज़ बयान के मताबक़ ज़यादह दरसत मालूम होता है
।।
हसन मह गरचह बह हनगाम कमाल अचा हे
इस से मेरा मह ख़ोरशीद जमाल अचा हे
बोसह दीते नहीं और दिल पह है हर लहज़ह नगाह
जी में कहते हैं कि मफ़त आे तो माल अचा हे
और बाज़ार से ले आे अगर टोट गया
साग़र जम से मरा जाम सफ़ाल अचा हे
बे तलब दीं तो मज़ह इस में सवा मलता हे
वह गदा जस को न हो ख़ो सवाल अचा हे
उन के दीखे से जो आ जाती है मनह पर रोनक़
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अचा हे
दीखये पाते हैं अशाक़ बतों से कया फ़ीज
खाक बरहमन ने कहा है कि यह साल अचा हे
हम सख़न तीशे ने फ़रहाद को शीरीं से कया
जस तरह का कह किसी में हो कमाल अचा हे
क़तरह दरया में जो मल जाे तो दरया हो जाे
काम अचा है वह जस का कि मआल अचा हे
ख़जर सलतां को रखे ख़ालक़ अकबर सर सबज़
शाह के बाघ में यह ताज़ह नहाल अचा हे
हम को मालूम है जनत की हक़ीक़त लीकन
दिल के ख़ोश रखने को ग़ालब यह ख़याल अचा हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में जस तरह का भी
।
न हवी गर मरे मरने से तसली न सही
अमतहां और भी बाक़ी हो तो यह भी न सही
ख़ार ख़ार अलम हसरत दीदार तो हे
शौक़ गलचीन गलसतान तसली न सही
मे परसतां ख़म मे मनह से लगाे ही बने
एक दिन गर न हवा बज़म में साक़ी न सही
नफ़स क़ीस कि है चशम व चराग़ सहरा
गर नहीं शमा सीह ख़ान लीली न सही
एक हनगामे पह मोक़ोफ़ है घर की रोनक़
नोह घाम ही सही नग़म शादी न सही
न सताश की तमना न सले की परवा
गर नहीं हैं मरे अशाार में मानी न सही
अशरत सहबत ख़ोबां ही ग़नीमत समझो
न हवी ग़ालब अगर अमर तबयाई न सही
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में पर
।
अजब नशात से जलाद के चले हैं हम आगे
कि अपने साे से सर पां से है दो क़दम आगे
क़जा ने था मझे चाहा ख़राब बाद अलफ़त
फ़क़त ख़राब लखा बस न चाल सका क़लम आगे
ग़म ज़मानह ने झाड़ी नशात अशक़ की मसती
वगरनह हम भी अठाते थे लज़त अलम आगे
खुद के वासते दाद इस जनोन शौक़ की दीना
कि इस के डर पह पहनचते हैं नामह बर से हम आगे
यह उमर भर जो परीशानयां अठाई हैं हम ने
तमहारे आयो अे तरह हा ख़म बह ख़म आगे
दिल व जिगर में पौर अफ़शां जो एक मोज ख़ों हे
हम अपने ज़ाम में समझे हवे थे इस को दम आगे
क़िस्म जनाज़े पह आने की मीरे खाते हैं ग़ालब
हमीशह खाते थे जो मीरी जान की क़िस्म आगे
।
शकवे के नाम से बे महर ख़फ़ा होता हे
यह भी मत कहह कि जो कहये तो गला होता हे
पुर हों में शकवे से यों राग से जीसे बाजा
खाक ज़रा छीड़ये फर दीखये कया होता हे
गो समझता नहीं पर हसन तलाफ़ी दीखो
शको जोर से सर गरम जफ़ा होता हे
अशक़ की राह में है चरख़ मकोकब की वह चाल
ससत रो जीसे कोई आबलह पा होता हे
कयों न ठहरीं हदफ़ नओक बीदाद कि हम
आप अठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता हे
खूब था पहले से होते जो हम अपने बुद ख़वाह
कि भला चाहते हैं और बुरा होता हे
नालह जाता था परे अरश से मेरा और अब
लब तक आता है जो एसा ही रसा होता हे
।क़।
ख़ामह मेरा कि वह है बारबुद बज़म सख़न
शाह की मदह में यों नग़मह सरा होता हे
अे शहनशाह कवाकब सपह व महर अलम
तीरे अकराम का हक़ किस से अदा होता हे
सात अक़लीम का हाशिल जो फ़राहम कीजे
तो वह लशकर का तरे नाल बहा होता हे
हर महीने में जो यह बदर से होता है हलाल
आसतां पर तरे मह नासीह सा होता हे
में जो गसताख़ हों आीन गज़ल ख़वानी मीं
यह भी तीरा ही करम ज़ोक़ फ़ज़ा होता हे
रखयो ग़ालब मझे इस तल्ख नवाई में मााफ़
आज कुछ दर्द मरे दिल में सवा होता हे
।
हर एक बात पह कहते हो तुम कि तो कया हे
तमहीं कहो कि यह अनदाज़ गफ़तगो कया हे
न शाले में यह करशमह न बरक़ में यह अदा
कोई बता कि वह शोख़ तनद ख़ो कया हे
यह रशक है कि वह होता है हम सख़न तुम से
वगरनह ख़ोफ़ बुद आमोज़ी अदो कया हे
चपक रहा है बदन पर लहो से पीराहन
हमारे जौीब को अब हाजत रफ़ो कया हे
जला है जसम जहां दिल भी जाल गया होगा
करीदते हो जो अब राख जसतजो कया हे
रगों में दोड़ते फरने के हम नहीं क़ाल
जब आनख से ही न टपका तो फर लहो कया हे
वह चीज़ जस के लिये हम को हो बहशत अज़ीज़
सवा बाद गलफ़ाम मशक बो कया हे
पयों शराब अगर ख़म भी दीख लों दो चार
यह शीशह व क़दह व कोज़ह व सबो कया हे
रही न ताक़त गफ़तार और अगर हो भी
तो किस अमीद पह कहये कि आरज़ो कया हे
हवा है शह का मसाहब फरे है अतराता
वगरनह शहर में ग़ालब की आबरो कया हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
असल नसख़े में जब आनख से ही है लीकन बाज जदीद नसख़ों में जब आनख ही से रखा गया है जस से मतलब ज़यादह वाजह हो जाता है लीकन नज़ामी में यों ही हे।
** बादह व गलफ़ाम मशक बो। नसख़ महर
।
ग़ीर लीं महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहीं यों तशनह लब पीग़ाम के
ख़सतगी का तुम से कया शकोह कि यह
हथकनडे हैं चरख़ नीली फ़ाम के
खत लखीं गे गरचह मतलब कुछ न हो
हम तो अाशक़ हैं तमहारे नाम के
रात पी ज़मज़म पह मे और सुबह दम
धवे धबे जाम अहराम के
दिल को आँखों ने फनसएा कया मगर
यह भी हलक़े हैं तमहारे दाम के
शाह की है ग़सल सहत की ख़बर
दीखये कब दिन फरीं हमाम के
अशक़ ने ग़ालब नकमा कर दया
वरनह हम भी आदमी थे काम के
।
फर इस अनदाज़ से बहार आी
कि हवे महर व मह तमाशाई
दीखो अे साकनान ख़त ख़ाक
इस को कहते हैं अालम आराई
कि ज़मीं हो गी है सर ता सर
रो कश सतह चरख़ मीनाई
सबज़े को जब कहीं जगह न मली
बन गया रो आब पर काई
सबज़ह व ग़ुल के दीखने के लये
चशम नरगस को दी है बीनाई
है हवा में शराब की तासीर
बादह नोशी है बाद पीमाई
कयों न दनया को हो खुशी ग़ालब
शाह दीं दार ने शफ़ा पाई
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
असल नसख़े में अमला है दीनदार जब कि तक़तया में नोन ग़नह आता है इस ल तलफ़ज़ की वजाहत के ल यहां दीं दार लखा गया हे
।
तग़ाफ़ल दोस्त हों मेरा दमाग़ अजज़ अाली हे
अगर पहलो तही कीजे तो जा मीरी भी ख़ाली हे
रहा आबाद अालम अहल हमत के न होने से
भरे हैं जस क़दर जाम व सबो मे ख़ानह ख़ाली हे
।
कब वह सनता है कहानी मीरी
और फर वह भी ज़बानी मीरी
ख़लश ग़मज़ ख़ों रीज़ न पोछ
दीख ख़ों नाबह फ़शानी मीरी
कया बयां कर के मरा रवीं गे यार
मगर आशफ़तह बयानी मीरी
हों ज़ ख़ोद रफ़त बीदा ख़याल
भूल जाना है नशानी मीरी
मतक़ाबल है मक़ाबल मीरा
रुक गया दीख रवानी मीरी
क़दर सनग सर रह रखता हों
सख्त अरज़ां है गरानी मीरी
गरद बाद रह बीताबी हों
सरसर शौक़ है बानी मीरी
दहन इस का जो न मालूम हवा
खल गी हीच मदानी मीरी
कर दिया जाफ़ ने अाजज़ ग़ालब
ननग पीरी है जवानी मीरी
।
नक़श नाज़ बत तनाज़ बह आग़ोश रक़ीब
पा तास पे ख़ाम मानी मानगे
तो वह बुद ख़ो कि तहीर को तमाशा जाने
घाम वह अफ़सानह कि आशफ़तह बयानी मानगे
वह तब अशक़ तमना है कि फर सोरत शमा
शालह ता नबज जिगर रीशह दवानी मानगे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* तप। नसख़ महर
।
गलशन को तरी सहबत अज़ बसकह ख़ोश आी है
हर ग़नचे का ग़ुल होना आग़ोश कशाई है
वां कुनगर असतग़ना हर दम है बलनदी पर
यां नाले को ऊर अलटा दावा रसाई हे
अज़ बसकह सखाता है घाम जबत के अनदाज़े
जो दाग नज़र आया खाक चशम नमाई हे
।
जस ज़ख़म की हो सकती हो तदबीर रफ़ो की
लिख दीजयो या रब असे क़िस्मत में अदो की
अचा है सर अनगशत हनाई का तसोर
दिल में नज़र आती तो है खाक बोनद लहो की
कयों डरते हो अशाक़ की बे होसलगी से
यां तो कोई सनता नहीं फ़रयाद कसो की
दशने ने कभी मनह न लगएा हो जिगर को
ख़नजर ने कभी बात न पोछी हो गलो की
सद हीफ़ वह ना काम कि खाक उमर से ग़ालब
हसरत में रहे एक बत अरबदह जो की
।
सीमाब पशत गरमी आीनह दे है हम
हीरां कये हवे हैं दल बे क़रार के
आग़ोश ग़ुल कशोदह बरा वदाा हे
अे अनदलीब चल कि चले दिन बहार के
।
है वसल हजर अालम तमकीन व जबत मीं
माशोक़ शोख़ व अाशक़ दयवानह चाह
उस लब से मल ही जा गा बोसह कभी तो हां
शोक़ फ़जोल व जरत रनदानह चाह
।
चाहये अछों को ، जतना चाहये
यह अगर चाहीं तो फर कया चाहये
सुहबत रनदां से वाजब है हौज़र
जा मे ، अपने को खीनचा चाहये
चाहने को तीरे कया समझा था दिल ؟
बारे अब अस से भी समझा चाहये !
चाक मत कर जीब ، बे एाम गुल
कुछ अधर का भी अशारह चाहये
दोसती का परदह है बीगानगी
मनह चुपाना हम से छोड़ा चाहये
दुशमनी ने मीरी ، खोया ग़ीर को
कस क़दर दुशमन है ، दीखा चाहये
अपनी रुसवाई में कया चलती है सौाई
यार ही हनगामह आरा चाहये
मनहसर मरने पह हो जस की अमीद
नाउमीदी उस की दीखा चाहये
ग़ाफ़ल ، अन मह तलातों के वासते
चाहने वाला भी अच्चा चाहये
चाहते हैं ख़ुोबरोयों को असद
आप की सुोरत तो दीखा चाहये
।
हर क़दम दोर मनज़ल है नमएां मझ से
मीरी रफ़्तार से भागे है ، बयाबां मझ से
दरस अनवान तमाशा ، बह तग़ाफ़ल ख़ुोशतर
है नगह रशत शीराज़ मख़गां मझ से
वहशत आतश दिल से ، शब तनहाई में
सोरत दुोद ، रहा सएह गुरीज़ां मझ से
ग़म अशाक़ न हो ، सादगी आमोज़ बुतां
कस क़दर ख़ान आीनह है वीरां मझ से
असर आबलह से ، जाद सहरा जुनों
सुोरत रशत गोहर है चराग़ां मझ से
बीख़ोदी बसतर तमहीद फ़राग़त हो जो
पुर है सएे की तरह ، मेरा शबसतां मझ से
शोक़ दीदार में ، गर तुो मझे गर्दन मारे
हो नगह ، मसल गुल शमा ، परीशां मझ से
बीकसी हा शब हजर की वहशत ، है है !
सएह ख़ुोरशीद क़यामत में है पनहां मझ से
गरदश साग़र सद जलो रनगीं ، तझ से
आीनह दार यक दीद हीरां ، मुझ से
नगह गरम से एक आग टपकती है ، असद
है चराग़ां ، ख़स व ख़ाशाक गुलसतां मझ से
।
नकतह चीं है ، ग़म दिल उस को सुनाे न बने
कया बने बात ، जहां बात बनाे न बने
में बुलाता तो हों उस को ، मगर अे जज़ब दिल
उस पह बन जाे कुछ एसी कि बन आे न बने
खील समझा है ، कहीं छोड़ न दे ، भूल न जाे
काश ! युों भी हो कि बन मीरे सताे न बने
ग़ीर फरता है लिये यों तरे खत को कि ، अगर
कोई पुोछे कि यह कया है ، तो चुपाे न बने
अस नज़ाकत का बुरा हो ، वह भले हैं ، तो कया
हाथ आवीं ، तो उनीं हाथ लगाे न बने
कहह सके कौन कि यह जलोह गरी किस की है
परदह छोड़ा है वह उस ने कि उठाे न बने
मौत की राह न दीखों ؟ कि बन आे न रहे
तुम को चाहों ؟ कि न आ ، तो बुलाे न बने
बोझ वह सर से गरा है कि उठाे न उठे
काम वह आन पड़ा है कि बनाे न बने
अशक़ पर ज़ोर नहीं ، है यह वह आतश ग़ालब
कि लगाे न लगे ، और बुझाे न बने
।
चाक की ख़वाहश ، अगर वहशत बह अुरयानी करे
सुबह के माननद ، ज़ख़म दिल गरीबानी करे
जलवे का तीरे वह अालम है कि ، गर कीजे ख़याल
दीद दिल को ज़यारत गाह हीरानी करे
है शकसतन से भी दिल नोमीद ، यारब ! कब तलक
आबगीनह कोह पर अरज गरानजानी करे
मीकदह गर चशम मसत नाज़ से पओे शकसत
मुो शीशह दीद साग़र की मख़गानी करे
ख़त अारज से ، लखा है ज़ुलफ़ को अलफ़त ने अहद
यक क़लम मनज़ोर है ، जो कुछ परीशानी करे
।
वह आ के ، ख़वाब में ، तसकीन अजतराब तो दे
वले मझे तपश दिल ، मजाल ख़वाब तो दे
करे है क़त्ल ، लगओट में तीरा रो दीना
तरी तरह कोई तीग़ नगह को आब तो दे
दखा के जनबश लब ही ، तमाम कर हम को
न दे जो बोसह ، तो मनह से कहीं जवाब तो दे
पला दे ओक से साक़ी ، जो हम से नफरत है
पयालह गर नहीं दीता ، न दे शराब तो दे
असद ! खुशी से मरे हाथ पां पुोल गे
कहा जो उस ने ، ज़रा मीरे पां दाब तो दे
।
तपश से मीरी ، वक़फ़ कश मकश ، हर तार बसतर हे
मरा सर रनज बालीं है ، मरा तौन बार बसतर है
सरशक सर बह सहरा दादह ، नोरालाईन दामन है
दल बे दोस्त व पा उफ़तादह बर ख़ोरदार बसतर है
ख़ोशा अक़बाल रनजोरी ! अयादत को तुम आे हो
फ़रोग़ शमा बालीं ، ताला बीदार बसतर है
बह तोफ़ां गाह जोश अजतराब शाम तनहाई
शााा आफ़ताब सबह महशर तार बसतर है
अभी आती है बुो ، बालश से ، उस की ज़लफ़ मशकीं की
हमारी दीद को ، ख़वाब ज़लीख़ा ، अार बसतर है
कहों कया ، दिल की कया हालत है हजर यार में ، ग़ालब
कि बे ताबी से हर यक तार बसतर ، ख़ार बसतर है
।
ख़तर है रशत उलफ़त रग गर्दन न हो जाे
ग़रोर दोसती आफ़त है ، तुो दुशमन न हो जाे
समझ इस फ़सल में कोताह नशोोनमा ، ग़ालब
अगर गुल सौरो के क़ामत पह ، पीराहन न हो जाे
।
फ़रयाद की कोई लौे नहीं है
नालह पाबनद नौे नहीं है
कयों बोते हैं बाग़बां तोनबे
गर बाघ गदाे मौे नहीं है
हर चनद हर एक शे में तुो है
पौर तुझ सी कोई शे नहीं है
हां ، खायो मत फ़रीब हसती
हर चनद कहीं कि हे ، नहीं है
शादी से गुज़र कि ، घाम न होवे
उरदी जो न हो ، तो दौे नहीं है
कयों रद क़दह करे है ज़ाहद !
मौे है यह मगस की क़ौे नहीं है
हसती है ، न कुछ अौदम है ، ग़ालब
आख़र तुो कया है ، ऐ नहीं हे
।
न पुोछ नसख़ मरहम जराहत दिल का
कि अस में रीज़ अलमास जज़ो अाज़म है
बहत दनों में तग़ाफ़ल ने तीरे पीदा की
वह अक नगह कि ، बज़ाहर नगाह से कम है
229.
हम रशक को अपने भी गवारा नहीं करते
मरते हैं ، वले ، उन की तमना नहीं करते
डर परदह उनीं ग़ीर से है रबत नहानी
ज़ाहर का यह परदह है कि परदह नहीं करते
यह बाास नोमीदी अरबाब होस है
ग़ालब को बुरा कहते हो ، अच्चा नहीं करते
।
करे है बादह ، तरे लब से ، कसब रनग फ़रोग़
ख़त पयालह ، सरासर नगाह गलचीं है
कभी तो अस सर शोरीदह की भी दाद मले
कि एक अुमर से हसरत परसत बालीं है
बजा है ، गर न सुने ، नालह हाे बुलबल ज़ार
कि गोश गुल ، नम शबनम से पनबह आगीं है
असद है नज़ा में ، चाल बयोफ़ा ! बराे ख़ुदा
मक़ाम तरक हजाब व वदाा तमकीं है
।
कयों न हो चशम बुतां महो तग़ाफ़ल ، कयों न हो
यानी इस बीमार को नज़ारे से परहीज़ है
मरते मरते ، दीखने की आरज़ुो रह जाे गी
वाे नाकामी ! कि उस काफ़िर का ख़नजर तीज़ है
अारज गुल दीख ، रुवे यार याद आया ، असद
जोशश फ़सल बहारी अशतयाक़ अनगीज़ है
।
दिया है दिल अगर उस को ، बशर है ، कया कहये
हवा रक़ीब ، तो हो ، नामह बर है ، कया कहये
यह जद कि आज न आवे ، और आे बन न रहे
क़जा से शकोह हमें कस क़दर है ، कया कहये
रहे है यों गह व बे गह ، कि कुवे दोस्त को अब
अगर न कहये कि दुश्मन का घर है ، कया कहये
ज़हे करशमह कि यों दे रखा है हम को फ़रीब
कि बन कहे ही उन्हें सब ख़बर हे कया कहये
समझ के करते हैं ، बाज़ार में वह पुरसश हाल
कि यह कहे कि ، सर रहगज़र है ، कया कहये
तमहीं नहीं है सर रशत वफ़ा का ख़याल
हमारे हाथ में कुछ है ، मगर है कया कहये
उनहीं सवाल पह ज़ाम जनों है ، कयों लड़ये
हमें जवाब से क़ता नज़र है ، कया कहये
हौसद ، सज़ाे कमाल सख़न है ، कया कीजे
सतम ، बहाे मताा हुनर है ، कया कहये
कहा है कस ने कि ग़ालब बुरा नहीं ، लीकन
सवाे इस के कि आशफ़तह सर है ، कया कहये
।
दीख कर डर परदह गरम दामन अफ़शानी मझे
कर गी वाबसत तन मीरी अुरयानी मझे
बन गया तीग़ नगाह यार का सनग फ़ौसां
मरहबा मौीं कया मबारक है गरां जानी मझे
कयों न हो बे अलतफ़ाती ، उस की ख़ातर जमा है
जानता है महो पुरसश हाे पनहानी मझे
मीरे ग़मख़ाने की क़िस्मत जब रक़म होने लगी
लख दिया मनजमल असबाब वीरानी ، मझे
बदगमां होता है वह काफ़िर ، न होता ، काशके
अस क़दर ज़ोक़ नवाे मुरग़ बुसतानी मझे
वाे ! वां भी शोर महशर ने न दौम लीने दिया
ले गया था गोर में ज़ोक़ तन आसानी मझे
वादह आने का वफ़ा कीजे ، यह कया अनदाज़ है ؟
तुम ने कयों सोनपी है मीरे घर की दरबानी मझे
हां नशात आमद फ़सल बहारी ، वाह वाह !
फर हुवा है ताज़ह सोदाे गज़ल ख़वानी मझे
दी मरे भाई को हक़ ने अज़ सर नौो ज़नदगी
मीरज़ा योसफ़ है ، ग़ालब ! योसफ़ सानी मझे
।
याद है शादी में भी ، हनगाम यारब ، मझे
सुबह ज़ाहद हवा है ، ख़नदह ज़ीर लब मझे
है कुशाद ख़ातर वाबसतह दौर ، रहन सख़न
था तलसम क़ुफ़ल अबजद ، ख़ान मकतब मझे
यारब ! अस आशफ़तगी की दाद किस से चाहये
रशक ، आसाश पह है ज़नदानयों की अब मझे
तबा है मशताक़ लज़त हाे हसरत कया करों
आरज़ो से ، है शकसत आरज़ो मतलब मझे
दिल लगा कर आप भी ग़ालब मुझी से होगये
अशक़ से आते थे माना ، मीरज़ा साहब मझे
।
हजोर शाह में अहल सख़न की आज़माश है
चमन में ख़ोश नोएान चमन की आज़माश है
क़द व गीसो में ، क़ीस व कोहकन की आज़माश है
जहां हम हैं ، वहां दार व रसन की आज़माश है
करीं गे कोहकन के होसले का अमतहां आख़र
हनोज़ उस ख़सतह के नीरो तन की आज़माश है
नसीम मसर को कया पीर कनाां की हवा ख़वाही
उसे योसफ़ की बुवे पीरहन की आज़माश है
वह आया बज़म में ، दीखो ، न कहयो फर कि ग़ाफ़ल थे
शकीब व सबर अहल अनजमन की आज़माश है
रहे दिल ही में तीर *، अच्चा ، जिगर के पार हो ، बहतर
ग़रज शसत बुत नओक फ़गन की आज़माश है
नहीं कुछ सुबह व ज़ुनार के फनदे में गीराई
वफ़ादारी में शीख़ व बरहमन की आज़माश है
पड़ा रह ، अे दल वाबसतह ! बीताबी से कया हासल
मगर फर ताब ज़ुलफ़ पुरशकन की आज़माश है
रग व पौे में जब उतरे ज़हर घाम ، तब दीखये कया हो
अभी तो तलख़ काम व दहन की आज़माश है
वह आवीं गे मरे घर ، वादह कीसा ، दीखना ، ग़ालब
ने फ़तनों में अब चरख़ कुहन की आज़माश है
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महरमीं रहे गर दिल में तीर
** असल नसख़ों में आज़मएश है लीकन हम ने मोजोदह अमला को तरजीह दे कर आज़माश लखा हे।
।
कभी नीकी भी उस के जी में ، गर आजाे है ، मुझ से
जफ़ाईं कर के अपनी याद ، शरमा जाे है ، मुझ से
ख़ुदएा ! जज़ब दिल की मगर तासीर उलटी है !
कि जतना खीनचता हों ، और कनचता जाे है मुझ से
वह बौद ख़ुो ، और मीरी दासतान अशक़ तुोलानी
अबारत मुख़तसर ، क़ासद भी घबरा जाे है ، मुझ से
उधर वह बदगमानी है ، अधर यह नातवानी है
न पुोछा जाे है उस से ، न बोला जाे है मझ से
सनभलने दे मझे अे ना उमीदी ! कया क़यामत है !
कि दामान ख़याल यार ، चुोटा जाे है मुझ से
तकलफ़ बर तरफ़ ، नज़ारगी में भी सही ، लीकन
वह दीखा जाे ، कब यह ज़ुलम दीखा जाे है ، मुझ से
हवे हैं पां ही पहले नबरद अशक़ में ज़ख़मी
न भागा जाे है मझ से ، न ठहरा जाे है मझ से
क़यामत है कि होवे मुदाई का हमसफ़र ग़ालब !
वह काफ़िर ، जो ख़ुदा को भी न सोनपा जाे है मुझ से
।
ज़बसकह मशक़ तमाशा जनों अलामत है
कशाद व बसत मख़ह ، सील नदामत है
न जानों ، कयोनकह मटे दाग़ तान बुद अहदी
तझे कि आीनह भी वरत मलामत है
बह पीच व ताब होस ، सलक अाफ़ीत मत तोड़
नगाह अजज़ सर रशत सलामत है
वफ़ा मक़ाबल व दावा अशक़ बे बुनयाद
जनोन साख़तह व फ़सल गुल ، क़यामत हे
।
लाग़र अतना हों कि गर तो बज़म में जा दे मझे
मेरा ज़मह दीख कर गर कोई बतला दे मझे
कया ताजब है कि उस को दीख कर आजाे रहम
वा जूता तलक कोई किसी हीले से पहनचा दे मझे
मनह न दखलओे न दखला पर बह अनदाज़ अताब
खोल कर परदह ज़रा आनखीं ही दखला दे मझे
यां तलक मीरी गरफ़तारी से वह ख़ो श है कि मौीं
ज़लफ़ गर बन जां तो शाने में उलझा दे मझे
।
बाज़ीच अतफ़ाल है दनया मरे आगे
होता है शब व रोज तमाशा मरे आगे
खाक खील है ओरनग सलीमां मरे नज़दीक
खाक बात है अाजाज़ मसीहा मरे आगे
जज़ नाम नहीं सोरत अालम मझे मनज़ोर
जज़ वहम नहीं हसत अशया मरे आगे
होता है नहां गरद में सहरा मरे होते
गसता है जबीं ख़ाक पह दरया मरे आगे
मत पोछ कि कया हाल है मीर अ तरे पीछे
तो दीख कि कया रनग है तीरा मरे आगे
सच कहते हो ख़ोद बीन व ख़ोद आरा हों न कयो जूता हों
बीठा है बत आनह सीमा मरे आगे
फर दीखये अनदाज़ ग़ुल अफ़शान गफ़तार
रख दे कोई पीमान सहबा मरे आगे
नफरत का गमां गज़रे हे में रशक से गज़रा
कयोनकर कहों लो नाम न उन का मरे आगे
एमां मझे रोके हे जो खीनचे है मझे कुफ़्र
काबह मरे पीछे है कलीसा मरे आगे
अाशक़ हों पह माशोक़ फ़रीबी है मरा काम
मजनों को बुरा कहती है लीले मरे आगे
ख़ोश होते हैं पर वसल में यों मर नहीं जाते
आी शब हजरां की तमना मरे आगे
है मोजज़न खाक क़लज़म ख़ों काश यही हो
आता है अभी दीखये कया कया मरे आगे
गो हाथ को जनबश नहीं आँखों में तो दम हे
रहने दो अभी साग़र व मीना मरे आगे
हम पीशह व हम मशरब व हम राज़ है मेरा
ग़ालब को बुरा कयों कहो अच्चा मरे आगे
।
कहों जो हाल तो कहते हो मदाा कहये "
तमहीं कहो कि जो तुम यों कहो तो कया कहये
न कहयो तान से फर तुम कि हम सतमगर हैं "
मझे तो ख़ो है कि जो कुछ कहो बजा कहये
वह नीशतर सही पर दिल में जब अतर जओे
नगाह नाज़ को फर कयों न आशना कहये
नहीं ज़रया राहत जराहत पीकां
वह ज़ख़म तीग़ है जस को कि दलकशा कहये
जो मदाई बने इस के न मदाई बनये
जो ना सज़ा कहे इस को न ना सज़ा कहये
कहीं हक़ीक़त जानकाह मरज लखये
कहीं मसीबत ना साज़ दवा कहये
कभी शकएत रनज गरां नशीं कीजे
कभी हकएत सबर गरीज़ पा कहये
रहे न जान तो क़ातिल को ख़ोनबहा दीजे
कटे ज़बान तो ख़नजर को मरहबा कहये
नहीं नगार को अलफ़त न हो नगार तो हे
रवान रोश व मसत अदा कहये
नहीं बहार को फ़रसत न हो बहार तो हे
तरवात चमन व ख़ोब हवा कहये
सफ़ीनह जब कि कनारे पह आलगा ग़ालब
खुद से कया सितम व जोर नाख़दा कहये
।
रोने से और अशक़ में बेबाक हो ग
धो गहम एसे कि बस पाक हो ग
सरफ़ बहा मे हो आलात मीकशी
थे यह ही दो हसाब सौ यों पाक हो ग
रसवा दहर गो हो आवारगी से तम
बारे तबयातों के तो चालाक हो ग
कहता है कौन नाल बलबल को बे असर
परदे में गुल के लाख जिगर चाक हो ग
पोछे है कया वजोद व अदम अहल शौक़ का
आप अपनी आग के ख़स व ख़ाशाक हो ग
करने ग थे इस से तग़ाफ़ुल का हम गलह
की एक ही नगाह कि बस ख़ाक हो ग
इस रनग से अठाई कुल इस ने असद की नाश
दुश्मन भी जस को दीख के ग़मनाक हो ग
।
नशह हा शादाब रनग व साज़ हा मसत तरब
शीश मे सरो सबज़ जोबार नग़मह हे
हम नशीं मत कहह कि बरहम करनह बज़म अीश दोसत
वां तो मीरे नाले को भी अातबार नग़मह हे
।
अरज नाज़ शोख़ दनदां बरा ख़नदह हे
दाो जमाईत अहबाब जा ख़नदह हे
है अदम में ग़नचह महो अबरत अनजाम गुल
यक जहां ज़ानो तामल डर क़फ़ा ख़नदह हे
कलफ़त अफ़सरदगी को अीश बे ताबी हराम
वरनह दनदां डर दिल अफ़शरदन बना ख़नदह हे
सोज़श बातन के हैं अहबाब मनकर वरनह यां
दिल महीत गरीह व लब आशना ख़नदह हे
।
हसन बे परवा ख़रीदार मताा जलोह हे
आनह ज़ानो फ़कर अख़तराा जलोह हे
ता कुजा अे आगही रनग तमाशा बाख़तन
चशम वा गर दीदह आग़ोश वदाा जलोह हे
।
जब तक दहान ज़ख़म न पीदा करे कवी
मुश्किल कि तझ से राह सख़न वा करे कवी
अालम ग़ुबार वहशत मजनों है सर बसर
कब तक ख़याल तर लीली करे कवी
अफ़सरदगी नहीं तरब अनशा अलतफ़ात
हां दर्द बन के दिल में मगर जा करे कवी
रोने से अे नदीम मलामत न कर मझे
आख़र कभी तो अुक़द दिल वा करे कवी
चाक जिगर से जब रह परसश न वा हवी
कया फ़ादह कि जौीब को रसवा करे कवी
लख़त जिगर से है रग हर ख़ार शाख़ गल
ता चनद बाग़बान सहरा करे कवी
नाकाम नगाह है बरक़ नज़ारह सोज़
तो वह नहीं कि तझ को तमाशा करे कवी
हर सनग व ख़शत है सदफ़ गोहर शकसत
नक़सां नहीं जनों से जो सोदा करे कवी
सौर बौर हवी न वाद सबर आज़मा से अुमर
फ़ुरसत कहां कि तीरी तमना करे कवी
है वहशत तबयात एजाद यास ख़ीज़
यह दर्द वह नहीं कि न पीदा करे कवी
बीकार जनों को है सर पीटने का शग़ल
जब हाथ टोट जाईं तो फर कया करे कवी
हसन फ़रोग़ शमा सुख़न दूर है असद
पहले दल गदाख़तह पीदा करे कवी
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नोट यह मसराह मख़तलफ़ नसख़ों में मख़तलफ़ हे।
नसख़ महर यह दर्द वह नहीं हेकह पीदा करे कवी।
नसख़ ताहर यह दर्द वह नहीं है जो पीदा करे कवी
नसख़ आसी यह दर्द वह नहीं कि न पीदा करे कवी
नसख़ हमीदीह यह दर्द वह नहीं कि न पीदा करे कवी
।
अबन मरीम हवा करे कोई
मीरे दख की दवा करे कोई
शरा व आीन पर मदार सही
एसे क़ातिल का कया करे कोई
चाल जीसे कड़ी कमान का तीर
दिल में एसे के जा करे कोई
बात पर वां ज़बान कटती है
वह कहीं और सना करे कोई
बक रहा हों जनों में कया कया कुछ
कुछ न समझे खुद करे कवी
न सनो अगर बुरा कहे कवी
न कहो गर बुरा करे कवी
रोक लो गर ग़लत चले कवी
बख़श दो गर ख़ता करे कोई
कौन है जो नहीं है हाजत मनद
किस की हाजत रवा करे कवी
कया कया ख़जर ने सकनदर से
अब कसे रहनमा करे कवी
जब तोक़ा ही आथ गी ग़ालब
कयों किसी का गलह करे कोई
।
बहत सही ग़म गीती शराब कम कया हे
ग़ुलाम साक़ कोसर हों मझ को घाम कया है
तमारी तरज़ व रोश जानते हैं हम कया है
रक़ीब पर है अगर लतफ़ तो सितम कया है
कटे तो शब कहीं काटे तो सानप कहलओे
कोई बता कि वह ज़ुलफ़ ख़म बह ख़म कया है
लखा करे कोई अहकाम ताला मोलोद
कसे ख़बर है कि वां जनबश क़लम कया हे
न हशरोनशर का क़ाल न कीश व मलत का
खुद के वासते एसे की फर क़िस्म कया हे
वह दाद वदीद गरां मएह शरत है हमदम
वगरनह मुहर सलीमान व जाम जम कया है
सख़न में ख़ाम ग़ालब की आतश अफ़शानी
यक़ीन है हम को भी लीकन अब इस में दम कया हे
।
बाघ पा कर ख़फ़क़ानी यह डराता है मझे
सए शाख़ गुल अफ़ाई नज़र आता है मझे
जोहर तीग़ बह सर चशम दीगर मालूम
हूँ में वह सबज़ह कि ज़हरआब उगाता है मझे
मदाा महोतमाशाे शकसत दिल है
आनह ख़ाने में कोई ल जाता है मझे
नालह सरमए यक अालम व अालम कफ़ ख़ाक
आसमान बीज क़मरी नज़र आता है मझे
ज़नदगी में तो वह महफ़िल से उठा दीते थे
दीखों अब मर गे पर कौन उठाता है मझे
।
रोनदी हवी है कोकबह शहरयार की
अतराे कयों न ख़ाक सर रहगज़ार की
जब इस के दीखने के लिये आीं बादशाह
लोगों में कयोंनमोद न हो लालह ज़ार की
बुोके नहीं हैं सीर गलसतान के हम वले
कयों कर न खाये कि हवा है बहार की
।
हज़ारों ख़वाहशीं एसी कि हर ख़वाहश पह दम नकले
बहत नकले मरे अरमान लीकन फर भी कम नकले
डरे कयों मेरा क़ातल कया रहे गा उस की गर द न पर
वह ख़ों जो चशम तर से उमर भर यों दम बह दम नकले
नकलना ख़लद से आदम का सनते आे हैं लीकन
बहत बे आबरो हो कर तरे कोचे से हम नकले
भर म खल जाे ज़ालम तीरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तर परपीच व ख़म का पीच व ख़म नकले
मगर लखवाे कोई इस को खत तो हम से लखवाे
हवी सुबह और घर से कान पर रख कर क़लम नकले
हवी अस दूर में मनसोब मझ से बादह आशामी
फर आया वह ज़मानह जो जहां में जाम जम नकले
हवी जिन से तोक़ा ख़सतगी की दाद पाने की
वह हम से भी ज़यादह ख़सत तीग़ सितम नकले
महबत में नहीं है फ़रक़ जीने और मरने का
असी को दीख कर जीते हैं जस काफ़िर पह दम नकले
ज़रा कर ज़ोर सीने पर कि तीर पर सितम नकले
जो वह नकले तो दिल नकले जो दिल नकले तो दम नकले
खुद के वासते परदह न काबह से अठा ज़ालम
कहीं एसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम नकले
कहां मीख़ाने का दरवाज़ह ग़ालब और कहां वााज़
पर अतना जानते हीं कुल वह जाता था कि हम नकले
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ हमीदीह ओर महर में यहां लफ़्ज़ अगर हे दोसरे तमाम नसख़ों में मगर सिर्फ़ तबातबाई ने हमीदीह की अमला क़ुबूल की है ममकन है कि हमीदीह में यह लफ़्ज़ कताबत की ग़लती हो।
।
कोह के हों बार ख़ातर गर सदा हो जाये
बे तकलफ़ अे शरार जसतह कया होजाये
बीजह आसा ननग बाल व पर है यह कनज क़फ़स
अज़ सर नौ ज़नदगी हो गर रहा हो जाये
।
मसती बह ज़ोक़ ग़फ़लत साक़ी हलाक है
मोज शराब यक मख़ ख़वाबनाक है
जुज़ ज़ख़म तीग़ नाज़ नहीं दिल में आरज़ो
जीब ख़याल भी तरे हाथों से चाक है
जोश जनों से कुछ नज़र आता नहीं असद
सहरा हमारी आनख में यक मशत ख़ाक हे
।
लब अीसी की जनबश करती है गहवारह जनबानी
क़यामत कशत लाल बतां का ख़वाब सनगीं है
।
आमद सीलाब तोफ़ान सदाे आब है
नक़श पा जो कान में रखता है अनगली जादह से
बज़म मे वहशत कदह है किस की चशम मसत का
शीशे में नबज परी पनहां है मोज बादह से
।
हों में भी तमाशाई नीरनग तमना
मतलब नहीं कुछ इस से कि मतलब ही बर आवे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* आे। नसख़ महर
।
सयाही जीसे गर जओे दम तहरीर कागज पर
मर य क़िस्मत में यो जूता तसवीर है शब हाे हजरा जूता की
।
हजोम नालह हीरत अाजज़ अर ज यक अफ़ग़ां है
ख़मोशी रीश सद नीसतां से ख़स बदनदां है
तकलफ़ बर तरफ़ है जानसतां तर लतफ़ बुद ख़ोयां
नगाह बे हजाब नाज़ तीग़ तीज़ अरयां है
हवी यह कसरत घाम से तलफ़ कीफ़ीत शादी
कि सबह अीद मझ को बदतर अज़ चाक गरीबां है
दिल व दीं नक़द ला साक़ी से गर सोदा कया चाहे
कि इस बाज़ार में साग़र मताा दोस्त गरदां है
घाम आग़ोश बला में परोरश दीता है अाशक़ को
चराग़ रोशन अपना क़लज़म सरसर का मरजां है
।
ख़मोशी में तमाशा अदा नकलती है
नगाह दिल से तरी सुरमह सा नकलती है
फ़शार तनग ख़लोत से बनती है शबनम
सबा जो ग़नचे के परदे मींजा नकलती है
न पोछ सीन अाशक़ से आब तीग़ नगाह
कि ज़ख़म रोज़न डर से हवा नकलती हे
।
जस जा नसीम शानह कश ज़लफ़ यार है
नाफ़ह दमाग़ आहवे दशत ततार है
किस का सरा ग़ जलोह है हीरत को अे खुद
आीनह फ़रश शश जहत इन्तज़ार है
है ज़रह ज़रह तनग जा से ग़बार शौक़
गरदाम यह है व सात सहरा शकार है
दिल मदाई व दीदह बन मदाा अलीह
नज़ारे का मक़दमह फर रोबकार है
छड़के है शबनम आीन बरग ग़ुल पर आब
अे अनदलीब वक़त वद अा बहार है
पच आपड़ी है वाद दलदार की मझे
वह आे या न आे पह यां इन्तज़ार है
बे परदह सवे वाद मजनों गज़र न कर
हर ज़रे के नक़ाब में दिल बे क़रार है
अे अनदलीब यक कफ़ ख़स बहर आशयां
तोफ़ान आमद आमद फ़सल बहार है
दिल मत गनवा ख़बर न सही सीर ही सही
अे बे दमाग़ आीनह तमसाल दार है
ग़फ़लत कफ़ील उमर व असद जामन नशात
अे मर ग नागहां तझे कया इन्तज़ार हे
।
आ यनह कयों न दों कि तमाशा कहीं जसे
एसा कहां से लां कि तझ सा कहीं जसे
हसरत ने ला रखा तरी बज़म ख़याल में
गलदसत नगाह सवीदा कहीं जसे
फोनका है किस ने गोश महबत में अे खुद
अफ़सोन अनतज़ार तमना कहीं जसे
सर पर हजोम दरद ग़रीबी से डालये
वह एक मशत ख़ाक कि सहरा कहीं जसे
है चशम तर में हसरत दीदार से नहां
शोक़ अनां गसीख़तह दरया कहीं जसे
दरकार है शगफ़तन गलहाे अीश को
सबह बहार पनब मीना कहीं जसे
ग़ालब बुरा न मान जो वााज़ बुरा कहे
एसा भी को य है कि सब अच्चा कहीं जसे
।
शबनम बह गल लालह न ख़ाली ज़ अदा है
दाग़ दल बे दरद नज़र गाह हया है
दिल ख़ों शद कशमकश हसरत दीदार
आीनह बह दसत बत बदमसत हना है
शाले से न होती होस शालह ने जो की
जी किस क़दर अफ़सरदग दिल पह जला है
तमसाल में तीरी है वह शोख़ी कि बसद ज़ोक़
आीनह बह अनद अज़ ग़ुल आग़ोश कशा है
क़मरी कफ़ ख़ा कसतर व बलबल क़फ़स रनग
अे नालह नशान जगर सौ ख़तह कया हे
ख़ो ने तरी अफ़सरदह कया वहशत दिल को
माशोक़ी व बे होसलगी तरफ़ह बला है
मजबोरी व दावा गरफ़तार अलफ़त
दसत तह सनग आमदह पीमान वफ़ा है
मालूम हवा हाल शहीदान गुजिस्ता
तीग़ सितम आीन तसवीर नमा है
अे परतो ख़ोरशीद जहां ताब अधर भी
साे की तरह हम पह अजब वक़्त पड़ा है
नाकरदह गनाहों की भी हसरत की मले दाद
या रब अगर अन करदह गनाहों की सज़ा है
बीगानग ख़लक़ से बीदल न हो ग़ालब
कोई नहीं तीरा तो मरी जान खुद हे
।
मनज़ोरथी यह शक्ल तजली को नोर की
क़िस्मत खली तरे क़द व रख़ से ज़होर की
अक ख़ोनचकां कफ़न में करोड़ों बना हैं
पड़ती है आनख तीरे शहीदों पह होर की
वााज़ न तुम पयो न किसी को पलासको
कया बात है तमहारी शराब तहोर की
लड़ता है मझ से हशर में क़ातल कि कयों अठा
गोया अभी सनी नहीं आवाज़ सोर की
आमद बहार की है जो बलबल है नग़मह सनज
अड़ती सी खाक ख़बर है ज़बानी तयोर की
गो वां नहीं पह वां के नकाले हवे तो हैं
काबे से अन बतों को भी निस्बत है द वर की
कया फ़रज है कि सब को मले एक सा जवाब
आ न हम भी सीर करीं कोह तोर की
गरमी सही कलाम मीं लीकन न इस क़दर
की जस से बात उस ने शकएत जरोर की
ग़ालब गर अस सफ़र में मझे साथ ले चलीं
हज का सवाब नज़र करों गा हजोर की
।
घाम खाने में बोदा दल नाकाम बहत है
यह रनज कि कम है म गलफ़ाम बहत है
कहते हवे साक़ी से हया आती है वरनह
है यों कि मझे ुदरद तह जाम बहत है
नौे तीर कमां में हे न सयाद कमीं में
गोशे में क़फ़स के मझे आराम बहत है
कया ज़हद को मानों कि न हो गरचह रयाई
पादाश अमल की तमौा खाम बहत है
हैं अहल ख़रद किस रोश खास पह नाज़ां
पाबसतग रसम व रह आम बहत है
ज़मज़म ही पह छोड़ो मझे कया तोफ़ हर म से
आलोदह बह मे जाम अहराम बहत है
है क़हर गर अब भी न बने बात कि उन को
अनकार नहीं और मझे अबराम बहत है
ख़ों हो के जिगर आनख से टपका नहीं अे मरग
रहने दे मझे यां कि अभी काम बहत है
होगा कोई एसा भी कि ग़ालब को न जाने
शाार तो वह अच्चा है पह बदनाम बहत हे
।
मदत हवी है यार को महमां के हवे
जोश क़दह से बज़म चराग़ां के हवे
करता हों जमा फर जगर लख़त लख़त को
अरसह हवा है दाोत मख़गां के हवे
फर वजा अहतयात से रकने लगा है दम
बरसों हवे हैं चाक गरीबां के हवे
फर गरम नालह हाे शरर बार है नफ़ौस
मदत हवी है सीर चराग़ां के हवे
फर परसश जराहत दिल को चला है अशक़
सामान सद हज़ार नमक दां के हवे
फर भर रहा हों ख़ाम मख़गां बह ख़ोन दिल
साज़ चमन तराज़ दामां के हवे
बाहम दगर हवे हैं दिल व दीदह फर रक़ीब
नज़ारह व ख़याल का सामां के हवे
दिल फर तवाफ़ कवे मलामत को जाे है
पनदार का सनम कदह वीरां के हवे
फर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अरज मताा अक़्ल व दिल व जां के हवे
दोड़े है फर हर एक ग़ुल व लालह पर ख़याल
सद गलसतां नगाह का सामां के हवे
फर चाहता हों नाम दलदार खोलना
जां नज़र दलफ़रीब अनवां के हवे
मानगे है फर किसी को लब बाम पर होस
ज़लफ़ स्याह रख़ पह परीशां के हवे
चाहे है फर किसी को मक़ाबल में आरज़ो
सरमे से तीज़ दशन मख़गां के हवे
खाक नोबहार नाज़ को ताके है फर नगाह
चहरह फ़रोग़ मे से गलसतां के हवे
फर जी में है कि डर पह किसी के पड़ी रहीं
सर ज़ीर बार मनत दरबां के हवे
जी ढोनडता है फर वही फ़रसत कह रात दिन
बीठे रहीं तसोर जानां के हवे
ग़ालब हमें न छीड़ कि फर जोश अशक से
बीठे हैं हम तही तोफ़ां के हवे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नसख़ महर में " हे
** नसख़ महर में " कह
।
नवीद अमन है बीदाद दोस्त जां के ले
रही न तरज़ सितम कोई आसमां के ले
बला सेगर मख़ यार तशन ख़ों है
रखों कुछ अपनी ही मख़गान ख़ों फ़शां के ले
वह ज़नदह हम हैं कि हैं रोशनास ख़लक़ अे ख़जर
न तुम कि चोर बने अमर जओदां के ले
रहा बला में भी में मबतलाे आफ़त रशक
बलाे जां है अदा तीरी खाक जहां के ले
फ़लक न दूर रख उस से मझे कि में ही नहीं
दराज़ दसत क़ातिल के अमतहां के ले
मिसाल यह मरी कोशिश की है कि मरग़ असीर
करे क़फ़स में फ़राहम ख़स आशयां के ले
गदा समझ के वह चप था मरी जो शामत आे
अठा और आथ के क़दम में ने पासबां के ले
।क़।
बह क़दर शौक़ नहीं ज़रफ़ तनगनाे गज़ल
कुछ और चाहये वसात मरे बयां के ले
दिया है ख़लक़ को भी ता असे नज़र न लगे
बन है अीश तजमुल हसीन ख़ां के ले
ज़बां पह बार ख़दएा यह किस का नाम आया
कि मीरे नतक़ ने बोसे मर य ज़बां के ले
नसीर दोलत व दीं और माईन मलत व मुल्क
बन है चरख़ बरीं जस के आसतां के ले
ज़मानह अहद में उस के है महो आराश
बनीं गे और सतारे अब आसमां के ले
वरक़ तमाम हवा और मदह बाक़ी है
सफ़ीनह चाहये इस बहर बीकरां के ले
अदाे खास से ग़ालब हवा है नकतह सरा
सलाे आम है यारान नकतह दां के ले
।
आप ने मौसौनी अलजुरु कहा है तो सही
यह भी अे हजरत एोब गला है तो सही
रनज ताक़त से सवा हो तो न पीटों कयों सर
ज़हन में ख़ोब तसलीम व ड़ज़ है तो सही
है ग़नीमत कि बह उमीद गज़र जा गी अुमर
न मले दाद मगर रोज़ जज़ा है तो सही
दोस्त ही कोई नहीं हे जो करे चारह गरी
न सही लीक तमना दवा है तो सही
ग़ीर से दीखये कया खूब नबाही उस ने
न सही हम से पर उस बुत में वफ़ा है तो सही
नक़्ल करता हों असे नाम अामाल में मौीं
कुछ न कुछ रोज़ अज़ल तुम ने लखा है तो सही
कभी आ जा गी कयों करते हो जलदी ग़ालब
शहर तीज़ शमशीर क़जा है तो सही
।
लतफ़ नज़ार क़ातल दम बसमल आ
जान जा तो बला से पह कहीं दल आ
उन को कया अलम कि कशती पह मरी कया गज़री
दोस्त जो साथ मरे ता लब साहल आ
वह नहीं हम कि चले जाईं हरम को अे शीख़
साथ हुजाज के अकसर की मनज़ल आ
आीं जस बज़म में वह लूग पकार अठते हीं
लो वह बरहम ज़न हनगाम महफ़िल आ
दीदह ख़ों बार है मदत से वले आज नदीम
दिल के टुकड़े भी की खून के शामिल आ
सामना होर व परी ने न कया हे न करीं
अकस तीरा ही मगर तीरे मक़ाबल आ
अब है दली की तरफ़ कोच हमारा ग़ालब
आज हम हजरत नवाब से भी मल आ
।
में हों मशताक़ जफ़ा मझ पह जफ़ा और सही
तुम हो बीदाद से ख़ोश इस से सवा और सही
ग़ीर की मरग का घाम किस ल अे ग़ीरत माह
हैं होस पीशह बहत वह न हुवा और सही
तुम हो बत फर तमीं पनदार ख़ुदाई कयों हे
तुम ख़दओनद ही कहला खुद और सही
हुसन में हुोर से बड़ कर नहीं होने की कभी
आप का शयोह व अनदाज़ व अदा और सही
तीरे कोचे का है माल दल मजतर मीरा
काबह खाक और सही क़बलह नमा और सही
कोई दनया में मगर बाघ नहीं हे वााज़
ख़लद भी बाघ हे ख़ीर आब व हवा और सही
कयों न फ़रदोस में दोज़ख़ को मला लीं या रब
सीर के वासते थोड़ी सी फ़जा और सही
मझ को वह दो। कि जसे ख के न पानी मानगों
ज़हर कुछ और सही आब बक़ा और सही
मझ से ग़ालब यह अलाई ने गज़ल लखवाई
एक बीदाद गर रनज फ़ज़ा और सही
।
अजज़ व नयाज़ से तो वह आया न राह पर
दामन को इस के आज हरीफ़ानह खीनची
।
खाक गरम आह की तो हज़ारों के घर जले
रखते हैं अशक़ में यह असर हम जिगर जले
परवानह ख़ानह घाम हो तो फर किस ल असद
हर रात शमा शाम से ले ता सहर जले
।
ज़नदान तहमल हैं महमान तग़ाफ़ल हीं
बे फ़ादह यारों को फ़रक़ घाम व शादी हे
।
मसताद क़तल यक अालम है जलाद फ़लक
कहकशां मोज शफ़क़ में तीग़ ख़ों आशाम हे
।
न हीरत चशम साक़ी की न सहबत दोर साग़र की
मरी महफ़िल में ग़ालब गरदश अफ़लाक बाक़ी हे
।
सबा लगा वह तमानचह तरफ़ से बलबल के
कि रो ग़नचह सो आशयां फर जा
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
नोट 269- 274 ग़ज़लयात व अशाार नसख़ महर में नहीं। जोजो
क़साद
।
मनक़बत हीदरी
साज़ यक ज़रह नहीं फ़ीज चमन से बीकार
सए लाल बेदाग़ सवीदा बहार
मसत बाद सबा से है बह अरज सबज़ह
रीज़ शीश मे जोहर तीग़ कहसार
सबज़ है जाम ज़मरद की तरह दाग़ पलनग
ताज़ह है रीश नारनज सफ़त रो शरार
मसत अबर से गलचीन तरब है हसरत
कि इस आग़ोश में ममकन है दो अालम का फ़शार
कोह व सहरा हमह मामोर शोक़ बलबल
राह ख़वाबीदह हवी ख़नद ग़ुल से बीदार
सोनपे है फ़ीज हवा सोरत मख़गान यतीम
सर नोशत दो जहां अबर बह यक सतर ग़बार
काट कर फीनक नाख़न जो बानदाज़ हलाल
क़ोत नामीह इस को भी न छोड़े बीकार
कफ़ हर ख़ाक बह गरदोन शदह क़मरी परवाज़
दाम हर काग़ज़ आतश ज़दह तास शकार
मेकदे में हो अगर आरज़ो ग़ुल चीनी
भूल जा यक क़दह बादह बह ताक़ गलज़ार
मोज ग़ुल ढोनढ बह ख़लोत कद ग़नच बाग़
गुम करे गोश मेख़ानह में गर तो दसतार
खीनचे गर मान अनदीशह चमन की तसवीर
सबज़ह मसल ख़त नौ ख़ीज़ हो ख़त परकार
लाल से की है प ज़मज़म मदहत शाह
तोत सबज़कहसार ने पीदा मनक़ार
वह शहनशाह कि जस की प तामीर सरा
चशम जबरील हवी क़ालब ख़शत दयवार
फ़लक अलारश हजोम ख़म दोश मज़दोर
रशत फ़ीज अज़ल साज़ तनाब मामार
सबज़ नुह चमन व यक ख़त पशत लब बाम
रफ़ात हमत सद अारफ़ व यक ओज हसार
वां की ख़ाशाक से हाशिल हो जसे यक परकाह
वह रहे मर वह बाल परी सेबीज़ार
ख़ाक सहरा नजफ़ जोहर सीर अुरफ़ा
चशम नक़श क़दम आीन बख़त बीदार
ज़रह इस गरद काख़ोरशीद को आीनह नाज़
गरद उस दशत की उमीद को अहराम बहार
आफ़रीनश को है वां से तलब मसत नाज़
अरज ख़मयाज़ एजाद है हरमोज ग़बार
मतला सानी
फ़ीज से तीरे है अे शमा शबसतान बहार
दल परवानह चराग़ां पर बलबल गलनार
शकल तास करे आीनह ख़ानह परवाज़
ज़ोक़ में जलवे के तीरे बह हवा दीदार
तीरी ओलाद के घाम से है बरो गरदों
सलक अख़तर में मह नौ मख़ गोहर बार
हम अबादत को तरा नक़श क़दम मुहर नमाज़
हम रयाजत को तरे होसले से असतज़हार
मदह में तीरी नहां ज़मज़म नात नबी
जाम से तीरे अयां बाद जोश असरार
जोहर दसत दाा आीनह यानी तासीर
यक तरफ़ नाज़श मख़गान व दगर सौ ग़म ख़ार
मौरदुमक से हो अज़ा ख़ान अक़बाल नगाह
ख़ाक डर की तरे जो चशम न होआीनह दार
दशमन आल नबी को बह तरब ख़ान दहर
अरज ख़मयाज़ सीलाब होताक़ दयवार
दीदह ता दिल असदआीन यक परतो शोक़
फ़ीज मानी से ख़त साग़र राक़म सरशार
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में ग़मख़वार
।
मनक़बत हजरत अली के ल
दहर जुज़ जलो यकता माशोक़ नहीं
हम कहां होते अगर हसन न होता ख़ोद बीं
बे दली हा तमाशा कि न अबरत है न ज़ोक़
बे किसी हा तमना कि न दनया है न दीं
हौरज़ह है नग़म ज़ीरोबम हसती व अदम
लग़ो है आीन फ़रक़ जनोन व तमकीं
नक़श मानी हमह ख़मयाज़ अरज सोरत
सख़न हक़ हमह पीमान ज़ोक़ तहसीं
लाफ़ दानश ग़लत व नफ़ा अबारत मालोम
दुरद यक साग़र ग़फ़लत है चह दनया व चह दीं
मसल मजमोन वफ़ा बाद बदसत तसलीम
सोरत नक़श क़दम ख़ाक बह फ़रक़ तमकीं
अशक़ बे रबत शीराज़ अजज़ा हवास
वसल ज़नगार रख़ आीन हसन यक़ीं
कोहकन गरसनह मज़दोरतरब गाह रक़ीब
बे सतों आीन ख़वाब गरान शीरीं
किस ने दीखा नफ़स अहल वफ़ा आतश ख़ीज़
किस ने पएा असर नाल दिल हा हज़ीं
सामा ज़मज़म अहल जहां हों लीकन
न सरो बरग सताश न दमाग़ नफ़रीं
किस क़दर हौरज़ह सरा हों कि अयाज़ा बाललह
यक क़लम ख़ारज आदाब वक़ार व तमकीं
नक़श लाहोल लिख अे ख़ाम हज़यां तहरीर
या अली अरज कर अे फ़तरत वसवास क़रीं
मज़हर फ़ीज ख़दा जान व दल ख़तम रसल
क़बल आल नबी स काब एजाद यक़ीं
हो वह सरमए एजाद जहां गरम ख़राम
हर कफ़ ख़ाक है वां गौरद तसवीर ज़मीं
जलोह परदाज़ हो नक़श क़दम इस का जस जा
वह कफ़ ख़ाक है नामोस दो अालम की अमीं
नसबत नाम से इस की है यह रुतबह कि रहे
अौबौदा पुशत फ़लक ख़ौम शद नाज़ ज़मीं
फ़ीज ख़ुलक़ इस का ही शामिल है कि होता है सदा
बो ग़ुल से नफ़स बाद सबा अतरआगीं
बुरश तीग़ का इस की है जहां में चरचा
क़ता हो जा न सर रशत एजाद कहीं
कुफ़र सोज़ इस का वह जलोह है कि जस से टोटे
रनग अाशक़ की तरह रोनक़ बत ख़ान चीं
जां पनाहा दिल व जां फ़ीज रसाना शाहा
वस ख़तम रसुल तो है बह फ़तवा यक़ीं
जसम अतहर को तरे दोश पीमबर मनबर
नाम नामी को तरे नासी अरश नगीं
किस से ममकन है तरी मदह बग़ीर अज़ वाजब
शाल शमा मगर शमा पह बानधे आीं
आसतां पर है तरे जोहर आीन सनग
रौक़ौम बनदग हजरत जबरील अमीं
तीरे डर के ल असबाब निसर आमादह
ख़ाकयों को जो खुद ने दी जान व दिल व दीं
तीरी मदहत के ल हैं दिल व जां काम व ज़बां
तीरी तसलीम को हैं लौोह व क़लम दोस्त व जबीं
किस से हो सकती है मदाह ममदोह ख़दा
किस से हो सकती है आराश फ़रदोस बरीं
।क़।
जनस बाज़ार माासी असदाललह असद
कि सवा तीरे कोई इस काख़रीदार नहीं
शोख़ अरज मतालब में है गसताख़ तलब
है तरे होसल फ़जल पह अज़ बस कि यक़ीं
दे दाा को मरी वह मरतब हसन क़बोल
कि अजाबत कहे हर हरफ़ पह सौ बार आमीं
ग़म शबीर से हो सीनह यहां तक लबरीज़
कि रहीं ख़ोन जिगर से मरी आनखीं रनगीं
तबा को अलफ़त दुलदुल में यह सरगरम शोक़
कि जहां तक चले इस से क़दम और मझ से जबीं
दल अलफ़त नसब व सीन तोहीद फ़जा
नगह जलोह परसत व नफ़स सदक़ गज़ीं
सौरफ़ अादा असर शाल दोद दोज़ख़
वक़फ़ अहबाब गुल व सनबल फ़रदोस बरीं
।
मदह शाह
हां मह नौ सनीं हम इस का नाम
जस को तो झक के कररहा है सलाम
दो दिन आया है तो नज़र दम सबह
यही अनदाज़ और यही अनदाम
बारे दो दिन कहां रहा ग़ाब
बनदह अाजज़ हे गरदश एाम
अड़ के जाता कहां कि तारों का
आसमां ने बछा रखा था दाम
मरहबा अे सरोर ख़ास ख़वास
हबज़ा अे नशात अाम अवाम
अज़र में तीन दिन न आने के
ले के आया है अीद का पीग़ाम
इस को भोला न चाहये कहना
सुबह जो जा और आ शाम
एक में कया सब ने जान लया
तीरा आग़ाज़ और तरा अनजाम
राज़ दिल मझ से कयों छपाता हे
मझ को समझा है कयाकहीं नमाम
जानता हों कि आज दनया मीं
एक ही है अमीदगाह अनाम
में ने माना कि तो है हलक़ह बगोश
ग़ालब इस का मगर नहीं है ग़लाम
जानता हों कि जानता है तुो
तब कहा है बह तरज़ असतफ़हाम
महर ताबां को हो तो हो अे माह
क़रब हर रोज़ह बर सबील दवाम
क़
तझ को कया पएह रोशनासी का
जज़ बह तक़रीब अीद माह सयाम
जानता हों कि इस के फ़ीज से तो
फर बन चाहता है माह तमाम
माह बन माहताब बन में कोन
मझ को कया बानट देगा तो अनााम
मेरा अपना जुदा माामलह हे
और के लीन दीन से कया काम
है मझे आरज़ो बख़शश ख़ास
गर तझे है अमीद रहमत अाम
जो कि बख़शेगा तझ को फ़र फ़रोग़
कया न देगा मझे म गलफ़ाम
जबकह चोदह मनाज़ल फ़लकी
करचकी क़ता तीरी तीज़ गाम
तीरे परतो से हों फ़रोग़ पज़ीर
को व मशको व सहन व मन्ज़र व बाम
दीखना मीरे हाथ में लबरीज़
अपनी सूरत का खाक बलोरीं जाम
फर गज़ल की रोश पह चाल नकला
तोसन तबा चाहता था लगाम
ग़ज़ल
ज़हर घाम करचका था मेरा काम
तझ को किस ने कहा कि हो बदनाम
मे ही फर कयों न में पी जां
घाम से जब हो गी है ज़ीसत हराम
बोसह कीसा यही ग़नीमत हे
कि न समझीं वह लज़त दशनाम
काबे में जाबजाईं गे नाक़ोस
अब तो बानधा है दौीर में अहराम
इस क़दह का है दौोर मझ को नक़द
चरख़ ने ली है जस से गरदश एाम
छीड़ता हों कि उन को ग़सह आ
कयों रखों वरनह ग़ालब अपना नाम
कि चका में तो सब कछ अब तुो कह
अे परी चहरह पीक तीज़ ख़राम
कौन है जस के डर पह नासीह सा
हैं मह व महर व ज़हरह व बहराम
तुो नहीं जानता तो मझ से सन
नाम शाहनशह बलनद मक़ाम
क़बल चशम व दिल बहादर शाह
मज़हर ज़वालजलाल वालाकराम
शहसवार तरीक़ अनसाफ़
नोबहार हदीक़ असलाम
जस का हर फ़ाल सोरत अाजाज़
जस का हर क़ोल मान अलहाम
बज़म में मीज़बान क़ीसर व जम
रज़म में ओसताद रसतम व साम
अे तरा लतफ़ ज़नदगी अफ़ज़ा
अे तरा अहद फ़रख़ी फ़रजाम
चशम बुद दोर ख़सरवानह शकुोह
लोहश अललह अारफ़ानह कलाम
जां नसारों में तीरे क़ीसर रोम
जुराह ख़वारों में तीरे मरशद जाम
वारस मुल्क जानते हैं तझे
एरज व तोर व ख़सरो व बहराम
ज़ोर बाज़ो में मानते हैं तझे
गयो व गोदरज़ व बीज़न व रौहाम
मरहबा मो शगाफ़ नओक
आफ़रीं आब दार समसाम
तीर को तीरे तीर ग़ीर हदफ़
तीग़ को तीरी तीग़ ख़सम नयाम
क़
राद का कर रही है कया दम बनद
बरक़ को दे रहा है कया अलज़ाम
तीरे फ़ील गरां जसद की सदा
तीरे रख़श सबक अनां का ख़राम
क़
फ़न सूरत गरी में तीरा गुरज़
गर न रखता हो दसतगाह तमाम
इस के मजरोब के सर व तन से
कयों नमएां हो सोरत अदग़ाम
जब अज़ल में रक़म पज़ीर हो
सफ़हह हा लयाली व एाम
और उन ओराक़ में बह कलक क़जा
मजमला मनदरज हो अहकाम
लिख दिया शाहदों को अाशक़ कुश
लिख दिया अाशक़ों को दुश्मन काम
आसमां को कहा गया कि कहीं
गनबद तीज़ गरद नीली फ़ाम
हकम नातक़ लखा गया कि लखीं
ख़ाल को दानह और ज़लफ़ को दाम
आतश व आब व बाद व ख़ाक ने ली
वजा सोज़ व नम व रम व आराम
महर रख़शां का नाम ख़सरो रोज़
माह ताबां का असम शहन शाम
तीरी तोक़या सलतनत को भी
दी बदसतोर सोरत अरक़ाम
कातब हकम ने बमोजब हकम
इस रक़म को दिया तराज़ दवाम
है अज़ल से रवान आग़ाज़
हो अबद तक रसाई अनजाम
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* चनद नसख़ों में रवाई है अकसर जगह रवानी कर दिया गया है जो ग़लत हे।
।
मदह शाह
सुबह दम दरवाज़ ख़ओर खला
महर अालमताब का मन्ज़र खला
ख़सरो अनजम के आया सिर्फ़ मीं
शब को था गनजीन गोहर खला
वह भी थी खाक सीमया की सी नमोद
सुबह को राज़ मह व अख़तर खला
हैं कवाकब कुछ नज़र आते हैं कछ
दीते हैं धोखा यह बाज़ी गर खला
सतह गरदों पर पड़ा था रात को
मोतयों का हर तरफ़ ज़योर खला
सुबह आया जानब मशरक़ नज़र
खाक नगार आतशीं रुख़ सर खला
थी नज़र बनदी कया जब रद सहर
बाद ग़ुल रनग का साग़र खला
ला के साक़ी ने सबोही के ल
रख दिया है एक जाम ज़र खला
बज़म सलतानी हवी आरासतह
काब अमन व अमां का डर खला
ताज ज़रीं महर ताबां से सवा
ख़सरो आफ़ाक़ के मनह पर खला
शाह रोशन दल बहादर शह कि हे
राज़ हसती इस पह सर ता सर खला
वह कि जस की सोरत तकवीन मीं
मक़सद नुह चरख़ व हफ़त अख़तर खला
वह कि जस के नाख़न तओील से
अक़द अहकाम पीग़मबर खला
पहले दारा का नकल आया है नाम
उन के सौरहनगों का जब दफ़तर खला
रोुशनासों की जहां फ़हरसत हे
वां लखा है चहर क़ीसर खला
।क़।
तोुसन शह में है वह ख़ोबी कि जब
थान से वह ग़ीरत सरसर खला
नक़श पा की सोरतीं वह दिल फ़रीब
तोु कहे बत ख़ान आज़र खला
मझ पह फ़ीज तरबीत से शाह के
मनसब महर व मह व महोर खला
लाख अुक़दे दिल में थे ، लीकन हर एक
मीरी हद वुसा से बाहर खला
था दल वाबसतह क़ुफ़ल बे कलीद
किस ने खोला कब खला कयों कर खला
बाग़ मानी की दखां गा बहार
मझ से गर शाह सख़न गसतर खला
हो जहां गरम गज़ल ख़वानी नौफ़ौस
लूग जानीं तबल अनबर खला।
ग़ज़ल
कुनज में बीठा रहों यों पौर खला
काशके होता क़फ़स का डर खला
हम पकारीं और खले यों कौन जा
यार का दरवाज़ह पओीं गर खला
हम को है इस राज़ दारी पर घमनड
दोस्त का है राज़ दुश्मन पर खला
वाक़ाई दिल पर भला लगता था दाग़
ज़ख़म लीकन दाग से बहतर खला
हाथ से रख दी कब अबरो ने कमां
कब कमर से ग़मज़े की ख़नजर खला
मुफ़त का किस को बुरा है बदरक़ौह
रहरवी में परद रहबर खला
सोज़ दिल का कया करे बारान अशक
आग भड़की मीनह अगर दम भर खला
नामे के साथ आ गया पीग़ाम मरग
रह गया खत मीरी छाती पर खला
दीखयो ग़ालब से गर अलझा कवी
है वली पोशीदह और काफ़िर खला
फर हवा मदहत तराज़ी का ख़याल
फर मह व ख़ोरशीद का दफ़तर खला
ख़ामे ने पाई तबयात से मदद
बादबां भी अठते ही लनगर खला
मदह से ममदोह की दीखी शकुोह
यां अौरौज से रुतब जोहर खला
महर कानपा चरख़ चकर ख गया
बादशह का रात लशकर खला
बादशह का नाम लीता है ख़तीब
अब अुलो पए मनबर खला
सक शह का हवा है रो शनास
अब अयार आबरो ज़र खला
शाह के आगे धरा है आनह
अब मआल साई असकौनदर खला
मुल्क के वारिस को दीखा ख़ौलक़ ने
अब फ़रीब तग़रल व सनजर खला
हो सके कया मदह हां खाक नाम हे
दफ़तर मदह जहां दओर खला
फ़िक्र अछी पर सताश ना तमाम
अजज़ अाजाज़ सताश गर खला
जानता हों है ख़त लोह अज़ल
तुम पह अे ख़ाक़ान नाम आोर खला
तुम करो साहबक़रानी जब तलक
है तलसम रोज व शब का डर खला
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में " पाईं
।
एलीन बरान
मलाज़ कशोर व लशकर पनाह शहर व सपाह
जनाब अाली एलन बरोन वाला जाह
बलनद रतबह वह हाकम वह सरफ़राज़ अमीर
कि बाज ताज से लीता है जस का तरफ़ कलाह
वह महज रहमत व राफ़त कि बहर अहल जहां
नयाबत दम अीसी करे है जस की नगाह
वह अीन अदल कि दहशत से जस की परसश की
बने हैं शाल आतश अनीस पौर काह
ज़मीं से सोद गोहर अठे बजा ग़बार
जहां हो तोसन हशमत का इस के जोलां गाह
वह महरबां हो तो अनजम कहीं " अलही शकर
वह ख़शमगीं हो तो गरदों कहे " खुद की पनाह
यह इस के अदल से अजदाद को है आमीज़श
कि दशत व कोह के अतराफ़ में बह हर सर राह
हज़बर पनजे से लीता है काम शाने का
कभी जो होती है अलझी हवी दुम रो बाह
न आफ़ताब वले आफ़ताब का हम चशम
न बादशाह वले मरतबे हैं हमसर शाह
खुद ने इस को दिया एक ख़ोबरो फ़रज़नद
सतारह जीसे चमकता हवा बह पहलो माह
ज़हे सतार रोशन कि जो असे दीखे
शााा महर दरख़शां हो इस का तार नगाह
खुद से है यह तोक़ा कि अहद तफ़ली मीं
बने गा शरक़ से ता ग़रब इस का बाज़ी गाह
जवान होके करे गा यह वह जहान बानी
कि ताबा इस के हों रोज व शब सपीद व सयाह
कहे गी ख़लक़ असे दओर सपहर शकुोह
लखीं गे लूग असे ख़सरो सतारह सपाह
अता करे गा ख़दओनद कारसाज़ असे
रवान रोशन व ख़ो ख़ोश व दल आगाह
मले गी इस को वह अक़ल नहफ़तह दां कि असे
पड़ी न क़ता ख़सोमत में अहतयाज गवाह
यह तरकताज़ से बरहम करे गा कशोर रोस
यह ले गा बादशह चीं से छीन तख़त व कलाह
सनीन अीसवी अठारह सौ और अठओन
यह चाहते हैं जहां आफ़रीं से शाम व पगाह
यह जतने सीकड़े हैं सब हज़ार हो जओीं
दराज़ इस की हो उमर इस क़दर सख़न कोताह
अमीद वार अनएात शयो नरान
कि आप का है नमक ख़वार और दोलत ख़वाह
यह चाहता है कि दनया में अज़ व जाह के साथ
तमहीं और इस को सलामत रखे सदा अललह।
।
वाल अलोर की सालगरह पर
गी हैं साल के रशते में बीस बार गरह
अभी हसाब में बाक़ी हैं सौ हज़ार गरह
गरह की है यही गनती कि ता बह रोज़ शमार
हवा करे गी हर खाक साल पीश कार गरह
यक़ीन जान बरस गानठ का जो है तागा
यह कहकशां है कि हैं इस में बे शमार गरह
गरह से और गरह की अमीद कयों न पड़े
कि हर गरह की गरह में हैं तीन चार गरह
दखाके रशतह किसी जोतशी से पोछा था
कि दीखो कतनी अठाला गा यह तार गरह
कहा कि चरख़ पह हम ने गनी हैं नौ गरीं
जो यां गनीं गे तो पओीं गे नौ हज़ार गरह
ख़ोद आसमां है महा राजा रा पर सदक़े
करेगा सीकड़ों इस तार पर निसर गरह
वह रा राजा बहादर कि हकम से जिन के
रवां हो तार पह फ़ी अलफ़ोर दानह वार गरह
उन्हें की सालगरह के ले है साल बह साल
कि ला ग़ीब से ग़नचों की नौ बहार गरह
उन्हें की सालगरह के ले बनाता हे
हवा में बोनद को अबर तगरग बार गरह
उन्हें की सालगरह की यह शादमानी हे
कि हो गे हैं गहरहा शाहवार गरह
उन्हें की सालगरह के ले है यह तोक़ीर
कि बन गे हैं समरहा शाख़सार गरह
सन अे नदीम बरस गानठ के यह तागे ने
तझे बतां कि कयों की है यह अख़तयार गरह
पे दाा बक़ा जनाब फ़ीज मआब
लगेगी इस में सवाबत की असतवार गरह
हज़ार दानह की तसबीह चाहता है यही
बलामबालग़ह दरकार है हज़ार गरह
अता कया है खुद ने यह जाज़बह इस को
कि छोड़ता ही नहीं रशतह ज़ीनहार गरह
कशादह रख़ न फरे कयों जब इस ज़माने मीं
बच्चे न अज़ पे बनद नक़ाब यार गरह
मताा अीश का है क़ाफ़लह चला आता
कि जादह रशतह है और है शतर क़तार गरह
खुद ने दी है वह ग़ालब को दसतगाह सख़न
करोड़ ढोनड के लाता है ख़ाकसार गरह
कहां मजाल सख़न सानस ले नहीं सकता
पड़ी है दिल में मरे घाम की पीच दार गरह
गरह का नाम लिया पर न करसका कुछ बात
ज़बां तक आ के हवी ऊर असतवार गरह
खले यह गानठ तो अलबतह दम नकल जओे
बरी तरह से हवी है गले का हार गरह
अधर न होगी तोजह हजोर की जब तक
कभी कसे से खलेगी न ज़ीनहार गरह
दाा है यह कि मख़ालफ़ के दिल में अज़ रह बग़ज
पड़ी है यह जो बहत सख्त नाबकार गरह
दिल इस का फोड़ के नकले बह शक्ल फोड़े की
खुद करे कि करे इस तरह उभार गरह
।
मीकलोड साहब की ख़दमत मीं
करता है चरख़ रोज बसद गोनह अहतराम
फ़रमां रवा कशोर पनजाब को सलाम
हक़ गो व हक़ परसत व हक़ अनदीश व हक़ शनास
नवाब मसतताब अमीर शह अहतशाम
जम रतबह मीकलोड बहादर कि वक़त रज़म
तुरक फ़लक के हाथ से वह छीन लीं हुसाम
जस बज़म में कि हो उन्हें आीन मीकशी
वां आसमान शीशह बने आफ़ताब जाम
चाहा था में ने तुम को मह चार दह कहों
दिल ने कहा कि यह भी है तीरा ख़याल ख़ाम
दो रात में तमाम है हनगामह माह का
हजरत का अज़ व जाह रहे गा अली अलदवाम
सच है तुम आफ़ताब हो जस के फ़रोग़ से
दरया नोर है फ़लक आबगीनह फ़ाम
मीरी सनो कि आज तुम इस सरज़मीं पर
हक़ के तफ़जलात से हो मरजा अनाम
अख़बार लधयानह मीं मीरी नज़र पड़ी
तहरीर एक जस से हवा बनदह तल्ख काम
टुकड़े हवा है दीख के तहरीर को जिगर
कातब की आसतीं है मगर तीग़ बे नयाम
वह फ़र्द जस में नाम है मेरा ग़लत लखा
जब याद आगी हे कलीजा लिया है थाम
सब सोरतीं बदल गीं नागाह यक क़लम
लमबर रहा न नज़र न ख़लात का अनतज़ाम
सतर बरस की उमर में यह दाग़ जां गदाज़
जस ने जला के राख मझे करदिया तमाम
थी जनोरी महीनेकी तारीख़ तीरवीं
असतादह हो गे लब दरया पह जब ख़याम
इस बज़म पुर फ़रोग़ में इस तीरह बख़त को
लमबर मला नशीब में अज़ रो अहतमाम
समझा असे गराब हवा पाश पाश दल
दरबार में जो मझ पह चली चशमक अवाम
इज़्ज़त पह अहल नाम की हसती की है बना
इज़्ज़त जहां गी तो न हसती रहे न नाम
था एक गोनह नाज़ जो अपने कमाल पर
इस नाज़ का फ़लक ने लिया मझ से अनतक़ाम
आया था वक़्त रील के खलने का भी क़रीब
था बारगाह खास में ख़लक़त का अख़दहाम
इस कशमकश में आप का मदाह दरदमनद
आक़ा नामोर से न कुछ करसका कलाम
जो वां न कि सका था वह लखा हजोर को
दीं आप मीरी दाद कि हों फ़ाज़ अलमराम
मुल्क व सपह न हो तो न हो कुछ जरर नहीं
सलतान बर व बहर के डर का हों में ग़लाम
वकटोरीह का दहर में जो मदाह ख़वान हो
शाहान मसर चाहये लीं इज़्ज़त इस से वाम
ख़ोद है तदारक इस का गोरनमनट को जरोर
बे वजह कयों ज़लील हो ग़ालब है जस का नाम
अमर जदीद का तो नहीं है मझे सवाल
बारे क़दीम क़ाादे का चाहये क़याम
है बनदह को अााद इज़्ज़त की आरज़ो
चाहीं अगर हजोर तो मुश्किल नहीं यह काम
दसतोर फ़न शार यही है क़दीम से
यानी दाा पह मदह का करते हैं अख़तताम
है यह दाा कि ज़ीर नगीं आप के रहे
अक़लीम हनद व सनद से ता मलक रोम व शाम
।
नवाब योसफ़ अली ख़ां
मरहबा साल फ़रख़ी आीं
अीद शवाल व माह फ़रोरदीं
शब व रोज अफ़तख़ार लील व नहार
मह व साल अशरफ़ शहोर व सनीं
गरचह है बाद अीद के नोरोज़
लीक बीश अज़ सह हफ़तह बाद नहीं
सुो इस अकीस दिन में होली की
जाबजा मजलसीं हवीं रनगीं
शहर में को बको अबीर व गलाल
बाघ में सौ बह सौ ग़ुल व नसरीं
शहर गोया नमोन गलज़ार
बाघ गोया नगारख़ान चीं
तीन तहवार और एसे ख़ोब
जमा हरगज़ हो न हों गे कहीं
फर हवी है असी महीने मीं
मनाक़द महफ़ल नशात क़रीं
महफ़ल ग़सल सहत नवाब
रोनक़ अफ़ज़ा मसनद तमकीं
बज़म गह मीं अमीर शाह नशां
रज़म गह में हरीफ़ शीर कमीं
जिन के मसनद का आसमां गोशह
जिन की ख़ातम का आफ़ताब नगीं
जिन के दयवार क़सर के नीचे
आसमां है गदा सएह नशीं
दहर में इस तरह की बज़म सरोर
न हवी हो कभी बह रो ज़मीं
अनजमीं चरख़ गोहर आगीं फ़रश
नोर मे माह साग़र सीमीं
राजा अनदौर का जो अखाड़ा हे
है वह बाला सतह चरख़ बरीं
वह नज़रगाह अहल वहम व ख़याल
यह जया बख़श चशम अहल यक़ीं
वां कहां यह अता व बज़ल व करम
कि जहां गरीह गर का नाम नहीं
हां ज़मीं पर नज़र जहां तक जा
ख़ालह आसा बछे हैं दर समीं
नग़म मतरबान ज़हरह नवा
जलो लोलयान माह जबीं
इस अखाड़े में जो कि है मज़नोन
यां वह दीखा बह चशम सूरत बीं
सरोर महर फ़र हवा जो सवार
बह कमाल तजमल व तज़ीं
सब ने जाना कि है परी तोसन
और बाल परी है दामन ज़ीं
नक़श सम समनद से यकसर
बन गया दशत दामन गलचीं
फौज की गरद राह मशक फ़शां
रहरों के मशाम अतर आगीं
बस कि बख़शी है फौज को अज़त
फौज का हर पयादह है फ़रज़ीं
मोकब खास यों ज़मीं पर था
जस तरह है सपहर पर परवीं
छोड़दीता था गोर को बहराम
रान पर दाग ताज़ह दे के वहीं
और दाग आप की ग़लामी का
खास बहराम का है ज़ीब सरीं
बनदह परोर सना तराज़ी से
मदाा अरज फ़न शार नहीं
आप की मदह और मेरा मनह
गर कहों भी तो आ किस को यक़ीं
और फर अब कि जाफ़ पीरी से
हो गया हों नज़ार व ज़ार व हज़ीं
पीरी व नीसती खुद की पनाह
दसत ख़ाली व ख़ातर ग़मगीं
सिर्फ़ इज़हार है अरादत का
है क़लम की जो सजदह रीज़ जबीं
मदह गसतर नहीं दाागो है
ग़ालब अाजज़ नयाज़ आगीं
है दाा भी यही कि दनया मीं
तुम रहो ज़नदह जओदां आमीं
।
मदह नसरत अलमलक बहादर
नुसरत अलमलक बहादुर मझे बतला कि मझे
तझ से जो अतनी अरादत है तो किस बात से हे
गरचह तुो वह है कि हनगामह अगर गरम करे
रोनक़ बज़म मह व महर तरी ज़ात से है
और में वह हों कि ، गर जी में कभी ग़ोर करों
ग़ीर कया ، ख़ोद मझे नफरत मीरी ओक़ात से है
ख़सतगी का हो भला ، जस के सबब से सर दोस्त
निस्बत अक गोनह मरे दिल को तरे हात से है
हाथ में तीरे रहे तोसन दौोलत की अनां
यह दुाा शाम व सहर क़ाज हाजात से है
तुो सकनदर हे मरा फ़ख्र है मलना तीरा
गो शरफ़ ख़जर की भी मझ को मलाक़ात से है
अस पह गुज़रे न गमां रयो व रया का ज़नहार
ग़ालब ख़ाक नशीं अहल ख़राबात से हे
।
डर मदह शाह
अे शाह जहां गीर जहां बख़श जहां दार
है ग़ीब से हर दम तझे सद गुोनह बशारत
जो अुक़द दुशवार कि कोशिश से न वा हवा
तो वौा करे उस अुक़दे को ، सौ भी बह अशारत
ममकन है ، करे ख़जर सकनदर से तरा ज़ कर
गर लब को न दे चशम हयवां से तहारत
आसफ़ को सुलीमां की वज़ारत से शरफ़ था
है फ़ख़र सुलीमां ، जो करे तीरी वज़ारत
है नक़श मुरीदी तरा ، फ़रमान अलही
है दाग़ ग़ुलामी तरा ، तोक़या अमारत
तुो आब से गर सलब करे ताक़त सीलां
तो आग से गर दफ़ा करे ताब शरारत
डुोनडे न मले मोज दरया में रवानी
बाक़ी न रहे आतश सोज़ां में हरारत
है गर चह मझे नुकतह सराई में तोग़ुल
है गर चह मझे सहर तराज़ी में महारत
कयों कर न करों मदह को में खतम दुाा पर
क़ासर है सताश में तरी ، मीरी अबारत
नौो रोज है आज और वह दिन है कि हवे हैं
नज़ारग सनात हक़ अहल बसारत
तझ को शरफ़ महर जहानताब मुबारक !
ग़ालब को तरे अतब अाली की ज़यारत !
।
गज़ारश मसनफ़ बहजोर शाह
ऐ शौहनशाह आसमां औरनग
ऐ जहानदार आफ़ताब आसार
था में अक बे नौोौा गोशह नशीं
था में अक दरदमनद सीनह फ़गार
तुम ने मझ को जो आबरुो बख़शी
हवी मीरी वह गरम बाज़ार
कि हवा मझ सा ज़र नाचीज़
रुोशनास सवाबत व सयार
गर चह अज़ रुो ननग व बे हुनरी
हों ख़ोद अपनी नज़र में अतना ख़वार
कि गर अपने को में कहों ख़ाकी
जानता हों कि आ ख़ाक को अार
शाद हों लीकन अपने जी मीं कि हों
बादशह का ग़लाम कार गज़ार
ख़ानह ज़ाद और मुरीद और मदाह
था हमीशह से यह अरीजह नगार
बारे नोकर भी हो गया सद शुकर
नसबतीं हो गीं मुशख़स चार
न कहुों आप से तो किस से कहों
मुदााे जरोरी अलाज़हार
पीर व मुरशद ! अगरचह मझ को नहीं
ज़ोक़ आराश सर व दसतार
कुछ तो जाड़े में चाहये आख़र
ता न दे बाद ज़ौमहरीर आज़ार
कयों न दरकार हो मझे पोशश
जसम रखता हों ، है अगरचह नौज़ार
कुछ ख़रीदा नहीं है अब के साल
कुछ बनएा नहीं है अब की बार
रात को आग और दिन को दुोप
भाड़ में जाईं एसे लौील व नहार !
आग तापे कहां तलक अनसान
दुोप खओे कहां तलक जानदार
दुोप की ताबश ، आग की गरमी !
वौक़नौा रौबौनौा अौज़ौाबौ अलनौार !
मीरी तनख़वाह जो मक़रर है
उस के मलने का है अजब हनजार
रसम है मुरदे की चाय माही एक
ख़लक़ का है असी चलन पह मदार
मझ को दीखो तो ، हूँ बह क़ीद हयात
और चाय माही हो साल में दोबार !
बस कि लीता हों हर महीने क़र्ज़
और रहती है सुोद की तकरार
मीरी तनख़वाह में तहाई का
होगया है शरीक साहुो कार
आज मझ सा नहीं ज़माने में
शाार नग़ज़गो ख़ोश गुफ़तार
रज़म की दासतान गर सुनये
है ज़बां मीरी तीग़ जोहर दार
बज़म का अलतज़ाम गर कीजे
है क़लम मीरी अबर गोहर बार
ज़ुलम है गर न दो सुख़न की दाद
क़हर है गर करो न मझ को पयार
आप का बनदह ، और परों ननगा ؟
आप का नोकर ، और खां उधार ؟
मीरी तनख़वाह कीजे माह बह माह
ता ، न हो मझ को ज़नदगी दुशवार
खतम करता हूँ अब दुाा पह कलाम
शाारी से नहीं मझे सरोकार
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में खा
मसनवी
।
डर सफ़त अनबह
हां दल दर्द मनद ज़मज़मह साज़
कयों न खोले दर ख़ज़ीन राज़
ख़ामे का सफ़हे पर रवां होना
शाख़ ग़ुल का है गलफ़शां होना
मझ से कया पोछता है कया लखये
नकतह हाे ख़रद फ़ज़ा लखये
बारे आमों का कुछ बयां होजाे
ख़ामह नख़ल रतब फ़शां होजाे
आम का कौन मरद मीदान है
समर व शाख़ गवे व चोगां है
ताक के जी में कयों रहे अरमां
आे यह गवे और यह मीदां
आम के आगे पीश जओे ख़ाक
फोड़ता है जले फफोले ताक
न चला जब किसी तरह मक़दोर
बाद नाब बन गया अनगोर
यह भी नाचार जी का खोना है
शरम से पानी पानी होना है
मझ से पोछो तमहीं ख़बर कया हे
आम के आगे नीशकर कया हे
न ग़ुल इस में न शाख़ व बरग न बार **
जब ख़ज़ां आे तब हो इस की बहार
और दोड़ाये क़यास कहां
जान शीरीं में यह मठास कहां
जान में होती गर यह शीरीनी
कोहकन बओजोद ग़मगीनी
जान दीने में इस को यकता जान
पौर वह यों सहल दे न सकता जान
नज़र आता है यों मझे यह समर
कि दवा ख़ान अज़ल मीं मगर
आतश ग़ुल पह क़नद का है क़वाम
शीरे के तार का है रीशह नाम
या यह होगा कि फ़रत राफ़त से
बाग़बानों ने बाग़ जनत से
अनगबीं के बह हकम रब अलनास
भर के भीजे हैं सरबमहर गलास
या लगा कर ख़जर ने शाख़ नबात
मदतों तक दिया है आब हयात
तब हवा है समर फ़शां यह नख़ल
हम कहां वरनह और कहां यह नख़ल
था तरनज ज़र एक ख़सरो पास
रनग का ज़रद पर कहां बो बास
आम को दीखता अगर खाक बार
फीनक दीता तलाे दोस्त अफ़शार
रोनक़ कारगाह बरग व नवा
नाज़श दोदमान आब व हवा
रहरो राह ख़लद का तोशह
तोबी व सदरह का जिगर गोशह
साहब शाख़ व बरग व बार है आम
नाज़ परोरद बहार है आम
खास वह आम जो न अरज़ां हो
नौ बर नख़ल बाग़ सलतां हो
वह कि है वाल वलएत अहद
अदल से इस के है हमएत अहद
फ़ख़र दीं अज़ शान व जाह जलाल
ज़ीनत तीनत व जमाल कमाल
कार फ़रमाे दीन व दोलत व बख़त
चहरह आराे ताज व मसनद व तख़त
सएह उस का हमा का सएह है
ख़लक़ पर वह खुद का सएह है
अे मफ़ीज वजोद सएह व नोर
जब तलक है नमोद सएह व नोर
अस ख़दओनद बनदह परोर को
वारस गनज व तख़त व अफ़सर को
शाद व दलशाद व शादमां रखयो
और ग़ालब पह महरबां रखयो
।।।।।।।।।
नसख़ महर मींजा
** नसख़ आसी में नह शाख़ व बरग व बार
*** जब ख़ज़ां हो तब आ इस की बहार नसख़ महर )
**** नसख़ महर में " शाख़ बरग व बार
।
एक दिन मसल पतनग काग़ज़ी
ले के दिल सर रशत आज़ादगी
ख़ोद बख़ोद कुछ हम से कौनयाने लगा
इस क़दर बगड़ा कि सर खाने लगा
में कहा अे दल हवा दलबरां
बस कि तीरे हक़ में रखती है ज़यां
बीच में उन के न आना ज़ीनहार
यह नहीं हैं गे कसे के यार ग़ार
गोरे पनडे पर न कर उन के नज़र
खीनच लीते हैं यह डोरे डाल कर
अब तो मल जा गी उन से तीरी गानठ
लीकन आख़र को पड़ी गी एसी सानठ *
सख्त मुश्किल होगा सलझाना तझे
क़हर हे दिल उन में अलझाना तझे
यह जो महफ़िल में बड़ाते हैं तझे
भूल मत इस पर उड़ाते हैं तझे
एक दिन तझ को लड़ा दीं गे कहीं
मफ़त में नाहक़ कटा दीं गे कहीं
दिल ने सुन कर। कानप कर ख पीच व ताब
ग़ोते में जा कर दिया कट कर जवाब
रशत डर गरदनम अफ़गनदह दोसत
मी बुरद हर जा कि ख़ातर ख़वाह ओसत
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
** नसख़ महर में यह शार इस तरह दरज हे
अब तो मल जा गी उन से तीरी सानठ
लीकन आख़र को पड़ी गी एसी गानठ
ख़मसह
तजमीन बर गज़ल बहादर शाह ज़फ़र
घसते घसते पां की ज़नजीर आधी रह गी
मर ग पर क़बर की तामीर आधी रह गी
सब ही पड़ता काश कयों तकबीर आधी रह गी
खनच के क़ातल जब तरी शमशीर आधी रह गी
घाम से जान अाशक़ दिल गीर आधी रह गी
बीठ रहता ले के चशम पुर नम इस के रोबरोु
कयों कहा तो ने कि कहह दिल का घाम इस के रोबरो
बात करने में नकलता है दम इस के रोबरो
कहह सके सारी हक़ीक़त कब हम इस के रोबरो
हम नशीं आधी हवी तक़रीर आधी रह गी
तो ने दीखा मझ पह कीसी बन गी अे राज़दार
ख़वाब व बीदारी पह कब है आदमी को अख़तयार
मसल ज़ख़म आँखों को सी दीता जो होता होशयार
खीनचता था रात को में ख़वाब में तसवीर यार
जाग अठा जो खीनचनी तसवीर आधी रह गी
घाम ने जब घीरा तो चाहा हम ने यों अे दिल नवाज़
मसत चशम सीह से चाल के होवीं चारह साज़
तोु सदा पा से जागा था जो महो ख़वाब नाज़
दीखते ही अे सितम गर तीरी चशम नीम बाज़
की थी पोरी हम ने जो तदबीर आधी रह गी
इस बत मग़रोर को कया हो किसी पर अलतफ़ात
जस के हसन रोज अफ़ज़ों की यह खाक अदनी है बात
माह नौ नकले पह गज़री हों गी रातीं पान सात
अस रुख़ रोशन के आगे माह यक हफ़तह की रात
ताबश ख़ोरशीद पुर तनवीर आधी रह गी
ता मझे पहनचा काहश बख़त बुद है घात मीं
हां फ़रओानी अगर कुछ हे तो है आफ़ात मीं
जुज़ ग़म दाग व अलम घाटा है हर खाक बात मीं
कम नसीबी इस को कहते हैं कि मीरे हात मीं
आते ही ख़ासीत अकसीर आधी रह गी
सब से यह गोशह कनारे हे गले लग जा मरे
आदमी को कया पकारे हे गले लग जा मरे
सर से गर चादर अतारे हे गले लग जा मरे
मानग कया बीठा सनवारे हे गले लग जा मरे
वसल की शब अे बत बे पीर आधी रह गी
में यह कया जानों कि वह किस वासते हों फर ग
फर नसीब अपना अनीं जाते सना जों फर गे
दीखना क़िस्मत वह आ और फर यों फर ग
आ के आधी दोर मीरे घर से वह कयों फर ग
कया कशश में दिल की उन तासीर आधी रह गी
नागहां याद आगी है मझ को या रब कब की बात
कुछ नहीं कहता किसी से सुन रहा हों सब की बात
किस ल तझ से छपां हां वह परसों शब की बात
नामह बर जलदी में तीरी वह जो थी मतलब की बात
खत में आधी हो सकी तहरीर आधी रह गी
हो तजली बरक़ की सूरत मीं है यह भी ग़जब
पाँच छह घनटे तो होती फ़रसत अीश व तरब
शाम से आते तो कया अछी गज़रती रात सब
पास मीरे वह जो आ भी तो बाद अज़ नसफ़ शब
नकली आधी हसरत अे तक़दीर आधी रह गी
तुम जो फ़रमाते हो दीख अे ग़ालब आशफ़तह सर
हम न तझ को मना करते थे गया कयों उस के घर
जान की पां अमां बातीं यह सब सच हैं मगर
दल ने की सारी ख़राबी ले गया मझ को ज़फ़र
वां के जाने में मरी तोक़ीर आधी रह गी
मरसीह
हां अे नफ़स बाद सहर शालह फ़शां हो
अे दजल ख़ों चशम मलाक से रवां हो
अे ज़मज़म क़ुम लब अीसी पह फ़ग़ां हो
अे मातमयान शह मज़लोम कहां हो
बगड़ी है बहत बात बना नहीं बनती
अब घर को बग़ीर आग लगा नहीं बनती
ताब सख़न व ताक़त ग़ोग़ा नहीं हम को
मातम में शह दीं के हीं सोदा नहीं हम को
घर फोनकने में अपने मुहाबा नहीं हम को
गर चरख़ भी जाल जा तो परवा नहीं हम को
यह ख़रग नुह पएा जो मदत से बौपा हे
कया ख़ीम शबीर से रतबे में सवा हे
कुछ और ही अालम नज़र आता है जहां का
कुछ और ही नक़शह है दिल व चशम व ज़बां का
कीसा फ़लक और महर जहां ताब कहां का
होगा दल बेताब किसी सोख़तह जां का
अब सााक़ह व महर में कुछ फ़रक़ नहीं हे
गरता नहीं इस रोु से कहो बरक़ नहीं हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में " बह जा
** नसख़ महर में यह मसराह इस तरह दरज हे
अब महर में और बरक़ में कुछ फ़रक़ नहीं हे
सलाम
सलाम असे कि अगर बादशह कहीं उस को
तो फर कहीं कुछ अस से सवा कहीं उस को
न बादशाह न सलतां यह कया सताश हे
कहो कि ख़ामस आल अबा कहीं उस को
खुद की राह में है शाही व ख़सरवी कीसी
कहो कि रहबर राह खुद कहीं उस को
खुद का बनदह ख़दओनदगार बनदों का
अगर कहीं न ख़दओनद कया कहीं उस को
फ़रोग़ जोहर एमां हसीन अबन अली
कि शमा अनजमन कबरया कहीं उस को
कफ़ील बख़शश उमत हे बन नहीं पड़ती
अगर न शाफ़ा रोज़ जज़ा कहीं उस को
मसीह जस से करे अख़ज़ फ़ीज जां बख़शी
सितम है कुशत तीग़ जफ़ा कहीं उस को
वह जस के मातमयों पर है सलसबील सबील
शहीद तशनह लब करबला कहीं उस को
अदो की समा ड़ज़ में जगह न पा वह बात
कि जन व अनस व मलौक सब बजा कहीं उस को
बहत है पए गरद रह हसीन बलनद
बक़दर फ़हम है गर कीमया कहीं उस को
नज़ारह सोज़ है यां तक हर एक ज़र ख़ाक
कि लूग जोहर तीग़ क़जा कहीं उस को
हमारे दर्द की या रब कहीं दवा न मले
अगर न दर्द की अपने दवा कहीं उस को
हमारा मनह है कि दौीं इस के हसन सबर की दाद
मगर नबी व अली मरहबा कहीं उस को
ज़माम नाक़ह कफ़ उस के में है कि अहल यक़ीं
पस अज़ हसीन अली पीशवा कहीं उस को
वह रीग लक़म वादी में ख़ामह फ़रसा हे
कि तालबान खुद रहनमा कहीं उस को
अमाम वक़्त की यह क़दर है कि अहल अनाद
पयादह ले चलीं और नासज़ा कहीं उस को
यह अजतहाद अजब है कि एक दशमन दीं
अली से आगे लड़े और ख़ता कहीं उस को
यज़ीद को तो न था अजतहाद का पएह
बुरा न मानी गर हम बुरा कहीं उस को
अली के बाद हसन और हसन के बाद हसीन
करे जो उन से बुराई भला कहीं उस को
नबी का हो न जसे अातक़ाद काफ़िर हे
रखे अमाम से जो बग़ज कया कहीं उस को
भरा है ग़ालब दल ख़सतह के कलाम में दरद
ग़लत नहीं है कि ख़ोनीं नवा कहीं उस को
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में " कि एक जोहर
** नसख़ महर में तफ़तह
सहरे
।
ख़ोश हो ऐ बख़त कि है आज तरे सर सहरा
बानध शहज़ादह जवां बख़त के सर पर सहरा
कया ही अस चाँद से मुखड़े पह भला लगता हे
है तरे हुसन दिल अफ़रोज़ का ज़योर सहरा
सर पह चड़ना तझे फबता है पर अे तरफ़ कुलाह
मझ को डर है कि न छीने तरा लमबर सहरा
ना भर कर ही परवे गे हों गे मोती
वरनह कयों ला हैं कशती में लगा कर सहरा
सात दरया के फ़राहम के हों गे मोती
तब बन होगा अस अनदाज़ का गज़ भर सहरा
रुख़ पह दुोला के जो गरमी से पसीना टपका
है रग अबर गुहर बार सौरासौर सहरा
यह भी अक बे अदबी थी कि क़बा से बड़ जा
रह गया आन के दामन के बराबर सहरा
जी में अतराईं न मोती कि हमें हैं अक चीज़
चाहये पुोलों का भी एक मक़रर सहरा
जब कि अपने में समओीं न खुशी के मारे
गोनधे पुोलों का भला फर कोई कयोनकर सहरा
रुख़ रोशन की दौमक ، गोहर ग़लतां की चमक
कयों न दखला फ़रुोग़ मह व अख़तर सहरा
तार रीशम का नहीं ، है यह रौग अबर बहार
ला गा ताब गरानबार गोहर सहरा !
हम सुख़न फ़हम हैं ، ग़ालब के तरफ़दार नहीं
दीखीं ، इस सहरे से कहह दे कोई बड़ कर सहरा ***
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में " शहज़ादे
** इस की एक अमला ग़लतां भी हे
*** नसख़ महर में यह मसराह इस तरह दरज हे
दीखीं ، कहह दे कोई इस सहरे से बड़ कर सहरा
।
।क़।
हम नशीं तारे हीं और चाँद शहाब अलदीं ख़ां
बज़म शादी है फ़लक काहकशां है सहरा
उन को लड़यां न कहो बहर की मोजीं समझो
है तो कशती मीं वले बहर रवां है सहरा
।
चरख़ तक धोम हे किस धोम से आया सहरा
चाँद का दारह ले ज़हरह ने गएा सहरा
रशक से लड़ती हैं आपस में उलझ कर लड़यां
बानधने के ल जब सर पह उठएा सहरा
।
बयान मसनफ़ गज़ारश ग़ालब
मनज़ुोर है गुज़ारश अहवाल वाक़ाई
अपना बयान हुसन तबयात नहीं मझे
सौो पुशत से है पीश आबा सपह गरी
कुछ शाारी ज़रया इज़्ज़त नहीं मझे
आज़ादह रौो हों और मरा मसलक है सलह कुल
हर गज़ कभी किसी से अदओत नहीं मझे
कया कम है यह शरफ़ कि ज़फ़र का ग़लाम हों
माना कि जाह व मनसब व सर्वत नहीं मझे
उसताद शह से हो मझे पौरख़ाश का ख़याल
यह ताब ، यह मजाल ، यह ताक़त नहीं मझे
जाम जहां नुमा है शहनशाह का जमीर
सौोगनद और गवाह की हाजत नहीं मझे
में कौन ، और रीख़तह ، हां अस से मदाा
जुज़ अनबसात ख़ातर हजरत नहीं मझे
सहरा लखा गया ज़ रह अमतसाल अौमर
दीखा कि चारह ग़ीर अताात नहीं मझे
मक़ता में आ पड़ी हे सुख़न गुसतरानह बात
मक़सोद इस से क़ता महबत नहीं मझे
रुवे सुख़न किसी की तरफ़ हो तो रुोसयाह
सोदा नहीं ، जुनों नहीं ، वहशत नहीं मझे
क़िस्मत बुरी सही पौह तबयात बुरी नहीं
है शुकर की जगह कि शकएत नहीं मझे
सादक़ हों अपने क़ोल में ग़ालब ، खुद गवाह
कहता हों सच कि जुोट की अादत नहीं मझे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में " थी
क़ताात
।
गज़ारश ग़ालब
अे शहनशाह फ़लक मनज़र बे मसल व नज़ीर
अे जहानदार करम शयो बे शबह व अदील
पां से तीरे मौले फ़रक़ अरादत अ ौोरनग
फ़रक़ से तीरे करे कसब साादत अ कलील
तीरा अनदाज़ सुख़ौन शान ज़ु लफ़ अलहाम
तीरी रफ़तार क़लम जुनबश बाल जबरील
तझ से अालम पह कुला राबत क़ुरब कलीम
तुझ से दनया में बछा माद बौज़ल ख़लील
बह सुख़ौन अ ौोज दह मरतब मानी व लफ़्ज़
बह करम दाग़ नह नासी क़ुलज़ुम व नील
ता ، तरे वक़्त में हो अौीश व तरब की तोफ़ीर
ता ، तरे अहद में हो रनज व अौलौम की तक़लील
माह ने छोड़ दिया सौोर से जाना बाहर
ज़ुहरह ने तरक कया हुोत से करना तहवील
तीरी दानश ، मरी असलाह मौफ़ासद की रौहीन
तीरी बख़शश ، मरे अनजाह मक़ासद की कफ़ील
तीरा अक़बाल तौरौहुम मरे जीने की नौवीद
तीरा अनदाज़ तौग़ाफ़ुल मरे मरने की दलील
बख़त नासाज़ ने चाहा कि न दे मुझ को अमां
चरख़ कज बाज़ ने चाहा कि करे मुझ को ज़लील
पीछे डाली है सर रशत ओक़ात में गानठ
पहले ठोनकी है बुन नाख़ुन तदबीर में कील
तौपश दिल नहीं बे राबत ख़ौोफ़ अज़ीम
कशश दम नहीं बे जाबत जौर सक़ील
दुर मानी से मरा सफ़हह ، लक़ा की डाड़ी
ग़ौम गीती से मरा सीनह अ ौमौर की ज़नबील
फ़िक्र मीरी गुहर अनदोज़ अशारात कसीर
कलक मीरी रक़ौम आमोज़ अबारात क़लील
मीरे अबहाम पह होती है तसदुक़ तोजीह
मीरे अजमाल से करती है तरओश तफ़सील
नीक होती मरी हालत तो न दीता तकलीफ़
जमा होती मरी ख़ातर तो न करता ताजील
क़बल कौन व मकां ، ख़सतह नवाज़ी में यह दीर
काब अमन व अमां ، अुक़दह कुशाई में यह ढील
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। ।।।।।
ग़ालब ने असे जान बोझ कर अलफ़ से लखा है हालां कि ज़नबील से मराद अौमर अयार जसे अौमरो अयार भी कहते हींकी ज़नबील ही है मबादा यह दानसतह इस ल अलफ़ से लखा है कि किसी का धयान हजरत उमर रजी अललह तााली अनह की तरफ़ न जा।
।
ग वह दिन कि ना दानसतह ग़ीरों की वफ़ा दारी
कया करते थे तुम तक़रीर हम ख़ामोश रहते थे
बस अब बगड़े पह कया शरमनदगी ، जाने दो ، मल जा
क़ौसम लो हम से गर यह भी कहीं कयों हम न कहते थे
।
हा हा
कलकतह का जो ज़कर कया तुो ने हम नशीं !
अ क तीर मीरे सीने में मारा कि हा हा
वह सबज़ह ज़ार हा मुतरा कि ، है ग़जब !
वुह नाज़नीं बुतान ख़ोद आरा कि हा हा
सबर आज़मा वह उन की नगाहीं कि हफ़ नज़र !
ताक़त रुबा वह उन का अशारा कि हा हा !
वह मयोह हा ताज़ शीरीं कि ، वाह वाह
वह बादह हा नाब गवारा कि हा हा !
डर मदह डली *
है जो साहब के कफ़ दोस्त पह यह चकनी डली
ज़ीब दीता है असे जस क़दर अछा कहये
ख़ामह अनगशत बह दनदां कि असे कया लखये
नातक़ह सर बह गरीबां कि असे कया कहये
मुहर मकतोब अज़ीज़ान गरामी लखये
हरज़ बाज़ो शगरफ़ान ख़ोद आरा कहये
मसी आलोद सर अनगशत हसीनां लखये
दाग़ तरफ़ जगर अाशक़ शीदा कहये
ख़ातम दसत सलीमां के मशाबह लखये
सर पसतान परीज़ाद से माना कहये
अख़तर सोख़त क़ीस से निस्बत दीजे
ख़ाल मशकीन रुख़ दिल कश लीली कहये
हजर अलासोद ِ दयवार हरम कीजे फ़रज
नाफ़ह आहो बयाबान ख़ुतन का कहये
वजा में इस को अगर समझये क़ाफ़ तरयाक़
रनग में सबज़ नोख़ीज़ मसीहा कहये
सौोमाे में असे ठहराये गर मुहर नमाज़
मे कदे में असे ख़शत ख़ुम सहबा कहये
कयों असे क़ुफ़ल दर गनज महबत लखये
कयों असे नक़त पौरकार तमना कहये
कयों असे गोहर नएाब तसोर कीजे
कयों असे मरदुमक दीद अौनक़ा कहये
कयों असे तकम पीराहन लीली लखये
कयों असे नक़श प नाक़ सलमी कहये
बनदह परोर के कफ़ दोस्त को दिल कीजे फ़रज
और अस चकनी सुपारी को सुवीदा कहये
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में अनवान " चकनी डली
नसख़ महर में यह मसराह यों दरज हे
वजा में इस को समझ लीजे क़ाफ़ तरयाक़
।
बीसनी रोटी
न पुोछ अस की हक़ीक़त ، हुजुोर वाला ने
मझे जो भीजी है बीसन की रौोग़ौनी रोटी
न खाते गीहों ، नकलते न ख़ुलद से बाहर
जो खाते हजरत आदम यह बीसौनी रोटी
।
चहार शनबह आख़रौ माह सफ़र
है चार शनबह आख़र माह सौफ़ौर चलो
रख दीं चमन में भर के म मुशक बुो की नानद
जो आे ، जाम भर के पये ، और हो के मसत
सबज़े को रौोनदता फरे ، पुोलों को जाे फानद
ग़ालब यह कया बयां है ، बजुज़ मदह पादशाह
भाती नहीं है अब मझे कोई नोशत ख़वानद
बौटते हैं सोने रुोपे के छले हुजुोर में
है जिन के आगे सीम व ज़र व महर व माह मानद
यों समझये कि बीच से ख़ाली कये हवे
लाखों ही आफ़ताब हैं और बे शमार चानद
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में बादशाह
।
रोज़ह
अफ़तार सोम की जसे कुछ दसतगाह हो
उस शख़स को जरोर है रोज़ह रखा करे
जस पास रोज़ह खोल के खाने को कुछ न हो
रोज़ह अगर न खाे तो नाचार कया करे
।
तार दल
अठा खाक दिन बगोला सा जो कुछ में जोश वहशत में *
फरा आसीमह सर घबरागया था जी बयाबां से
नज़र आया मझे खाक तार मजरोह पौर बसतह
टपकता था सर शोरीदह दयवार गलसतां से
कहा में ने कि ओ गमनाम आख़र माजरा कया हेौ
पड़ा है काम का तझ को किस सितम गर आफ़त जां से
हनसा कुछ खलखला कर पहले फर मझ को जो पहचाना
तो यह रोया कि जो ख़ों बही पलकों के दामां से
कहा " में सीद हों उस का कि जस के दाम गीसो में
फनसा करते हैं तार रोज आ कर बाग़ रजवां से
असी की ज़लफ़ व रुख़ का धयान है शाम व सहर मझ को
न मतलब कुफ़र से है और न है कुछ काम एमां से
बह चशम ग़ोर जो दीखा मरा ही तार दिल था
कि जाल कर हो गया यों ख़ाक मीरी आह सोज़ां से
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* चनद नसख़ों में यह शार यों दरज हे
अठा खाक दिन बगोलह सा जो था कुछ जोश वहशत मीं
** नसख़ महर में " तशनह " लफ़्ज़ आया है जो कि कताबत की ग़लती हे।
।
खत मनज़ोम बनाम अलाई
खुशी तो है आने की बरसात के
पीं बाद नाब और आम खाईं
सर आग़ाज़ मोसम में अनधे हैं हम
कि दली को छोड़ीं लोहारो को जाईं
सवा नाज के जो है मतलोब जां
न वां आम पाईं न अनगोर पाईं
हवा हकम बओरचयों को कि हां
अभी जा के पोछो कि कुल कया पकाईं
वह खटे कहां पाईं अमली के फोल
वह कड़वे करीले कहां से मनगाईं
फ़क़त गोशत सौ भीड़ का रीशह दार
कहो इस को कया ख के हम हज़ उठाईं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में मसराह यों हे खुशी यह आने की बरसात के
।
क़ताह तारीख़
ख़ुजसतह अनजमन तुो मीरज़ा जाफ़र
कि जस के दीखे से सब का हवा है जी महज़ोज़
हवी है एसे ही फ़रख़नदह साल में ग़ालब
न कयों हो माद साल अीसवी " महज़ोज़
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* महज़ोज़ से साल अीसवी नकलता हे
।
क़ताह तारीख़
हवी जब मीरज़ा जाफ़र की शादी
हवा बज़म तरब में रक़स नाहीद
कहा ग़ालब से " तारीख़ इस की कया हे "
तो बोला : " अनशराह जशन जमशीद
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
1270 हजरी
।
क़ताह तारीख़
अस कताब तरब नसाब ने जब
आब व ताब अनतबाा की पाई
फ़कर तारीख़ साल में ، मझ को
एक सूरत नी नज़र आी
हनदसे पहले सात सात के दो
दये नागाह मझ को दखलाई
और फर हनदसह था बारह का
बा हज़ारां हज़ार ज़ीबाई
साल हजरी तो होगया मालूम *
बे शमोल अबारत आराई
मगर अब ज़ोक़ बज़लह सनजी को
है जदागानह कार फ़रमाई
सात और सात होते हैं चोदह
बह उमीद साादत अफ़ज़ाई
ग़रज अस से हैं चारदह मासुोम
जस से है चशम जां को ज़ीबाई
और बारह अमाम हैं बारह
जस से एमां को है तवानाई
उन को ग़ालब यह साल अच्चा है
जो अमह के हैं तोलाई
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
*1277 हजरी
।
बला अनवान
सीह गलीम हों लाज़म है मेरा नाम न ले
जहां में जो कोई फ़तह व ज़फ़र का तालब है
हवा न ग़लबह मीसर कभी किसी पह मझे
कि जो शरीक हो मेरा ، शरीक ग़ालब हे
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में इस क़ताह का अनवान है शरीक ग़ालब
।
सहल था मुसहल वले यह सख्त मुशकल आपड़ी
मझ पह कया गुज़रे गी ، अतने रोज हाजर बन हवे
तीन दिन मसहल से पहले ، तीन दिन मसहल के बाद
तीन मुसहल ، तीन तौबरीदीं ، यह सब कौे दन हवे
।
गो एक बादशाह के सब ख़ानह ज़ाद हैं
दरबारदार लूग बहम आशना नहीं
कानों पह हाथ धरते हैं करते हवे सलाम
इस से मुराद यह है कि हम आशना नहीं
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में इस क़ताह का अनवान है दरबारी
* नसख़ महर में यह मसराह यों हे
इस से है यह मराद कि हम आशना नहीं
।
एक अहल दर्द ने सनसान जो दीखा क़फ़स
यों कहा आती नहीं अब कयों सदा अनदलीब
बाल व पर दो चार दखला कर कहा सयाद ने
यह नशानी रह गी है अब बजा अनदलीब
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
* नसख़ महर में यह मसराह इस तरह दरज हे
यों कहा आती नहीं कयों अब सदा अनदलीब
।
अे जहां आफ़रीं ख़दा करीम
जाा हफ़त चरख़ हफ़त अक़लीम
नाम मीकलोड जिन का है मशहोर
यह हमीशह बसद नशात व सरोर
अमरो दोलत से शादमान रहीं
और ग़ालब पह महरबान रहीं
।
गोड़गानवीं की है जतनी राईत वह यक क़लम
अाशक़ है अपने हाकम अादल के नाम की
सौ यह नज़र फ़रोज़ क़लमदान नज़र हे
मसटर कोवान साहब अाली मक़ाम की
रबाायात
।
शब ज़ुलफ़ व रुख़ अौरौक़ फ़शां का घाम था
कया शरह करों कि तुरफ़ह तौर अालौम था
रोया में हज़ार आनख से सुबह तलक
हर क़तर अशक दीद पुरनौम था
।
दिल सख्त नख़नद होगया है गोया
उस से गलह मनद होगया है गोया
पौर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
ग़ालब मनह बनद होगया है गोया
।
दख जी के पसन्द होगया है ग़ालब
दिल रुक रुक कर बनद होगया है ग़ालब *
वाललह कि शब को नीनद आती ही नहीं
सूना सौोगनद होगया है ग़ालब
सूना सौोगनद होगया है ग़ालब
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
कछ नसख़ों में यह मसराह यों हे
दिल रुक कर बनद होगया है ग़ालब
और इस सलसले में ख़जर नागपोरी ने बहस की है कि वही मसराह दरसत है जस में रक रुक हेराज़ हयात। ख़जर नागपोरी
।
आतशबाज़ी है जीसे शग़ल अतफ़ाल
है सोज़जगर का भी असी तोर का हाल
था मुोजद अशक़ भी क़यामत कोई
लड़कों के ले गया है कया खील नकाल !
।
बाद अज़ अतमाम बज़म अीद अतफ़ाल
एाम जवानी रहे साग़रकौश हाल
आपहनचे हैं ता सवाद अक़लीम अदम
अे अुमर गुज़शतह यक क़दम असतक़बाल
।
मुश्किल है ज़बस कलाम मेरा अे दिल
सुन सुन के असे सख़नोरान कामल
आसां कहने की करते हैं फ़रमाश
गवीम मुश्किल व गर नगवीम मशकल
।
हैं शह में सफ़ात ज़वालजलाली बाहम
आसार जलाली व जमाली बाहम
हों शाद न कयों साफ़ल व अाली बाहम
है अब के शब क़दर व दवाली बाहम
।
कहते हैं कि अब वह मौरदुम आज़ार नहीं
अुशाक़ की पुरसश से उसे अार नहीं
जो हाथ कि ज़लम से अठएा होगा
कयोनकर मानों कि उस में तलवार नहीं !
।
सामान ख़ोर व ख़वाब कहां से लां ؟
आराम के असबाब कहां से लां ؟
रोज़ह मरा अीमान है ग़ालब ! लीकन
ख़ौसख़ानह व बरफ़ाब कहां से लां ؟
।
दिल था ، कि जो जान दरद तमहीद सही
बीताब रशक व हसरत दीद सही
हम और फ़ुसुरदन अे तजली अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही
।
है ख़ौलक़ हसद क़माश लड़ने के ले
वहशत कद तलाश लड़ने के ले
यानी हर बार सुोरत काग़ज़ बाद
मलते हैं यह बदमााश लड़ने के ले
।
भीजी है जो मझ को शाह जौम जाह ने दाल
है लुतफ़ व अनएात ِ शहनशाह पह दाल
यह शाह पसन्द दाल बे बहस व जदाल
है दोलत व दीन व दानश व दाद की दाल
।
हक़ शह की बक़ा से ख़लक़ को शाद करे
ता शाह शयवा दानश व दाद करे
यह जो दी गी है रशत उमर में गानठ
है सफ़र कि अफ़ज़ाश अादाद करे
।
अस रशते में लाख तार हों ، बलकह सवा
अतने ही बरस शुमार हों ، बलकह सवा
हर सीकड़े को एक गरह फ़रज करीं
एसी गरहीं हज़ार हों ، बलकह सवा
।
हम गर चह बने सलाम करने वाली
करते हैं दरनग ، काम करने वाली
कहते हैं कहीं खुद से ، अललह अललह
वुह आप हैं सुबह व शाम करने वाली !
।
अन सीम के बीजों को कोई कया जाने
भीजे हैं जो अौरमुग़ां शह वाला ने
गन कर दयवीं गे हम दुााईं सौो बार
फ़ीरोज़े की तसबीह के ، हैं यह दाने
।
रक़ाे का जवाब कयों न भीजा तुम ने
साक़ब हरकत यह की है बे जा तुम ने
हाजी कलो को दे के बे वजह जवाब
ग़ालब का पका दिया है कलीजा तुम ने
।
अे रोशन दीदह शहाब अलदीं ख़ां
कटता है बता किस तरह से रौमौजां
होती है तरओीह से फ़रसत कब तक
सुनते हो तरओीह में कितना क़रआं
।
अे मनश ख़ीरह सर सख़न साज़ न हो
असफ़ोर है तो मक़ाबल बाज़ न हो
आवाज़ तीरी नकली और आवाज़ के साथ
लाठी वह लगी कि जस में आवाज़ न हो
।
जिन लोगों को है मझ से अदओत गहरी
कहते हैं मझे वह राफ़जी व दहरी
दहरी कयोनकर हो जो कि होवे सोफ़ी
शयाई कयोनकर हो मओराालनहरी
मतफ़रक़ात
हलाक बे ख़बरी नग़म वजोद व अदम
जहान व अहल जहां से जहां जहां फ़रयाद
आी अगर बला तो जिगर से टली नहीं
एरा ही दे के हम ने बचएा है कशत को
जमीम दयवान ग़ालब
अज़ नवा सरोश नसख़ महर
नोट अज़ मोलाना महर
यह ग़ज़लीं मोलाना अबद अलबारी आसी की किताब से मनक़ोल हैं लीकन अहल नज़र मजमवा आसी में में शाा शदह पोरे ग़ीर मतबवाह कलाम का अनतसाब सहीह नहीं समझते
1
आफ़त आहनग है कुछ नाल बलबल वरनह
फूल हनस हनस के गलसतां में फ़ना होजाता
काश नाक़दर न होता तरा अनदाज़ ख़राम
में ग़बार सर दामान फ़ना होजाता
यक शबह फ़रसत हसती है खाक आीन ग़म
रनग ग़ुल काश गलसतां की हौवा होजाता
मसतक़ल मरकज़ घाम पह ही नहीं थे वरनह
हम को अनदाज़ आीन फ़ना होजाता
दसत क़ुदररत है मरा ख़शत बह दयवार फ़ना
गर फ़ना भी न में होता तो फ़ना होजाता
हीरत अनदोज़ अरबाब हक़ीक़त मत होछ
जलोह खाक रोज तो आीनह नमा होजाता
2
बदतर अज़ वीरानह है फ़सल ख़ज़ां में सहन बाग़
ख़ान बलबल बग़ीर अज़ ख़नद ग़ुल बे चराग़
पता पता अब चमन का अनक़लाब आलोदह हे
नग़म मरग़ चमन ज़ा है सदा बोम व ज़ाग़
हां बग़ीर अज़ ख़वाब मरग आसोदगी ममकन नहीं
रख़त हसती बानध ता हाशिल हो दनया फ़राग़
शोर तोफ़ान बला है ख़नद बे अख़तयार
कया है ग़ुल की बे ज़बानी कया है यह लाले का दाग़
चशम पुर नम रह ज़मानह मनक़लब है अे असद
अब यही है बस मे शादी से पुर होना एाग़
3
ख़ज़ीनह दार महबत हो हवा चमन
बना ख़नद अशरत है बर बना चमन
बह हरज़ह सनज गलचीं न ख फ़रीब नज़र
तरे ख़याल की वसात में है फ़जा चमन
यह नग़म सनज बलबल मताा ज़हमत हे
कि गोश ग़ुल को न रास आ गी सदा चमन
सदा ख़नद ग़ुल ता क़फ़स पहनचती हे
नसीम सुबह से सनता हों माजरा चमन
ग़ुल एक कास दरयोज़ मसरत हे
कि अनदलीब नवासनज है गदा चमन
हरीफ़ नाल परोरद हे तो हो फर भी
है खाक तबसम पनहां तरा बहा चमन
बहार राह रो जाद फ़ना हे असद
गल शगफ़तह हैं गोया कि नक़श पा चमन
4
करम ही कुछ सबब लतफ़ व अलतफ़ात नहीं
उन्हें हनसाके रलाना भी को बात नहीं
कहां से लाके दखा गी अमर कम मएह
सीह नसीब को वह दिन कि जस में रात नहीं
ज़बान हमद की ख़ोगर हो तो कया हासल
कि तीरी ज़ात में शामिल तरी सफ़ात नहीं
ख़ोशी खुशी को न कहह घाम को घाम न जान असद
क़रार दाख़ल अजज़ा कानात नहीं
5
जों शमा हम खाक सोख़तह सामान वफ़ा हीं
ऊर इस के सवाकछ नहीं मालूम कि कया हीं
खाक सरहद मादोम में हसती है हमारी
साज़ दिल बशकसतह की बीकार सदा हीं
जस रख़ पह हों हम सजदह असी रख़ पह है वाजब
गो क़बलह नहीं हैं मगर खाक क़बलह नमा हीं
मत होजयो अे सील फ़ना उन से मक़ाबल
जानबाज़ अलम नक़्शा बह दामान बक़ा हीं
पा है जगह नासी बाद सबा पर
ख़ाकसतर परवान जानबाज़ फ़ना हीं
हर हाल में हैं मरज सयाद के ताबा
हम तार पर सोख़तह रशतह बह पा हीं
अे वहम तराज़ान मजाज़ी व हक़ीक़ी
अशाक़ फ़रीब हक़ व बातल से जुदा हीं
हम बे ख़ोद शौक़ में करलीते हैं सजदे
यह हम से न पोछो कि कहां नासीह सा हीं
अब मनतज़र शोक़ क़यामत नहीं ग़ालब
दनया के हर ज़रे में सौ हशर बपा हीं
6
नाले दिल खोल के दो चार करों या न करों
यह भी अे चरख़ सतमगार करों या न करों
मझ को यह वहम कि अनकार न हो जा कहीं
उन को यह फ़िक्र कि इकरार करों या न करों
लतफ़ जब हो कि करों ग़ीर को भी में बदनाम
कही कया हकम है सरकार करों या न करों
7
वजा नीरनग आफ़ाक़ ने मारा हम को
होग सब सितम व जौोर गवारा हम को
दशत वहशत में न पएा किसी सूरत से सराग़
गरद जोलान जनों तक ने पकारा हम को
अजज़ ही असल में था हामल सद रनग अरोज
ज़ोक़ पसत मसीबत ने अभारा हम को
जाफ़ मशग़ोल है बीकार बह सा बीजा
करचका जोश जनों अब तो अशारह हम को
सोर महशर की सदा में है अफ़सोन अमीद
ख़वाहश ज़ीसत हो आज दोबारा हम को
तख़त गोर सफ़ीने के ममासल है असद
बहर घाम का नज़र आता है कनारा हम को
8
हसन बे परवा गरफ़तार ख़ोद आरा न हो
गर कमीं गाह नज़र में दिल तमाशा न हो
हीच है तासीर अालम गीर नाज़ व अदा
ज़ोक़ अाशक़ गर असीर दाम गीरा न हो
ख़ोद गदाज़ शमा आग़ाज़ फ़रोग़ शमा हे
सोज़श घाम दरप ज़ोक़ शकीबा न हो
तार तार पीरहन है खाक रग जान जनों
अक़ल ग़ीरत पीशह हीरत से तमाशा न हो
बज़म कसरत अालम वहदत है बीना के ल
बे नयाज़ अशक़ असीर ज़ोर तनहा न हो
है महबत रहज़न नामोस अनसां अे असद
क़ामत अाशक़ पह कयों मलबोस रसवा न हो
9
न पोछ हाल इस अनदाज़ इस अताब के साथ
लबों पह जान भी आजा गी जवाब के साथ
मझे भी ताकह तमना से हो न मएोसी
मलो रक़ीब से लीकन ज़रा हजाब के साथ
नह हो बह हरज़ह रवादार सा बे होदह
कि दोर अीश है माना ख़याल व ख़वाब के साथ
बह हर नमत ग़म दिल बाास मसरत हे
नमो हीरत दिल है तरे शबाब के साथ
लगा इस का हे बाास क़याम मसती का
हौवा को लाग भी है कुछ मगर हबाब के साथ
हज़ार हीफ़ कह अतना नहीं को ग़ालब
कि जागने को मला दे वे आके ख़वाब के साथ
10
बताईं हम तमहारे अारज व काकुल को कया समझे
असे हम सानप समझे और उसे मन सानप का समझे
यह कया तशबीह बे होदह हे कयों मोज़ी से निस्बत दीं
हुमा अारज को और काकल को हम ज़ल हमा समझे
ग़लत ही होग तशबीह यह तो एक तार हे
असे बरग समन और उस को सनबल को जटा समझे
नबातात ज़मीं से कया उन को नसबत मााज़ाललह
असे बरक़ और उसे हम काली सओन की घटा समझे
घटा और बरक़ से कयों कर घटाकर उन को निस्बत दीं
असे ज़लमात उसे हम चशम आब बक़ा समझे
जो कहये यह फ़क़त मक़सोद था ख़जर व सकनदर से
यद बीजा असे और उस को मोसी का असा समझे
जो इस तशबीह से भी दाग उन को आता हो
असे वक़त नमाज़ सुबह और उस को अशा समझे
जो यह निस्बत पसनद ख़ातर वाला न हो तो फर
असे क़नदील काबह उस को काबे की रदा समझे
असद उन सारी तशबीहों को रद करके यह कहता हे
सवीदा अस को समझे उस को हम नोर खुद समझे
11
नसीम सुबह जब कनाां में बो पीरौहन ला
पे याक़ोब साथ अपने नवीद जान व तन ला
वक़ार मातम शब ज़नदह दार हजर रखना था
सपीदी सबह घाम की दोश पर रख कर कफ़न ला
शहीद शयो मनसोर है अनदाज़ रसवा
मसीबत पीशग मदाा दार व रसन ला
वफ़ा दामन कश पीरएह व हसती है अे ग़ालब
कि फर नज़हत गह ग़रबत से ता हद वतन ला
12
वफ़ा जफ़ा की तलब गार होती आ हे
अज़ल के दिन से यह अे यार होती आ हे
जवाब जनत बज़म नशात जानां हे
मरी नगाह जो ख़ोनबार होती आ हे
नमो जोश जनों वहशयो मबारक बाद
बहार हदी अनज़ार होती आ हे
दिल व दमाग़ वफ़ा पीशगां की ख़ीर नहीं
जिगर से आह शरर बार होती आ हे
13
योनही अफ़ज़ाश वहशत केजो सामां हों गे
दिल के सब ज़ख़म भी हम शकल गरीबां हों गे
वजह मएोस अाशक़ है तग़ाफ़ल उन का
न कभी क़त्ल करीं गे न पशीमां हों गे
दिल सलामत है तो सदमों की कमी कया हम को
बे शक उन से तो बहत जान के ख़वाहां हों गे
मनतशर हो के भी दिल जमा रखीं गे यानी
हम भी अब पीरो गीसो ۓ परीशां हों गे
गरदश बख़त ने मएोस कया है लीकन
अब भी हर गोश दिल में क अरमां हों गे
है अभी ख़ों से फ़क़त गरम हनगाम अशक
पर यह हालत है तो नाले शरर अफ़शां हों गे
बानध कर अहद वफ़ा अतना तनफ़र है हे
तझ से बे महर कम अे अमर गरीज़ां हों गे
इस क़दर भी दल सोज़ां को न जान अफ़सरदह
अभी कुछ दाग तो अे शमा फ़रोज़ां हों गे
अहद में तीरे कहां गरम हनगाम अीश
ग़ुल मीरी क़िस्मत वाख़ोनह पह ख़नदां हों गे
ख़ोगर अीश नहीं हैं तरे बरगशतह नसीब
उन को दशवार हैं वह काम जो आसां हों गे
मौत फर ज़ीसत न होजा यह डर है ग़ालब
वह मरी नाश पह अनगशत बह दनदां हों गे
14
नमाश परदह दार तरज़ बीदाद तग़ाफ़ल हे
तसली जान बलबल के ले ख़नदीदन ग़ुल हे
नमोद अालौम असबाब कया हे लफ़ज़ बे मानी
कि हसती की तरह मझ को अदम में भी तामल हे
न रख पाबनद असतग़ना को क़ीदी रसम अालम का
तरा दसत दाा भी रख़नह अनदाज़ तोकल हे
न छोड़ा क़ीद में भी वहशयों को याद गलशन ने
यह चाक पीरहन गोया जवाब ख़नद ग़ुल हे
अभी दयवानगी का राज़ कहह सकते हैं नासह से
अभी कुछ वक़्त है ग़ालब अभी फ़सल ग़ुल व मुल हे
15
ख़ोद जां दे के रोह को आज़ाद कीजे
ताके ख़याल ख़ातर जलाद कीजे
भोले हो जो घाम हैं उन्हें याद कीजे
तब जाके उन से शको बे दाद कीजे
हालानकह अब ज़बां में नहीं ताक़त फ़ग़ां
पर दिल यह चाहता है कि फ़रयाद कीजे
बस है दलों के वासते खाक जनबश नगाह
अजड़े हो घरों को फर आबाद कीजे
कुछ दरदमनद मनतज़र अनक़लाब हीं
जो शाद होचके उन्हें नाशाद कीजे
शएद कि यास बाास अफ़शा राज़ हो
लतफ़ व करम भी शामल बे दाद कीजे
बीगान रसोम जहां है मज़ाक़ अशक़
तरज़ जदीद ज़लम एजाद कीजे
16
हम से ख़ोबान जहां पहलो तही करते रहे
हम हमीशह मशक़ अज़ ख़ोद रफ़तगी करते रहे
कसरत आरा ख़याल मा सवा की वहम थी
मरग पर ग़ाफ़ल गमान ज़नदगी करते रहे
दाग़हा दिल चराग़ ख़ान तारीक थे
ता मग़ाक क़बर पीदा रोशनी करते रहे
शोर नीरनग बहार गलशन हसती न पोछ
हम खुशी अकसर रहीन नाख़ोशी करते रहे
रख़सत अे तमकीन आज़ार फ़राक़ हमरहां
होसका जब तक ग़म वामानदगी करते रहे
17
दर्द हो दिल में तो दवा कीजे
दिल ही जब दर्द हो तो कया कीजे
हम को फ़रयाद करनी आती हे
आप सनते नहीं तो कया कीजे
उन बतों को खुद से कया मतलब
तोबह तोबह खुद खुद कीजे
रनज अठाने से भी खुशी होगी
पहले दिल दर्द आशना कीजे
अरज शोख़ी नशात अालम हे
हसन को और ख़ोद नमा कीजे
दशमनी हो चकी बह क़दर वफ़ा
अब हक़ दोसती अदा कीजे
मौत आती नहीं कहीं ग़ालब
कब तक अफ़सोस ज़ीसत का कीजे
18
सकोत व ख़ामशी अज़हार हाल बे ज़बानी हे
कमीन दर्द में पोशीदह राज़ शादमानी हे
अयां हैं हाल व क़ाल शीख़ से अनदाज़ दलचसपी
मगर रनद क़ौदौह कश का अभी दोर जवानी हे
सबात चनद रोज़ह कारफ़रमा घाम व हसरत
अजल सरमएह दार दोर अीश व कामरानी हे
गदाज़ दाग़ दल शमा बसात ख़ानह वीरानी
तपश गाह महबत में फ़रोग़ जओदानी हे
वफ़ोर ख़ोद नमा रहन ज़ोक़ जलोह आरा
बह वहम कामरानी जज़ब दिल की शादमानी हे
दल हरमां लक़ब की दाद दे अे चरख़ बे परवा
बह ग़ारत दाद रख़त व मताा कामरानी हे
19
किस की बरक़ शोख़ रफ़्तार का दलदादह हे
ज़रह ज़रह इस जहां का अजतराब आमादह हे
है ग़रोर सरकशी सूरत नमा अजज़ भी
मनक़लब हो कर बसान नक़श पा अफ़तादह हे
ख़ानह वीरां साज़ अशक़ जफ़ा पीशह न पोछ
नामरादों का ख़त तक़दीर तक भी सादह हे
ख़ोद नशात व सरख़ोशी है आमद फ़सल बहार
आज हर सील रवां अालम में मोज बादह हे
ज़नदगानी रहरो राह फ़ना है अे असद
हर नफ़स हसती से ता मलक अदम खाक जादह हे
20
इस जोर व जफ़ा पर भी बदज़न नहीं हम तझ से
कया तरफ़ह तमना है अमीद करम तझ से
अमीद नवाज़श में कयों जीते थे हम आख़र
सहते ही नहीं को जब दर्द व अलम तझ से
वारफ़तग दिल है या दसत तसरफ़ हे
हैं अपने तख़ील में दिन रात बहम तझ से
यह जोर व जफ़ा सहना फर तरक वफ़ा करना
अे हरज़ह पख़ोही बस अाजज़ हो हम तझ से
ग़ालब की वफ़ा कीशी और तीरी सतम रानी
मशहोर ज़मानह है अब कया कहीं हम तझ से
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